बहारें फिर भी आती हैं। मेरी वफ़ाओं की थोड़ी तो आबरू रखना।

मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज” बहारें फिर भी आती हैं। मेरी वफ़ाओं की थोड़ी तो आबरू रखना। तर्क-ए-तल्लुक़ ही सही, हमें याद ही रखना। ये ज़माना है दरमियाँ, दरारें तो करेगा पैदा। शिकवा भी हो, ला करके मेरे रूबरू रखना। क़फ़स में भी कभी धोखे से आ जाओ तो, आसमानों में उड़ने का तुम हौसला रखना। … Continue reading बहारें फिर भी आती हैं। मेरी वफ़ाओं की थोड़ी तो आबरू रखना।