भारतीय राजनीति और चुनावी शुचिता को लेकर देश का सियासी पारा इस समय अपने चरम पर है। विपक्षी दलों और विभिन्न युवा संगठनों द्वारा लगाए गए “वोट चोरी” के गंभीर आरोपों के बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूचियों में किए गए बदलावों को रद्द करने की मांग को लेकर देश के कई बड़े शहरों में जनता सड़कों पर उतर आई है। विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ और नागरिक समाज के बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) इस समय कटघरे में खड़े नजर आ रहे हैं। यह पूरा विवाद भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाए गए मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम (SIR) के बाद शुरू हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी नेताओं के दावों के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत देशभर में लगभग 13 करोड़ (130 मिलियन) मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि दिल्ली जैसे प्रमुख क्षेत्रों में मतदाता सूचियां 30% तक सिकुड़ गई हैं, जिसमें एक खास रणनीति के तहत सत्तारूढ़ दल के विरोधी मतदाताओं को निशाना बनाया गया है। विपक्ष के मुख्य नेता राहुल गांधी ने हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक बयानों में आरोप लगाया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में निर्वाचन आयोग सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पक्ष में काम कर रहा है। कांग्रेस ने कर्नाटक के महादेवनपुरा और बेंगलुरु सेंट्रल जैसी लोकसभा सीटों का डेटा साझा करते हुए दावा किया कि वहां हजारों फर्जी और डुप्लिकेट मतदाता प्रविष्टियां पाई गईं और विपक्षी मतदाताओं के नाम सामूहिक रूप से हटाए गए। इस कथित गड़बड़ी को विपक्ष ने “वोट चोरी” और “जनादेश की डकैती” का नाम दिया है।

इस विवाद को हवा तब और मिली जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार में पत्रकार रितिका चोपड़ा की एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस विवादास्पद पुनरीक्षण अभ्यास (SIR) से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) की लिखित असहमति या बिना मंजूरी के ही ले लिए गए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, आयोग के भीतर अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच फॉर्म-6, मतदाता डेटाबेस नियंत्रण, पश्चिम बंगाल में 16,000 लंबित अपीलों और गोवा के मतदाताओं से जुड़े मामलों पर कम से कम 14 लिखित आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। निर्वाचन आयोग के भीतर के इस आंतरिक मतभेद ने आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इस मुद्दे को लेकर देश के युवाओं और छात्र संगठनों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। मुंबई के शिवाजी पार्क और दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नामक युवा दबाव समूह के बैनर तले हजारों प्रदर्शनकारियों ने प्रदर्शन किया। यह वही युवा संगठन है जिसने कुछ महीने पहले पेपर लीक घोटाले के खिलाफ प्रदर्शन कर शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर किया था। इस आंदोलन के संस्थापक अभिजीत दीपके का कहना है, “दुनिया भर में लोकतंत्र का मतलब होता है कि लोग अपनी सरकार चुनते हैं, लेकिन यहाँ सरकार चुन रही है कि कौन वोटर बन सकता है और कौन नहीं।” 2 अक्टूबर और उसके बाद देश के कई शहरों (जैसे नोएडा, मुंबई और दिल्ली) में बड़े पैमाने पर विरोध मार्च निकाले गए, जिसमें पुलिस ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में भी लिया। विपक्षी दलों ने “वोट चोर, गद्दी छोड़” के नारों के साथ 6 अक्टूबर 2026 को निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर एक विशाल मार्च निकालने का आह्वान किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऐलान किया है कि यह आंदोलन थमने वाला नहीं है और 1 नवंबर को दिल्ली में एक विशाल महारैली का आयोजन किया जाएगा।

इन तीखे और आक्रामक आरोपों के जवाब में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने विपक्ष के दावों को पूरी तरह “तथ्यहीन और गलत” करार दिया है। आयोग ने एक ‘फैक्ट-चेक’ जारी करते हुए स्पष्ट किया कि बहु-सदस्यीय आयोग के सभी फैसले पूरी तरह कानूनी और सर्वसम्मति या तय प्रक्रियाओं के तहत लिए जाते हैं। आयोग का तर्क है कि इस विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची से डुप्लिकेट प्रविष्टियों (एक ही व्यक्ति का नाम कई जगह होना) को हटाना और मतदाता सूची को पारदर्शी बनाना था। वहीं, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए इसे अपनी संभावित हार की हताशा बताया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि जब विपक्ष खुद अतीत में (जैसे 2018 में तेलंगाना और राजस्थान में) लाखों फर्जी वोटर्स होने का दावा करता था, तो आज जब आयोग पारदर्शी तरीके से उन फर्जी नामों को हटा रहा है, तो विपक्ष को राजनीतिक नुकसान का डर सता रहा है। बीजेपी ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए इसे केवल राजनीतिक लाभ के लिए एक झूठा नैरेटिव (False Narrative) तैयार करने की कोशिश बताया है। अतीत के चुनावों में ईवीएम (EVM) पर सवाल उठाने वाला विपक्ष अब मतदाता सूचियों (Voter Rolls) में हेरफेर को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नागरिक समाज, छात्र संगठनों और एकजुट विपक्ष का यह साझा आंदोलन सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर देश भर के नागरिकों से एक करोड़ से अधिक हस्ताक्षर जुटाए हैं, जिसे राष्ट्रपति और निर्वाचन आयोग को सौंपा जाएगा। देश का यह मौजूदा राजनीतिक माहौल यह संकेत दे रहा है कि आगामी दिनों में चुनावी शुचिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को लेकर यह लड़ाई और उग्र होगी। क्या यह आंदोलन वाकई किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की आहट है, यह आने वाला वक्त और जनता का मूड तय करेगा।




