एक युग का अंत,नाना पाटेकर  बेमिसाल अभिनय, असाधारण संघर्ष और अमर शख़्सियत

डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

“मौत तो एक सच्चाई है, जो सबको आनी है, मगर कुछ लोग अपने वजूद से दिलों में इस तरह बस जाते हैं कि कभी मरते नहीं।”
जब सिनेमा के फलक पर एक ऐसा सितारा अनंत में विलीन हो जाए जिसकी गूंज सिर्फ परदे तक सीमित न रही हो, बल्कि सीधे दिलों को चीरती हुई रूह तक उतरी हो, तो अखबारों के पन्ने और शब्दों की स्याही भी कम पड़ने लगती है। भारतीय सिनेमा के अप्रतिम अभिनेता, एक असाधारण फौलादी शख्सियत और बेबाक अंदाज के धनी नाना पाटेकर का यूं चले जाना कला जगत के लिए एक ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे सदियों तक भरा नहीं जा सकता। कल सुबह जब अखबारों के पन्ने उनके जीवन के आलेखों से रचे-बसे होंगे, तो हर आंख में एक नमी और हर ज़ुबान पर उनकी कला का सम्मान होगा। आइए, याद करें उस शख्शियत को, जिसने अभिनय को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक साधना बनाया। संघर्ष की भट्ठी में तपा हुआ सोना ,नाना पाटेकर का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं था। चमक-धमक वाली मायानगरी में पहुंचने से पहले उन्होंने जिंदगी के बहुत कड़े इम्तिहान देखे थे। कम उम्र में ही पिता के व्यवसाय में घाटे के बाद उन्होंने सड़क पर पोस्टर पेंट करने से लेकर सिनेमाघरों के बाहर बोर्ड रंगने तक का कठिन परिश्रम किया था। उनके जीवन  के विचार की भट्ठी ही थी, जिसने उस साधारण से दिखने वाले लड़के को ‘नाना पाटेकर’ जैसी फ़ौलादी शख्सियत में ढाल दिया। उन्होंने कला को किताबों से नहीं, बल्कि जिंदगी के थपेड़ों से सीखा था। यही कारण है कि जब वे परदे पर आते थे, तो उनका अभिनय बनावटी नहीं, बल्कि समाज के सड़े-गले सिस्टम के खिलाफ एक सुलगती हुई आग नजर आता था।


हिंदी और मराठी सिनेमा में कई दिग्गज आए, लेकिन नाना पाटेकर का अभिनय व्याकरण बिल्कुल अलग और मौलिक था।
खामोशी और आंखों की भाषा,जहां आज के दौर में अभिनेता जोर-जोर से चिल्लाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं, वहीं नाना की खामोशी और उनकी आंखें ही सब कुछ कह देती थीं। उनकी वह प्रसिद्ध लाइन”एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है…” खामोश! या फिर “अरे हम तो फकीर आदमी हैं…”सिनेमा के इतिहास में अमर हो चुकी हैं। गंभीरता से लेकर कॉमेडी तक का सफर, ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों में गुस्से से सुलगता युवा हो, ‘प्रहार’ में एक फौजी का अनुशासन हो, ‘क्रांतिवीर’ का प्रतापी प्रताप और उसका वह आइकॉनिक कोर्टरूम सीन हो, या फिर ‘नटसम्राट’ में एक वृद्ध अभिनेता की मानसिक और भावनात्मक टूटन, उन्होंने हर किरदार में अपनी जान फूंक दी। इसके विपरीत, ‘वेलकम’ के ‘उदय शेट्टी’ बनकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वह जितने गंभीर अभिनेता हैं, उतने ही सहज और धमाकेदार कॉमिक कलाकार भी हैं। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध और स्टारडम से कोसों दूर, नाना पाटेकर ने हमेशा जमीन से जुड़कर रहना पसंद किया। मुंबई के एक साधारण से घर में बेहद सादगी भरा जीवन बिताना, किसानों के संकट के समय चुपचाप आर्थिक मदद लेकर उनके खेतों तक पहुंच जाना, और सामाजिक सरोकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करना,यही बातें उन्हें आम कलाकारों से अलग करती थीं।


वे सिर्फ परदे पर देशभक्त या विद्रोही नहीं बने, बल्कि असल जिंदगी में भी देश, समाज और जरूरतमंदों के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे। उनका दिल जितना कोमल था, उनकी जुबान उतनी ही बेबाक और खरी थी। वे चापलूसी की दुनिया से कोसों दूर, अपनी शर्तों पर जीने वाले इंसान थे। जिंदगी और मौत का चक्र अपनी गति से चलता रहता है, और हर शख्स को एक दिन इस दुनिया से रुखसत होना है। लेकिन कुछ लोग अपने कर्मों, अपनी कला और अपने उसूलों की ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं कि समय की धूल उन्हें कभी धुंधला नहीं कर सकती। नाना पाटेकर भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी वह गूंजती हुई आवाज, उनकी वह पैनी निगाहें और उनके निभाए गए अमर किरदार हमेशा हमारे जेहन में जीवंत रहेंगे।
अलविदा, नाना जी! आपकी कमी यह सिनेमा हमेशा महसूस करेगा।

Change Language