डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

माँ-बाप और औलाद का रिश्ता इस कायनात का सबसे पवित्र, अनमोल और निःस्वार्थ बंधन है। इस रिश्ते की नींव केवल प्यार पर नहीं, बल्कि एक असीम फ़िक्र पर टिकी होती है। तस्वीर में दिए गए शब्द— “औलाद का डर, कभी-कभी माँ-बाप की नींद छीन लेता है”,इसी गहरी भावना का आईना हैं। यह डर किसी खौफ या कमज़ोरी का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अगाध स्नेह का परिणाम है जो एक माता-पिता अपनी संतान के लिए अपने दिल में संजोए रखते हैं. समाज में अक्सर यह समझा जाता है कि माँ-बाप को बच्चों के भविष्य, उनकी पढ़ाई या उनकी सफ़लता की चिंता सताती है। लेकिन सच तो यह है कि उनका सबसे बड़ा डर बच्चों के बड़े होने का नहीं, बल्कि उनके ग़लत रास्ते पर भटक जाने का होता है. आज की इस तेज़ रफ़्तार और चकाचौंध भरी दुनिया में, जहाँ हर क़दम पर नैतिकता और संस्कारों की परीक्षा होती है, माँ-बाप का दिल हर पल इसी शंका में रहता है कि कहीं उनकी संतान किसी ग़लत संगत या मार्ग का शिकार न हो जाए. यह फ़िक्र रातों की नींद उड़ा देती है, क्योंकि वे अपनी औलाद को केवल सफ़ल नहीं, बल्कि एक अच्छा और नेक इंसान बनते देखना चाहते हैं। हर माता-पिता की यह हार्दिक इच्छा होती है कि उनकी औलाद खुश रहे, समाज में मान-सम्मान पाए और हमेशा अच्छे संस्कारों को अपनाए.

वे खुद तकलीफें सहकर अपनी संतान के जीवन को फूलों की तरह सजाने की कोशिश करते हैं। उनके लिए ‘औलाद की खुशी’ ही उनकी अपनी दुनिया का केंद्र होती है. माँ-बाप की अपनी कोई बड़ी ख़्वाहिश नहीं होती, उनकी रातों का सुकून और दिनों की मेहनत सिर्फ इस बात पर टिकी होती है कि उनका बच्चा सही रास्ते पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाए. यह सच है कि माँ-बाप का यह डर कभी-कभी उनकी सख्ती या बार-बार टोकने के रूप में सामने आता है, लेकिन इसके पीछे केवल और केवल बेपनाह प्यार छुपा होता है. यह डर इस बात का प्रमाण है कि माता-पिता अपनी संतान से कितना गाढ़ा प्रेम करते हैं। अंततः औलाद की सुरक्षा और उसका सही मार्ग ही माँ-बाप के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है, और उनका हर डर उनकी इसी महान ममता की एक कोमल परछाई है. “माँ-बाप की डाँट में भी दुआ होती है, और उनके हर डर में सिर्फ़ और सिर्फ़ औलाद के प्रति सच्चा प्यार होता है।”



