बिहार की सियासत में एक पुरानी और बेहद मशहूर कहावत अक्सर सुनने को मिलती है—”यहाँ न तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही कोई स्थाई दुश्मन, यहाँ सिर्फ़ स्थाई हित (सीटें) होती हैं।”

लेकिन इस सियासी हकीकत का एक और भी स्याह और बेहद मजबूत पहलू है, जिसे ‘बाहुबल की सियासत’ कहा जाता है। बिहार में जब चुनाव आते हैं, तो गठबंधन के उसूल, विचारधारा के सिद्धांत और नैतिकता की बातें कागजों तक सिमट कर रह जाती हैं। धरातल पर केवल एक ही गणित काम करता है जीत का समीकरण, और इसके लिए राजनीतिक दल किसी भी हद तक जाने और किसी भी बाहुबली या उसके परिवार को गले लगाने के लिए तैयार रहते हैं। बिहार की राजनीति का यह दस्तूर रहा है कि जैसे ही सीटों का गणित बैठता है, कल तक धुर विरोधी रहे दल एक पाले में नजर आने लगते हैं। साल 2015, 2017, 2020, 2022 और फिर हाल के वर्षों में हुए राजनीतिक उलटफेर इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। जनता दल यूनाइटेड (JDU), राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच बदलते गठबंधनों ने यह साबित कर दिया है कि बिहार में सत्ता की चाबी पाने के लिए सिद्धांतों का बलिदान देना कोई नई बात नहीं है। जब दल अपनी सहूलियत के हिसाब से पाला बदल सकते हैं, तो बाहुबलियों के लिए भी पाला बदलना या राजनीतिक दलों द्वारा उन्हें अपनाना बेहद आम हो जाता है। चाहे वह लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का, बिहार की हर सीट की अपनी एक अलग सामाजिक और जातीय बुनावट है। इस बुनावट में जब बाहुबल और धनबल का तड़का लगता है, तो बड़ी-बड़ी पार्टियां अपने घुटने टेक देती हैं।

बिहार में बाहुबल की सियासत का चेहरा अब थोड़ा बदल चुका है। पहले जहां खुद बाहुबली मैदान में उतरकर सीधे तौर पर अपनी ताकत का प्रदर्शन करते थे, वहीं अब कानूनी बंदिशों और कोर्ट के फैसलों (जिसके तहत सजायाफ्ता चुनाव नहीं लड़ सकते) के कारण एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है। अब बाहुबली खुद पर्दे के पीछे रहते हैं और अपनी पत्नियों, बेटों या भाइयों को चुनावी मैदान में उतारकर संसद और विधानसभा तक पहुंचाते हैं। राजनीतिक दलों को इससे कोई गुरेज नहीं होता, क्योंकि उन्हें केवल ‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता) से मतलब होता है। गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट चुके आनंद मोहन की रिहाई के लिए नियमों में बदलाव तक किए गए। इसका सीधा असर बिहार की राजनीति पर पड़ा। आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद और बेटे चेतन आनंद का अलग-अलग राजनीतिक दलों (JDU और RJD) के टिकट पर चुनाव लड़ना और जीतना यह दिखाता है कि बाहुबल का सियासी रसूख आज भी कितना मजबूत है। अनंत सिंह का नाम बिहार के सबसे बड़े बाहुबलियों में शुमार है। वह नीतीश कुमार की पार्टी में भी रहे, राजद के टिकट पर भी चुनाव जीते और जब वह खुद अयोग्य घोषित हुए, तो उनकी पत्नी नीलम देवी ने राजद के टिकट पर चुनाव जीता और बाद में जदयू खेमे में आ गईं। मोकामा सीट पर विचारधारा मायने नहीं रखती, वहां सिर्फ अनंत सिंह का सिक्का चलता है। वैशाली और मुजफ्फरपुर के इलाकों में शुक्ला बंधुओं का खौफ और सियासी रसूख किसी से छिपा नहीं है। हाल के चुनावों में भी राजनीतिक दलों ने लालगंज और वैशाली जैसी सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए बाहुबली मुन्ना शुक्ला को अपने पाले में करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नवादा और मुंगेर के इलाके में खूंखार बाहुबली रहे अशोक महतो ने जेल से छूटने के बाद सिर्फ इसलिए शादी की ताकि उनकी पत्नी को चुनाव का टिकट मिल सके। राजनीतिक दल ने तुरंत उन्हें लखीसराय-मुंगेर क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतार दिया। यह इस बात का जीता-जाता सबूत है कि पार्टियां सिर्फ जीतने वाले चेहरे की तलाश में रहती हैं, चाहे उसका अतीत कैसा भी हो। सारण और सीवान की राजनीति पर दशकों तक प्रभुनाथ सिंह और मोहम्मद शहाबुद्दीन का कब्जा रहा। इनके जाने के बाद भी इनके परिवारों की राजनीतिक पूछ कम नहीं हुई। दल आज भी इनके वोट बैंक को भुनाने के लिए इनके परिवारों के सामने टिकट का ऑफर लेकर खड़े रहते हैं।

बिहार में बाहुबल कभी भी स्वतंत्र रूप से काम नहीं करता, इसे हमेशा जाति का सहारा मिलता है। जब किसी एक जाति का बाहुबली चुनावी मैदान में उतरता है, तो उसकी जाति के लोग उसके आपराधिक रिकॉर्ड को भूलकर उसे अपनी ‘जातीय अस्मिता’ का प्रतीक मान लेते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल किसी सीट पर उम्मीदवार तय करते समय उस क्षेत्र के बाहुबली की जातीय ताकत का आकलन करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी सीट पर भूमिहार, राजपूत, यादव या कुर्मी मतदाताओं की संख्या अधिक है, तो पार्टियां उसी जाति के किसी दबंग या बाहुबली को टिकट देना पसंद करती हैं। ऐसे में उसूल धरे के धरे रह जाते हैं और चुनावी रैलियों में ‘क्राइम फ्री बिहार’ का नारा देने वाले नेता बंद कमरों में इन्हीं बाहुबलियों से डील करते नजर आते हैं। सवाल उठता है कि क्या बिहार की जनता इस बाहुबल की सियासत से कभी मुक्ति पाएगी? हकीकत यह है कि जब तक राजनीतिक दल सीटों के लालच में अपने उसूल बदलते रहेंगे, तब तक बाहुबल का यह खेल चलता रहेगा। चुनाव आयोग के सख्त नियमों और अदालतों के कड़े रुख के बावजूद, कानून की कमियों का फायदा उठाकर बाहुबली परिवार आज भी सत्ता के गलियारों में अपनी धमक बनाए हुए हैं। बिहार की राजनीति का यह कड़वा सच आज भी कायम है कि यहाँ पार्टियां बदलती हैं, गठबंधन बदलते हैं, मुख्यमंत्री के साथी बदलते हैं, लेकिन जो नहीं बदलता, वह है सीटों को जीतने का यह बाहुबली और जातीय फॉर्मूला। इसी को कहते हैं—बिहार में उसूल नहीं, सिर्फ सीटें और जीतने का दम देखा जाता है।

