डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

भारतीय चिंतन परंपरा में ‘धर्म’ शब्द कभी भी किसी संकीर्ण संप्रदाय, पूजा-कर्मकांड या विशिष्ट उपासना पद्धति तक सीमित नहीं रहा। हमारी ऋषि-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना ने धर्म को सदैव ‘धारण करने योग्य उत्कृष्ट जीवन-मूल्यों’ के रूप में देखा है। अर्थात् जो तत्व समाज को एक सूत्र में पिरोए रखे, व्यक्ति के आचरण को अनुशासित करे और लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे, वही वास्तव में धर्म है। भारतीय परिवेश में धर्म एक व्यापक नैतिक आचार-संहिता है। यह पुत्र के लिए पिता के प्रति दायित्व, नागरिक के लिए राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और मानव के लिए हर जीव के प्रति करुणा का नाम है। इस रूप में देखें तो धर्म कोई बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि हमारी आत्मा का सहज गुण और आचरण का विवेक है। हमारी भारतीय परंपरा में सर्वधर्म समभाव को ही सर्वोपरि माना गया है। भारतीय ग्रामीण परिवेश की चौपालों से लेकर आधुनिक महानगरीय जीवन तक, एक-दूसरे के उत्सवों में सहभागी होना और सुख-दुख साझा करना ही हमारी उस अंतर्निहित चेतना का परिचायक है, जो धर्म को ‘जोड़ने वाले सेतु’ के रूप में स्वीकारती है।

दुर्भाग्यवश, समकालीन दौर में धर्म का बाह्य आवरण (आडंबर, दिखावा और कट्टरता) हावी होता दिख रहा है, जबकि इसका वास्तविक मर्म,सत्य, अहिंसा, क्षमा और परोपकार कहीं नेपथ्य में छूट रहा है। जब-जब धर्म का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थों, सामाजिक ध्रुवीकरण या वैमनस्य फैलाने के लिए किया जाता है, तब-तब यह अपनी मूल अवधारणा से भटक जाता है। आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम धर्म के नाम पर फैलाई जाने वाली संकीर्णता से ऊपर उठकर इसके सार्वभौमिक और कल्याणकारी स्वरूप को पहचानें। अक्सर यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्या आधुनिक वैज्ञानिक युग में धर्म प्रासंगिक है? वास्तव में, विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। विज्ञान जहाँ भौतिक जगत के नियमों को समझाकर जीवन को आसान बनाता है, वहीं धर्म मनुष्य की आंतरिक चेतना को तराशकर उसे नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है। भौतिक प्रगति तब तक बेमानी है, जब तक कि मनुष्य के भीतर दया, प्रेम और संवेदनशीलता जैसे मानवीय गुण जीवित न रहें। अतएव, आज समय की माँग है कि हम धर्म को किसी संकुचित दायरे में बाँधने के बजाय इसे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:(सभी सुखी हों) के वैश्विक विचार के रूप में जिएँ। सच्चा धार्मिक व्यक्ति वही है जिसके आचरण में ईमानदारी, हृदय में करुणा और विचारों में उदारता हो। यदि हम अपने दैनिक जीवन में इन मानवीय मूल्यों को उतार सकें, तभी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की सार्थकता है और यही हमारी भारतीय चेतना का सच्चा संवर्धन होगा।




