‘वो’

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

हर ख़ुशी रेत की मानिंद फ़िसलती चली गई, क़श्ती ए उम्मीद अपनी दम तोड़ती चली गई।

​शम्मा बनकर जो दिया करते थे रोशनी कभी, ज़माने की हवाओं से ही वो बुझती चली गई।

हाथों की ​लकीरों पे अपनी बहुत नाज़ था मुझको, वक़्त की आँधी में तहरीरें हसीन मिटती चली गईं।

​हर लम्हा लगाते रहे हम दिलो-जान से जिसको, वो बेवफ़ा हाथ अपना हमसे  छुड़ाती चली गई।

​बस यादों के साए हैं पास तेरे मुश्ताक़ अब ख़ालिस, जिंदगी यूँ ही तन्हाइयों में बसर तेरी होती चली गई।

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