​भला शिक़वा करें किससे, मुक़द्दर की लकीरों का,,,​

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

​बहुत अरमान थे ख्वाबों को हक़ीक़त बनाने के,
ऐसे बिखरे कि फ़िर ताजिंदगी नींद भी नहीं आई।
​चराग़-ए-आरजू, में जल के ख़ुद ही राख हुआ मैं,
अंधेरी रात में घर से कभी कोई सदा नहीं आई।
​जिन्हें समझे थे हम अपना, वो बेगाना हुआ कैसे,
उठा दर्द सीने में, कहीं से भी कोई दवा नहीं आई।
​भला शिक़वा करें किससे, मुक़द्दर की लकीरों का,
हमारे हिस्से में ख़ुशियों की कोई रुतही नहीं आई।
​चले थे ढूँढने मंज़िल,भँवर में डूब कर रह गए मुश्ताक़,
क़दम थक-हार कर बैठे, कोई कश्ती नज़र नहीं आई।

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