डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

दो ज्योतियाँ जगी थीं, भारत के भाल पर, एक राह सत्य की, एक स्वाभिमान पर।
एक ने अहिंसा से, तोड़ा था अहंकार, दूजे ने अभावों में, दिया था ललकार।
गांधी का जंतर था,अंतिम जन का कल्याण, शास्त्री का नारा था जय जवान,जय किसान!
दे गए विरासत में, जो सादगी का विचार, क्या रख पाए हैं हम, उसका तनिक भी सम्मान?
केवल तस्वीरों पर, माला पहना देना, या दो अक्टूबर को, छुट्टी मना लेना।
क्या यह कृतज्ञता है, या रस्म की मजबूरी? बातों में तो प्रेम है,लेकिन कर्मों में है दूरी!
छोड़कर आडंबर, अगर नीति को अपनाएँ, सत्य और सादगी को, जीवन में ले आएँ।
तभी दूर होगी यह, मन की औपचारिकता, तभी सच्ची श्रद्धांजलि, पाएगी यह भव्यता।




