सड़क जब सूनी हो जाती है, तो संसद आवारा हो जाती है, चुनाव आयोग , वोट चोरी और राहुल गांधी,,,

“सड़क जब सूनी हो जाती है, तो संसद आवारा हो जाती है।” डॉ. राममनोहर लोहिया का यह ऐतिहासिक कथन आज के भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर गूंज रहा है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हालिया चुनावी नतीजों और ईवीएम (EVM) व चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इस विचार को नया आयाम दिया है। विपक्ष का आरोप है कि जनता की शिथिलता का फायदा उठाकर संवैधानिक संस्थाएं सत्ता के दबाव में काम कर रही हैं, जिससे ‘वोट चोरी’ जैसी गंभीर आशंकाओं को बल मिल रहा है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में जब-जब जन-आंदोलनों की आवाजें कमजोर हुई हैं, तब-तब सत्ता प्रतिष्ठानों और संवैधानिक संस्थाओं पर निरंकुश होने के आरोप लगे हैं। महान समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने दशकों पहले चेतावनी दी थी कि यदि देश की जनता सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना छोड़ देगी, तो संसद (यानी विधायी व्यवस्था) बेलगाम हो जाएगी। समकालीन राजनीति में राहुल गांधी इसी दर्शन को आधार बनाकर जनता को जगाने और सड़कों पर सक्रिय होने का आह्वान कर रहे हैं। उनका सीधा निशाना देश की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता, चुनाव आयोग की भूमिका और कथित तौर पर हो रही ‘वोटों की चोरी’ पर है। राहुल गांधी अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और उसके बाद के राजनीतिक अभियानों के जरिए लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि लोकतंत्र सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देने का नाम नहीं है। यदि चुनी हुई सरकारें जनता की आकांक्षाओं के विपरीत काम करती हैं, बेरोजगारी, महंगाई या संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण पर मौन रहती हैं, तो विपक्ष और जनता का कर्तव्य है कि वे सड़कों पर उतरें। राहुल गांधी का मानना है कि आज संसद के भीतर विपक्ष की आवाज को दबाने का प्रयास किया जाता है, सांसदों को निलंबित कर दिया जाता है और बिना व्यापक बहस के महत्वपूर्ण कानून पारित कर दिए जाते हैं। उनका तर्क है कि यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है क्योंकि ‘सड़कें सूनी’ हैं। जनता जब तक व्यापक रूप से विरोध दर्ज नहीं कराएगी, तब तक विधायी व्यवस्था को लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया जा सकता।

विपक्ष और विशेषकर राहुल गांधी के निशाने पर इस समय भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India) सबसे ऊपर है। हाल के वर्षों में हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और आम चुनावों के दौरान चुनाव आयोग के कुछ फैसलों ने विपक्ष को आक्रामक होने का मौका दिया है।

चुनावी शेड्यूल पर आपत्ति: विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के स्टार प्रचारकों (जैसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री) की रैलियों और सहूलियत के हिसाब से चुनावी तारीखों और चरणों का निर्धारण करता है।

आदर्श आचार संहिता (MCC) का दोहरा पैमाना: राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने कई बार चुनाव आयोग पर यह आरोप लगाया है कि वह सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा दिए गए कथित तौर पर भड़काऊ या विवादास्पद बयानों पर आंखें मूंद लेता है, जबकि विपक्ष के नेताओं को मामूली शिकायतों पर भी नोटिस जारी कर दिए जाते हैं।

‘वोट चोरी’ और ईवीएम (EVM) का जिन्न

लोकतंत्र की बुनियाद इस भरोसे पर टिकी है कि ‘एक नागरिक, एक वोट’ का सिद्धांत पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी है। लेकिन राहुल गांधी लगातार ईवीएम (Electronic Voting Machine) की विश्वसनीयता को लेकर तकनीकी और राजनीतिक मोर्चे पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष इसे ‘वोट चोरी’ की संज्ञा दे रहा है।

वीवीपैट (VVPAT) पर्चियों की 100% गिनती की मांग: राहुल गांधी का तर्क है कि यदि चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है, तो वह वीवीपैट मशीनों से निकलने वाली सभी पर्चियों का मिलान ईवीएम के मतों से कराने में संकोच क्यों करता है?

हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में हेरफेर की आशंका: ब्लैक बॉक्स लोकतंत्र का हवाला देते हुए राहुल गांधी ने कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बयानों को कोट किया है, जिनमें कहा गया है कि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को हैक या मैनिपुलेट किया जा सकता है। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी डेटा और जनमत को डिजिटल माध्यमों और प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग से बदला जा रहा है, जिसे वे ‘वोटों की संगठित चोरी’ कहते हैं।

जन-आंदोलन बनाम संस्थागत निष्क्रियता

जब राहुल गांधी कहते हैं कि ‘वोट चोरी’ को रोकने के लिए जनता को जागरूक होना होगा, तो उनका इशारा सीधे तौर पर चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की कथित निष्क्रियता की ओर होता है। विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को बदलकर सरकार ने इस संस्था की स्वतंत्रता को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। ऐसी स्थिति में, जब संवैधानिक संस्थाएं निष्पक्षता की गारंटी देने में विफल प्रतीत होती हैं, तो एकमात्र रास्ता ‘सड़क का संघर्ष’ ही बचता है।

“सड़क जब सूनी हो जाती है, तो संसद आवारा हो जाती है”—यह वाक्य आज के दौर में एक कड़वी हकीकत बनकर उभर रहा है। राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग और ‘वोट चोरी’ पर उठाए गए सवाल केवल सत्ता हासिल करने की छटपटाहट नहीं हैं, बल्कि ये उस व्यापक चिंता को रेखांकित करते हैं जो भारतीय लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ी है। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि चुनाव प्रक्रिया न केवल पारदर्शी हो, बल्कि वह पारदर्शी दिखाई भी दे। यदि देश के एक बड़े हिस्से और मुख्य विपक्षी दल के मन में चुनावी निष्पक्षता को लेकर गहरे संशय हैं, तो यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह उन शंकाओं को दूर करे। वहीं दूसरी ओर, जनता को भी यह समझना होगा कि मूकदर्शक बने रहने से लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं। जब तक देश की जनता अपने अधिकारों के लिए ‘सड़क’ पर मुखर रहेगी, तब तक ‘संसद’ कभी भी जनभावनाओं से बेमुख या आवारा नहीं हो सकती।

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