चुनाव आयोग (ECI) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए 250 पन्नों के जवाबी हलफनामे से क्या देश की चुनावी व्यवस्था को लेकर चल रहा बड़ा विवाद थम जाएगा?

मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की शक्तियों को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए गए गंभीर सवालों के बीच आयोग ने सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को अदालत में अपना पक्ष रखा। आयोग ने राहुल गांधी समेत 13 विपक्षी नेताओं की याचिकाओं में लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। हालांकि, अदालत ने अब इस मामले की सुनवाई को 10 दिनों के लिए टालते हुए याचिकाकर्ताओं को जवाब देने का वक्त दिया है, जिससे यह साफ है कि कानूनी और राजनीतिक सवाल अब भी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं।
अब देखते हैं चुनाव आयोग के हलफनामे में क्या – क्या मुख्य बातें है
सर्वसम्मति से लिए गए फैसले: चुनाव आयोग ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 के बीच जारी किए गए SIR से जुड़े तीनों आदेश किसी एक व्यक्ति (CEC) के नहीं, बल्कि तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे।
फाइल नोटिंग्स अंतिम फैसला नहीं: हलफनामे में कहा गया है कि किसी बहु-सदस्यीय संस्था में फाइलों पर आंतरिक तकनीकी नोट, सवाल या आपत्तियां दर्ज होना एक सामान्य प्रक्रिया है। चर्चा के दौरान किसी चुनाव आयुक्त की टिप्पणी या असहमति को आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं: विपक्ष का आरोप था कि नए मतदाताओं को जोड़ने वाले फॉर्म-6 में अवैध रूप से संशोधन किया गया है। इस पर आयोग ने कहा कि फॉर्म-6 में बदलाव का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है। SIR के दौरान लिया जाने वाला डिक्लेरेशन फॉर्म-6 से पूरी तरह अलग है।
अखबार की रिपोर्ट पर उठाए सवाल: आयोग ने कहा कि विपक्ष की याचिकाएं मीडिया में लीक हुई आंतरिक फाइलों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं, जिन्हें कानून की नजर में पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता।

अब सवाल है हलफनामे के बाद भी क्यों बचे हुए हैं सवाल?
भले ही भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने कागजी तौर पर एक संयुक्त और एकजुट चेहरा पेश किया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों और विश्लेषकों के बीच अभी भी कुछ बुनियादी सवाल अनसुलझे हैं
आंतरिक मतभेद और 28 जुलाई का वाकया: याचिकाओं में चुनाव आयोग के भीतर गंभीर प्रशासनिक मतभेदों का दावा किया गया था। हलफनामे में खुद स्वीकार किया गया है कि 28 जुलाई 2026 को कार्य आवंटन को लेकर एक आंतरिक आदेश जारी हुआ था, जिसके विरोध में अगले ही दिन दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। हालांकि आयोग का तर्क है कि वह आदेश कभी लागू ही नहीं हुआ, लेकिन संस्था के भीतर की खींचतान इसके जरिए सार्वजनिक जरूर हो गई है।
लाखों मतदाताओं के नाम हटने का डर: सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जारी SIR प्रक्रिया के तहत लाखों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने या उनके पते मिसमैच होने को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं। क्या आयोग के इस तकनीकी जवाब से जमीनी स्तर पर जनता और विपक्ष का अविश्वास दूर होगा?
ऑनलाइन फॉर्म का नया पेंच: आयोग ने बताया कि 21 अक्टूबर से ऑनलाइन प्रक्रिया में फॉर्म को दो हिस्सों में बांटा गया है (एक फॉर्म 6 और दूसरा SIR डिक्लेरेशन)। आलोचकों का सवाल है कि यदि पहले कोई विसंगति नहीं थी, तो ऐन वक्त पर इस प्रक्रिया को दो हिस्सों में विभाजित करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अब सवाल आगे क्या होगा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के इस विशाल हलफनामे का अध्ययन करने और अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिनों का समय दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष इस मामले में आक्रामक रुख अपनाए हुए है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि चुनाव आयोग के जवाब से यह विवाद शांत हो जाएगा; बल्कि दीवाली के बाद होने वाली सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता की दिशा में बेहद निर्णायक साबित होने वाली है।



