केसी वेणुगोपाल, के. सुरेश और प्रियंका गांधी वाड्रा के निजी सहायक का नाम सामने आने के बाद यह विवाद केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रह जाता। आरोपों का दायरा बढ़ते-बढ़ते उस स्तर तक पहुंचता है-रितेश सिन्हा

दिल्ली की सियासत में उठती हलचल अक्सर सत्ता और विपक्ष के टकराव से जन्म लेती है, लेकिन इस बार कहानी कुछ और है। इस बार आरोप बाहर से नहीं, कांग्रेस के भीतर से निकले हैं—और इतने गंभीर हैं कि उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। हरियाणा कांग्रेस से निष्कासित एक नेता का दावा है कि चुनावी टिकट अब विचारधारा या जनाधार का नहीं, बल्कि “मोल-भाव” का विषय बन चुका है। आरोप यह भी है कि इस कथित खेल में केवल स्थानीय नेता ही नहीं, बल्कि बड़े चेहरे और शीर्ष कार्यालय तक की भूमिका है।
केसी वेणुगोपाल, के. सुरेश और प्रियंका गांधी वाड्रा के निजी सहायक का नाम सामने आने के बाद यह विवाद केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रह जाता। आरोपों का दायरा बढ़ते-बढ़ते उस स्तर तक पहुंचता है, जहां कांग्रेस अध्यक्ष और उनके कार्यालय की भूमिका पर भी उंगलियां उठाई जा रही हैं। निष्कासित नेता का कहना है कि टिकट वितरण की प्रक्रिया में एक “संगठित चैन” काम करता है—जिसमें ऊपर से लेकर नीचे तक सहमति के बिना कोई सौदा संभव नहीं होता।
यह आरोप अगर महज एक नाराज नेता की भड़ास हो तो इन्हें इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता। जब इन आरोपों की परतें खुलती हैं, तो एक पैटर्न नजर आता है—और यही पैटर्न कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकट बन सकता है।
बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों के पिछले चुनावों को देखें, तो टिकट वितरण को लेकर असंतोष और “बोली लगने” के आरोप बार-बार सामने आए हैं। बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं ने खुलकर यह कहा था कि टिकट पाने के लिए “ऊपर तक पहुंच” और “संसाधन” जरूरी हो गए हैं। कुछ सीटों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे गए, जिनका जमीनी जुड़ाव सीमित था, लेकिन उनके पास संसाधनों की कमी नहीं थी। परिणाम—पार्टी को ऐतिहासिक रूप से कमजोर प्रदर्शन झेलना पड़ा।

उत्तर प्रदेश में भी 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर नए चेहरों को टिकट दिया। यह प्रयोग रणनीतिक तौर पर अलग हो सकता था, लेकिन पार्टी के भीतर ही यह चर्चा रही कि कई टिकट ऐसे लोगों को दिए गए, जिनकी राजनीतिक सक्रियता सीमित थी, लेकिन “सपोर्ट सिस्टम” मजबूत था। कई पुराने कार्यकर्ता हाशिए पर चले गए और नतीजा यह हुआ कि पार्टी को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। महाराष्ट्र में स्थिति और भी जटिल रही। वहां कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के बीच सीट बंटवारे के साथ-साथ टिकट वितरण को लेकर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आई। कई नेताओं ने इशारों-इशारों में यह आरोप लगाया कि टिकट चयन में “प्रभाव और पैसे” की भूमिका बढ़ गई है। कुछ मामलों में बगावत इतनी बढ़ी कि आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ ही पार्टी के लोग मैदान में उतर गए।
इन उदाहरणों को अगर हरियाणा के ताजा आरोपों के साथ जोड़कर देखें, तो एक बड़ी तस्वीर उभरती है—एक ऐसी तस्वीर, जिसमें टिकट वितरण एक पारदर्शी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक “नेगोशिएशन टेबल” बनती जा रही है। निष्कासित नेता का दावा है कि सीट के हिसाब से “रेट” तय होता है—जहां जीत की संभावना ज्यादा, वहां रकम भी ज्यादा। और यह पूरा खेल बिना शीर्ष स्तर की जानकारी के संभव नहीं हो सकता।
यहीं पर सबसे बड़ा और असहज सवाल खड़ा होता है—क्या कांग्रेस अध्यक्ष और उनके कार्यालय को इस कथित प्रक्रिया की जानकारी थी? आरोप लगाने वाला नेता सीधे-सीधे कहता है कि बिना “ग्रीन सिग्नल” के कोई टिकट फाइनल नहीं होता। अगर यह सच है, तो यह केवल संगठनात्मक कमजोरी नहीं, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। हालांकि, यह भी उतना ही जरूरी है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो। राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन उनकी सच्चाई को परखना उतना ही जरूरी। लेकिन यहां समस्या यह है कि कांग्रेस की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है। न तो किसी आंतरिक जांच की घोषणा हुई, न ही आरोपों का विस्तार से खंडन। यही चुप्पी इस पूरे मामले को और संदिग्ध बनाती है।
कांग्रेस, जो खुद को भाजपा के मुकाबले एक नैतिक और वैचारिक विकल्प के रूप में पेश करती है, उसके लिए यह स्थिति बेहद असहज है। क्योंकि अगर वह दूसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती है, तो उसे अपने घर के मामलों में भी उसी कसौटी पर खरा उतरना होगा। यह भी समझना जरूरी है कि चुनावी राजनीति का खर्च लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि टिकट को ही “फंडिंग टूल” बना दिया जाए। अगर ऐसा होता है, तो राजनीति में वही लोग टिकेंगे, जिनके पास पैसा है—और लोकतंत्र धीरे-धीरे “प्लूटोक्रेसी” में बदल जाएगा। कांग्रेस के सामने अब एक साफ विकल्प है—या तो वह इन आरोपों को गंभीरता से लेकर एक स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराए, जिसमें बड़े से बड़े नामों की भी जवाबदेही तय हो; या फिर इसे “असंतुष्ट नेता का आरोप” कहकर टाल दे। लेकिन दूसरा रास्ता आसान जरूर है, सुरक्षित नहीं।
इतिहास गवाह है कि जब-जब राजनीतिक दलों ने अपने भीतर की समस्याओं को नजरअंदाज किया है, तब-तब उन्हें जनता के बीच उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। कांग्रेस पहले ही कई राज्यों में अपनी जमीन खो चुकी है। ऐसे में अगर उसकी साख पर भी सवाल उठने लगें, तो यह संकट और गहरा हो सकता है। अंततः, यह मामला केवल कुछ नेताओं के खिलाफ लगे आरोपों का नहीं है—यह उस भरोसे का सवाल है, जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है। बिहार, यूपी और महाराष्ट्र के उदाहरण यह बताते हैं कि यह समस्या नई नहीं है, लेकिन हरियाणा से उठी आवाज़ ने इसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है।
अब गेंद कांग्रेस के पाले में है। क्या वह इस चुनौती को स्वीकार कर खुद को पारदर्शी और जवाबदेह साबित करेगी, या फिर चुप्पी की दीवार के पीछे छिपकर इस तूफान के गुजरने का इंतजार करेगी? क्योंकि राजनीति में तूफान गुजर जरूर जाते हैं, लेकिन उनके निशान लंबे समय तक बने रहते हैं।