हर कोई मजदूर, किसान, इंसान पस्त पर हमारा निज़ाम मस्त

मजदूरी नहीं , सैलरी नहीं , गैस सिलेंडर नहीं , ट्रेन में टिकट नहीं, शुद्ध हवा नहीं , रोटी नहीं , कपड़ा नहीं, मकान नहीं फिर भी हम विश्व गुरु ? यह आम भारतीय इंसान के साथ मजाक ही है , खैर देश तो देश ठहरा पर राज्यों की स्थिति भी मासा अल्लाह से कम नहीं है ? अपने बिहार की मिट्टी में दलहन, तिलहन, धान,मक्का, गेहूँ , केला, आम, लीची , अन्य कई अनाज और फल पैदा करने की प्रचूर क्षमता है। राज्य की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती से जुड़े कामों पर निर्भर है।

किसान अपने खेतों में जी तोड़ मेहनत करते हैं। बेहतर पैदावार के लिए किसान खाद व कीटनाशकों पर अच्छा खासा खर्च करते हैं। इसके बावजूद राज्य में हर साल और सदियों से किसान कहीं बाढ़ से बेहाल हैं तो कहीं सूखे से त्रस्त हैं। अच्छी उपज नहीं हो पाती जिसके कारण किसान कर्ज में चले जाते हैं, खेती पर निर्भर मजदूरों को काम नहीं मिलता। और यही वजह है कि अब नव जवान किसान खेतों से दूर होते जा रहे हैं। नव जवान किसान मजदूरी करना पसंद करता है परन्तु खेती नहीं।

समाज में किसानों को सम्मान नहीं मिलता, समाज में किसानों को वो प्रतिष्ठा नहीं मिलती है जो नौकरी पेशा या फिर व्यापार करने वालों को मिलती है। किसान पिछड़ेपन के प्रतीक माने जाते हैं। पहले ऐसा नहीं था। खेतों में बिना खाद और बिना कीटनाशकों के इस्तेमाल कि, अच्छी उपज होती थी। राज्य के किसान नौकरी पेशा से ज्यादा सम्पन्न हुआ करते थे। समाज में उनका सम्मान था। नई पीढ़ी खेती करना पसंद करती थी परन्तु मौसम की बेवफाई, आधुनिक तकनीक का अभाव ,वं निजामों  की अदुर्दार्शिता  ने किसानों की कमर तोड़ दी। किसान हमेशा से बेहतर पैदावार के लिए मौसम पर निर्भर रहा है। मौसम की आँख मिचौली ने फसल को प्रभावित किया है। नतीजा यह है कि किसान अब खेती छोड़ किसी अन्य रोजगार की तलाश में लगे हैं। लोग अपनी आने वाली पीढ़ी को किसी शर्त में खेती में नहीं लाना चाहते। मगध क्षेत्र में जहाँ धान, गेहूँ और दलहन की खेती होती है, ऐसे इस क्षेत्र की मुख्य फसल धान है। किसान मौसम पर आश्रित हैं। सरकार की ओर से सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं है। किसानों को सिंचाई के लिए अपनी खुद की व्यवस्था करनी होती है। बिजली मंहगी है। खेती के लिए सस्ती बिजली उपलब्ध नहीं है।

बोधगया के निकट के गांवों में बोधगया के हर खास मौके पर बिजली काट दी जाती है। सिंचाई के लिए किसान पंपिंग सेट का इस्तेमाल करते हैं। अपना निज़ाम  किसानों के लिए डीजल अनुदान की बात करती तो है परन्तु यह अनुदान सिर्फ घोषणाओं , कागजों पर ही नजर आती है। वास्तविकता यह है कि डीजल अनुदान आधे से भी कम किसानों को मिल पाता है और वो भी उन्हें पूरा नहीं मिल पाता जितना उन्हें चाहिए । पहले किसानों को  बीज पर भी अनुदान मिलता था और काफी कम कीमत में उन्हें बीज मिल जाता था। परन्तु जब से अपने निज़ाम ने अनुदान की राशि बैंक खाते में भेजने का प्रावधन किया है तब से समस्या बढ़ गई है। बड़े और सम्पन्न किसान तो बीज खरीद लेते हैं परन्तु छोटे किसान पूँजी के अभाव में बीज नहीं खरीद पाते या खरीदने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है। अनुदान की राशि आने में महीनों लग जाते हैं। बड़े किसान ही मुख्य रूप से बीज अनुदान का लाभ ले पाते हैं। खाद पर भी किसानों को अब अनुदान नहीं मिल पाता जो पहले मिलता था। आज बड़े ही दुःख के साथ कहना पर रहा है की निजामी घोषणा के बाबजूद भी निज़ाम  की ओर से किसानों के अनाज को सही कीमत में खरीदने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। सरकारी एजेन्सी बहुत कम अनाज खरीदती है बाकी का अनाज किसानों को मजबूरी में बिचैलियों को बेचना पडता है। जिससे उन्हें उपज की अच्छी कीमत नहीं मिल पाती। सरकारी एजेन्सी भी जो अनाज खरीदती है उसका पैसा मिलने में किसानों को चार से छह महीनें लग जाते हैं। मिथिलांचल का क्षेत्र हमेशा बाढ़ की संभावना से ग्रस्त रहता है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से गन्ना, गेहूँ , मक्का और थोड़ा बहुत दलहन और तेलहन की खेती होती है। इस क्षेत्र में भी किसानों को निजामों  से किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिलता है। शेष बिहार के जैसा यहाँ भी निजामों की वही खेल चल रहा है।

अब बात करते है अपने निज़ाम के नाकामी का, पटना शहर से लखीसराय जिले तक हजारों किलोमीटर में फैले टाल क्षेत्र के किसान भी आज सरकारी उदासीनता के शिकार है। यह क्षेत्र पूरे देश को दाल खिलाने में सक्षम है। टाल क्षेत्र वर्षों से जल प्रबंधन की समस्या से जूझ रहा है। सही जल प्रबंधन नहीं होने की वजह से किसान साल में एक ही फसल उपजा पाते हैं। वर्षों से किसान टकटकी लगा, सरकार की नींद खुलने का इंतजार कर रहे हैं। राज्य के 16 साल से  निज़ाम  नितीश कुमार ने अटल जी की सरकार में कृषि मंत्री रहते इस समस्या के समाधन की बात कही थी। परन्तु अफसोस वर्षों बीत जाने और लगातार 5 बार मुख्यमंत्री रहने और सम्राट को अपना सत्ता देने के बावजूद उन्होंने किसानों की इस समस्या को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए । स्थिति यह है कि क्षेत्र के किसान खेती से दूर होते जा रहे हैं, वो सब किसी अन्य रोजगार की तलाश में लगे हैं। पिछले कुछ वर्षों में तो स्थिति और भी खराब हो गई है। मौसम की बेवफाई से फसल प्रभावित है और अकर्मण्य निज़ाम की नीति से फसल की सही कीमत किसानों को नहीं मिल पा रही। खेती करने में किसानों को कीटनाशक पर काफी खर्च करना पड़ रहा है। छोटे.बड़े सभी किसान अपनी आने वाली पीढ़ी को खेती से दूर करते जा रहे हैं। खेती पर निर्भर मजदूर सही मजदूरी के अभाव में क्षेत्र से पलायन करते जा रहे हैं।

वैसे केन्द्र के देशभक्त निज़ाम से किसानों में थोड़ी उम्मीद जगी थी पर पिछले 12 साल में दिल्ली के निज़ाम साहब ने भी किसानों को निराश ही किया है परिणामतः कभी दिल्ली को किसानों ने घेर रखा था , फिरभी हमारे निज़ाम किसानों की सुध लेने के जगह पर कुचक्र करते दिखे। याद रहे अगर हमारे निज़ाम  यदि टाल योजना लागू कर जल प्रबंधन की सही व्यवस्था कर देती है तो निश्चित रूप से क्षेत्र के किसान खुशहाल हो जाएँगे और तभी नवजवानों का खेती के प्रति रूझान बढ़ेगा। और यह निहायत आवश्यक है।  ऐसे तो हमारे निज़ाम खुद ही यह मानते है कि राज्य में किसानों की स्थिति अच्छी नही है। हमारे निज़ाम ने कहा है कि वो चाहती है कि राज्य के किसानों की आय बढ़े। राज्य के किसान निश्चित रूप से सरकार की नीतियों पर निर्भर हैं। राज्य के किसान सिचाई की समस्या, बाढ़ की समस्या, जल प्रबंधन की समस्या, अच्छी बीज की समस्या, उपज के रखरखाव की समस्या, पैदावार के बिक्री की समस्या एवं और भी कई समस्या से जूझ रहे है।

सरकार की कृषि संबंधी नीति ही किसानों का भविष्य तय करेगी। इतना तो तय है कि आने वाली पीढ़ी खेती से दूर जा रही है। आने वाली पीढ़ी को, नवजवानों को यदि खेती में अच्छी आय नही होगी तो निश्चित रूप से उनका रूझान खेती के प्रति नहीं बढ़ेगा। आधुनिक तकनीक का यदि इस्तेमाल खेती में नही होगा तो बेहतर उपज की उम्मीद करना भी बेकार है। ये बात तो तय है कि वर्षों से राज्य की सरकार ने कश्षि पर ध्यान नहीं दिया। यदि सरकार ने अब भी किसानों की तरक्की के लिए प्रयास नहीं किया, खेती के बेहतरी पर ध्यान नहीं दिया तो फिर राज्य का भविष्य अंधकारमय है। कैग की रिपोर्ट के मुताविक राज्य सरकार किसानों के भले के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भेजे गए लगभग 180 योजनाओं में पैसा खर्च नहीं कर पाई । खेती के प्रति सरकार की उदासीनता कहीं कोई राजनीतिक साजिश तो नही, क्योंकि राज्य के ज्यादातर किसान उच्च वर्ग से आते है। खैर ये शंका है पर सच्चाई तो मजदूर और किसान पस्त पर निज़ाम  मस्त है ही

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