खूबी अकेले जूझने में है; चाहे विरोधी एक हो या अनेक ———महात्मा गांधी

जुझारूपन व्यक्तित्व का एक शानदार हिस्सा है जो उस व्यक्ति को भीड़ से अलग बनाता है । यहाँ व्यक्तित्व का मतलब शारीरिक रूप-रंग या बनावट से कतई नहीं है । जुझारूपन एक आंतरिक मजबूती है जो साधारण रूप-रंग वाले व्यक्ति को भी एक शानदार व्यक्तित्व प्रदान करता है । हम कह सकते हैं की महात्मा गांधी का व्यक्तित्व जुझारूपन की एक सच्ची मिसाल है। गांधी जी को अनेकों जगह विरोध का सामना करना पड़ा ,उनके सिद्धांतों का मजाक उड़ाया गया लेकिन उन्होंने सत्य और अहिंसा की राह नहीं छोड़ी । जब कोई उनका साथ नहीं देता था तब भी वो अकेले चलने की हिम्मत रखते थे । भले ही वह बाहरी रूप से साधारण व्यक्तित्व के स्वामी प्रतीत होते थे लेकिन उनका जुझारूपन उनके आंतरिक मजबूती और असाधारण व्यक्तित्व का आईना था। इसलिए गांधी जी आज भी हमारे आदर्श हैं।
आज की भाग –दौड़ वाली दुनिया मे सामंजस्य स्थापित करने के लिए हममें भी जूझारुपन के गुण होने ही चाहिए । भले ही हमारे आसपास कहने को बहुत सारे अपने लोग होते हैं लेकिन विपरीत वक्त आने पर हम खुद को अकेला ही पाते हैं और यह अकेलापन हमें पूरी तरह से तोड़ देता है । अनेकों बार हमें विरोध का सामना करना पड़ता है और उसी विरोध से बचने के लिए हम भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं । भले ही हमारी अंतरात्मा उस भीड़ ला हिस्सा बनने की गवाही ना दे लेकिन अंततः हम उस भीड़ या कहो भेड़चाल में ही शामिल हो जाते हैं। इसकी एक वजह हममें जुझारूपन की कमी भी होती है। हम आंतरिक रूप से इतने मजबूत नहीं होते हैं की अकेले चलने का हौसला लाएं। मैंने कहीं पढ़ा था कि
‘’भीड़ हौसला तो देती है
लेकिन पहचान छिन लेती है।‘’
और मैं इस बात से पूरी तरह से इत्तफाक रखती हूँ ।
ये बात सच है कि विरोध का सामना करने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत होती है। कहना आसान है कि हममें जुझारूपन के गुण होने चाहिए लेकिन इस रास्ते पर चलना उतना भी आसान नहीं होता है । अकेले खड़े होने की ताकत बहुत बड़ी कीमत मांगती है। समाज हमें अकेला कर देता है जो हमारे मन और तन को पूरी तरह से झिंझोर कर रख देता है । लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है कि यही अकेलापन हमें मजबूती भी प्रदान करता है। जब हम अकेले ही विपरीत परिस्थितियों से जूझते है और उस पर विजय प्राप्त करते हैं तो हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है । वैसे भी जिसका इरादा सच्चा और साफ हो अंत में दुनिया को उसकी बातें माननी ही पड़ती है । ऐसे जुझारू लोगों से इतिहास भरा पड़ा है जिनको शुरुआत में भारी विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन अंततः दुनिया को उनके सामने सिर झुकाना ही पड़ा। इसलिए हममे भी अकेले दुनिया से जूझने का जज्बा होना चाहिए। क्योंकि किसी कवि ने क्या खूब कहा है’.
‘’भटकनों मे अर्थ होता है
टूटना कब व्यर्थ होता है
शक्ति की खोई हुई पहचान जगती है
आदमी जब बेतरह असमर्थ होता है ।”