बिहार के लिए पिछले कुछ साल बनते-बिगड़ते सियासी समीकरणों का साल रहा. नीतीश का महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ गठजा़ेड ने बिहार की राजनीति में एक तरह से सियासी भूचाल ला दिया.

लालू ने नीतीश को विष्वाकसघाती कहा, तो नीतीश भी लालू के खिलाफ मैदान में उतर गए. लालू के दोनों बेटे तेजस्वी यादव और तेजप्रताप भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जमकर आरोप लगा रहे हैं. उनका कहना है कि जनता ने महागठबंधन को वोट दिया था और अब नीतीश भाजपा के साथ मिलकर जनता के साथ विश्वासघात कर रहे हैं. सृजन और चारा घोटाले ने भी इन सियासी समीकरणों को काफी हद तक प्रभावित किया.
प्रकाश पर्व के अवसर पर ही महागठबंधन में फूट दिखने लगा था. इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक साथ मंच साझा किया और एक-दूसरे से गर्मजोशी के साथ मिले. नीतीश ने प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी का खुलकर समर्थन किया, तो वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने भी नीतीश के शराबबंदी की जमकर प्रशंसा की.
नोटबंदी, जीएसटी और राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद पर भाजपा का समर्थन करने के बाद ही यह तय हो गया था कि नीतीश लालू से अलग किसी और राजनीतिक साथी की तलाश में हैं. लालू और उनके दोनों बेटों पर लग रहे घोटाले के आरोपों के बाद नीतीश को एक बेहतर मौका मिल गया और उन्होंने एनडीए का दामन थाम लिया. नीतीश कुमार को अपनी सुशासन बाबू की छवि बचाने के लिए यह जरूरी था कि वे राजद पर लग रहे आरोपों पर सफाई दें. उन्होंने लालू यादव से इस संदर्भ में चर्चा की और उनसे आग्रह किया कि वे तेजस्वी और तेजप्रताप को इस बात के लिए राजी कर लें कि वे इन घोटाले के आरोपों पर बयान दें. लेकिन लालू की चुप्पी के बाद नीतीश के पास दो ही विकल्प बचे थे. या तो वे तेजस्वी और तेजप्रताप से इस्तीफा ले लेते या फिर खुद मुख्यमंत्री पद छोड़ देते. उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाना ज्यादा बेहतर समझा. नीतीश की हठधर्मिता से लालू को भी यह लग गया कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी तरह का कोई समझौता नहीं करने वाले हैं. इसके बाद नीतीश ने सभी को चौंकाते हुए अचानक इस्तीफा दे दिया.
नीतीश ने इस्तीफा देने के बाद मीडिया में बयान दिया कि हमने 20 महीने तक गठबंधन धर्म निभाया. लेकिन अब ऐसा माहौल बन गया था, जिसमें उनके लिए काम करना मुश्किल था. नीतीश को यह लग गया था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ उनकी पार्टी के लिए जरूरी है, तभी वे बड़े भाई लालू के दबाव से मुक्त हो सकते हैं.
उधर, भाजपा ने भी नीतीश के इस्तीफा देने के तुरंत बाद नीतीश को मुख्यमंत्री बना दिया. यानी नीतीश तो मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन लालू के दोनों बेटों का मंत्री पद छिन गया. उधर इस सियासी उथल-पुथल का असर कांग्रेस पर भी पड़ा. यह तय माना जा रहा था कि कांग्रेस दो धड़ों में बंट जाएगी और एक गुट नीतीश का समर्थन करेगा. हालांकि इस मामले में जदयू ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, जिसके कारण कांग्रेस तो बच गई, लेकिन अशोक चौधरी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा.

अगर आप किसी रोग के चपेट में है तो इसका ईलाज करवाऐं। आपकी एक छोटी सी लापरवाही आपकी जान ले सकती है या आपके लिए जिन्दगी भर के लिए नासूर बन सकता है। आप बेहतर से बेहतर ईलाज करवाते है और नासूर व रोग से निजात पाते हैं। पिछले 3/4 दषकों में हमारे बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का प्रभुत्व बढा है। सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने और चुनाव को प्रभावित करने के लिए बाहुबलियों को अपना सागिर्द बनाती रही है और बाहुबली भी अपने हिसाब से पार्टियों की ागिर्दी को नफा नुकसान से नवाजते रहे हैं और अपने हिसाब से पाला बदलते भी रहे हैं। विश्वास हो न हो पर ये सच है कि पिछले 3/4 दशकों में गलियांे का चोर,बदमाश,उचक्के राजनीतिक पार्टियों के सहयोग के बदौलत खद्दर पहन चेहरे पर झूठी मुस्कान ला पब्लिक को डरा धमका साम दाम दंड भेद अपना राजनेता बन बैठे।
एक समय आया जब राजनीतिक पार्टियंा और ये बाहुबली एक दुसरे की जरूरत बन बैठे और समहय के साथ ये बाहुबली समाज को भी अपने साथ कर कुछ तो अपने आप को पुरानी दुनियां से दूर कर सफल व्यावसायिक बना लिया और कुछ खद्दर के अेाट में आज भी अपना साम्राज्य चला रहे हैं। आज भी बाहुबली और राजनीतिक पार्टियंा एक दुसरे की जरूरत हैं। बाहुबलिओं को संरक्षण चाहिए और पार्टियों को सत्ता। सभी पार्टियों को बाहुबलियों पर भरोसा है,अगर मैं सिर्फ केंद्र,उत्तर प्रदेश और बिहार की बातें करूं तो फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के पास सबसे ज्यादा बाहुबली है, हर जाति समुदाय के बाहुबलियों का कनेक्शन यहां मिल जाऐगा। मोदी जी की भारतीय जनता पार्टी, राहुल जी की कांग्रेस, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी,बहन मायाबती की बहुजन समाजवादी पार्टी,लालू यादव की ‘राष्ट्रीय जनता दल’,नीतिश कुमार की जनता दल यूनाइटेड और राम विलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी के पास बाहुबलियों की फेहरिस्त काफी लंबी हो गई है। या यूं कहें की समाजवादी पार्टी,बहुजन समाजवादी पार्टी,रार्ष्टीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लोक जन शक्ति पार्टी बाहुबलियों की ही पार्टी है जहां जातिय आधार पर बाहुबलियों का वर्गीकरण किया गया है। हालिया बिहार विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो आप पाऐंगे की सभी राजनीतिक पार्टीयां जनता के मूलभूत जरूरतों को दरकिनार कर सिर्फ और सिर्फ बाहुबलियों और जात पात पर वोट मांगा और सफलता भी पाया। उत्तरप्रदेश में चुनाव का अघोषित बिगूल बज चुका है सभी पार्टीयों मे जात पात की गोटी पर विसाद बैठानें की तैयारी चल रही है और बाहुबलियों के लिए पीच तैयार है बैटिंग और बाउलिंग पर मंथन हो रहा है। बैटिंग और बाउलिंग के महारथी का स्वर्णिम समय आ गया है । बैटिंग और बाउलिंग किसी भी तरह की हो सत्ता आनें पर सही ईनाम दिया ही जाएगा गारंटी।
ये हमारे देश का दुर्भाग्य ही है जहां रोटी कपडा और मकान तो दूर की कौरी है और विकास शब्द का उपयोग सिर्फ वोट बनानें और बिगाडनें के लिए किया जाता है और हो भी क्यों नहीं अभी के मंत्रालय में हमारे 31 प्रतिशत केन्द्रीय मंत्री पर किसी न किसी तरह का क्रिमिनल मामला चल रहा है। संसद भवन में क्रिमिनल नेता के आंकडे न सिर्फ भयावहता की ओर ईशारा करता है वरन अपने देश के भविष्य की कहानी भी कहता है।

पिछले तीन लोकसभा सत्र में औसतन 29 प्रतिशत क्रिमिनल नेता की उपस्थिति रही औसतन 4 प्रतिशत क्रिमिनल नेता हर सत्र में बढते जा रहे हैं।
2004 मे कुल 24 प्रतिशत क्रिमिनल जिसे हम बाहुबली भी कह सकते है संसद भवन में उपस्थित थे यानि 543 में 120,वहीं 2009 में 30 प्रतिशत यानि 543 में 154 क्रिमिनल नेता बनें और 2014 में यह आंकडा बढकर 34 प्रतिशत हो गया यानि 541 में 186, हर साल यह आंकडा औसतन 4 प्रतिशत बढता जा रहा है।186 ;34ःद्धसांसदों पर क्रिमिनल चार्ज है 112;21ःद्धसांसद जिनपर सीरियस चार्ज है। जीते सांसदों के पास औसतन 14ण्61 करोड है और
442;82ःद्ध सांसद करोडपति है। अगर यह दीमक इसी तरह बढता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अपना पवित्र संसद भवन क्रिमिनल जिसे हम बाहुबली भी कह सकते है का पनाहगार मात्र बन कर रह जाएगा और ऐसे नेता से आप सूनहरे भविष्य की उम्मीद पाल रहे होगे जो बेईमानी ही होगा जिसका जीता जागता उदाहरण बिहार है।
बिहार इन दिनों एक बार फिर बढ़ती आपराधिक घटनाओं के चलते लगातार सुर्खियों में है। आऐ दिन हो रहीं हत्या, अपहरण और फिरौती की मांग, रंगदारी टैक्स की मांग और न देने पर रंगदारों द्वारा संबंधित व्यक्ति को मार दिए जाने की धटना एक बार फिर से जोऱों पर है। इन बढ़ती अपराधिक घटनाओं को रोकने में राज्य पुलिस प्रशासन नाकाम साबित हो रही है। हालांकि प्रदेश के सीएम नीतीश कुमार इन बढ़ती आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए लगातार फरमान जारी कर रहे हैं और पुलिस विभाग को लगातार निर्देश भी दे रहे हैं लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं दिख रहा है। हाल के दिनों में राजधानी पटना से मात्र 100 किलोमीटर दूर मरांची थानें के थाना प्रभारी को खुलेआम बाढ में गोलियों से छलनी कर दिया गया वहीं पटना में कच्ची मस्जिद के पास बाहुबली लोक जनशक्ति पार्टी नेता बृजनाथी सिंह की दिन दहाड़े तीन अपराधियों द्वारा एके-47 से अंधाधुंध गोली बरसाकर की गई हत्या, मधुबनी में इंजीनियर की हत्या और राजधानी पटना में ही एक अन्य मामले में रंगदारी टैक्स न देने के कारण एक स्वर्ण व्यवसायी की भी दिनदहाड़े हुई हत्या और उसके बाद भी पुलिस वालों की नाकामी ने प्रबुद्ध समाज को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आखिर बिहार में ये क्या हो रहा है? कहीं यह जंगल राज पार्ट-2 तो नहीं शुरू हो गया है? जबकि सीएम नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव और बिहार पुलिस प्रमुख मानते हैं कि बिहार में ऐसा कुछ नहीं है।
बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने लालू-नीतीश गठबंधन के बाद से बढ़ते अपराधों का जो खाका पेश किया उसे देखकर तो ऐसा ही लग रहा है कि बिहार पुलिस के अपराध रोकने में कामयाब होने की बात तो दूर वह अपराधियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई भी नहीं कर पा रही है। उनका आरोप है कि लालू और नीतीश के निर्देशों के बावजूद पुलिस कोई ठोस प्रबंध नहीं कर रही है। उन्होंने पुरानें घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि जब एक ही दिन में अपराधी पांच पांच बड़ी डकैतियों को अंजाम दे सकती है जिसमें बैंक में लूट भी शामिल है और पुलिस कुछ नहीं करती दिख रही है तो फिर राज्य में कानून-व्यवस्था कहां है। यही तो जंगल राज है। इधर बाहुबली बृजनाथी सिंह की हत्या को लेकर प्रदेश की राजनीति और भी गरमा गई है। लोजपा सुप्रिमो रामबिलास पासवान ने जहां इस घटना की निंदा की वहीं यह भी दोहराया कि प्रदेश में जंगल राज पार्ट-2 शुरू हो गया है। वे कहते हैं कि नीतीश को तो कुर्सी से मोह है न कि प्रदेश की जनता से। अगर उन्हें जनता से प्रेम होता तो वे कभी भी लालू से हाथ नहीं मिलाते। हालांकि वे प्रदेश के नामजद सीएम तो हैं पर सत्ता की असली चाबी तो लालू के पास है। और लालू के राज में पीछे भी ऐसा ही हुआ है कि अपराधी बेखौफ रहे हैं और आज भी बेखौफ हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में अपराधिक तत्त्व लगातार बेकाबू होते जा रहे हैं और पुलिस उसे रोकने में अपने आपको असमर्थ पा रही है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि शिवहर कलैक्ट्रेट से महज आधे किमी. की दूरी पर ग्रामीण विद्युतीकरण में जुटी एक कंपनी के प्रधान सुपरवाईजर को रंगदारी टैक्स न दिए जाने के कारण गोलियों से छलनी कर दिया और पुलिस हाथ पर हाथ धरे रही। इस घटना को अंजाम देने वाले मुख्य अपराधी आज भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। ऐसी दो दर्जन से भी अधिक संगीन अपराधों के आरोपी आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। कारण ऐसी अपराधिक घटनाओं को अंजाम देने का काम अधिकतर वही कर रहे हैं जिनका किसी न किसी रूप से उच्च स्तरीय बाहुबली नेताओं से संबंध है। और उसमें भी वे अपराधी अधिक सक्रिय हैं जिनका संबंध सत्तारूढ़ महागठबंधन के साथ है। ऐसे अपराधियों तक पुलिस यदि पहुंच भी जाती है तो इनके आका इन्हें परोक्ष तौर पर बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और सभी प्रकार के हथकंडों का यथा संभव प्रयोग करने से नहीं चूंकते। कभी कभी तो ऐसा भी हो जाता है कि इस महागठबंधन के समर्थकों में भी आपसी भिड़ंत हो जाती है और तब उस भिड़ंत में आरजेडी का पलड़ा भाड़ी पड़ जाता है। ऐसी एक घटना पिछले महीने हुई थी जिसमें जेडीयू और आरजेडी के कार्यकर्ता आपस में भिड़े थे और नौवत दोनों के बीच हिंसक झड़प तक पहुंच गई थी। इस पर काबू करने के लिए सीएम नीतीश ने पुलिस को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया जिसके बाद पुलिस सक्रिय हुई। लेकिन आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद को जब यह पता चला कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया जा रहा है तो उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उन्हें छोड़ने के लिए पुलिस वालों को मजबूर कर दिया। इस तरह की घटनाओं से जहां पुलिसवालों का मनोबल टूटता है वहीं अपराधिक प्रवृति के लोगों का मनोबल बढ़ता है। इन्हें लगता है कि यह सरकार हमारी है और हम चाहे जो करें, हमें वैसा करने की पूरी आजादी है। ये बातें अनौपचारिक बातचीत के दौरान नाम न छापने की शर्त पर बिहार के एक पूर्व डी. जी. पी ने कही। हालांकि आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव इन बातों से साफ इनकार कर रहे हैं कि वे सरकारी कामकाज अथवा पुलिस प्रशासन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप कर रहे हैं। वे कहते हैं कि प्रदेश सरकार अपने हिसाब से काम कर रही है और नीतीश कुमार अपने दायित्व को बखूबी निभा रहे हैं। अपराधियों की बात तो दूर यहां तो विधायक भी घिनौने करतूत कर रहे हैं। जेडीयू के एक विधायक सरफराज आलम राजधानी एक्सप्रेस में पटना जाते वक्त एक महिला के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप में पिछले दिनों गिरफ्तार हुए। हालांकि अगले दिन उन्हें बेल भी मिल गया और वे बाहर आ गए पर सोसल मीडिया पर पार्टी की हो रही फजीहत से बचने के लिए पार्टी ने उन्हें निकाल दिया था।
प्रदेश के पटना जिला मरांची निवासी संजय सिंह जो मोकामा ब्लोक से संबंधित सारा काम करवाते हैं ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया जिसमें यादव जाति के कुछ दबंगों ने मुसहर जाति के एक युवक की सिर्फ इसलिए जमकर पिटाई कर उसे अधमरा कर दिया क्योंकि उस युवक ने यादव टोली के एक चापाकल (हैण्ड पम्प) पर पानी पी लिया था। बात यहीं खत्म नहीं हुई। उन दबंगों ने मुसहर टोली पर धावा बोल कर उस युवक के सगे-संबंधियों के साथ भी मार पीट की। और जब ये लोग नजदीकी मरांची थाने में शिकायत करने गए तो पुलिस वालों ने इन्हें भगा दिया। बात जब सोशल मीडिया पर चली तो डीएम के हस्तक्षेप से मामला दर्ज हुआ और पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करने का नाटक भी किया पर घटना को अंजाम देने वाले दबंगों को पुलिस आज तक गिरफ्तार नहीं कर सकी। वे आज भी मुहल्ले में खुलेआम घूम रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन मानते हैं कि बिहार में कानून व्यवस्था दिन पर दिन गिरता जा रहा है और लोग अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बिहार में बाहुबली राज शुरू हो गया है। वे कहते हैं कि सीएम की कुर्सी से नीतीश को इतना प्यार है कि उसने प्रदेश की जनता का भला सोचने की जगह अपनी कुर्सी का भला सोचा और लालू से जा मिले। हमने उन्हें आवश्यकता से अधिक सम्मान दिया और जनता के हित की बात सोची पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। जितने साल वे जनता के हित में काम किए वह भाजपा के दबाव में किया। बाद में उसने हमारी पार्टी के आंतरिक मामलों में जब हस्तक्षेप करना चाहा पर पार्टी ने उनकी न सुनी तो वे अलग हो गए। मौका परस्ती का जो खेल नीतीश ने खेला वह राजनीति में बहुत कम व्यक्ति ही खेल पाएंगे। इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का कहना है कि आज के समय में यह कहना गलत होगा कि सवर्णों ने हमेशा पिछड़ी जातियों के लोगों का शोषण किया है। जबकि सच तो यह है कि हर जाति में कुछ ऐसे गिने चुने लोग हमेशा हुए हैं जो दबंगई करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। जबकि आज के समय में तो पिछड़ी जातियों के दबंग ही अपने ही समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों का अधिक शोषण कर रहे हैं। और नीतीश व लालू मूक दर्शक की तरह इन घटनाओं को देख रहे हैं। जनता अपने आपको ठगा महसूस कर रही है। वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भाजपा की ओर से लगाए जा रहे सभी आरोेपों को बेबुनियाद कह रहे हैं और वे दावा कर रहे हैं कि प्रदेश में सब कुछ कानून सम्मत हो रहा है। जहां कहीं कोई अपराधी व बाहुबली अपराध की घटनाओं को अंजाम देते हैं, राज्य पुलिस उसकी पूरी छानबीन कर अपराधियों को सजा दिलाने के लिए अपना काम कर रही है। यह कहना गलत होगा कि अपराधियों व बाहुबलीयों को किसी तरह का राजनीतिक प्रश्रय प्राप्त है।
पर यदि अपराधियों व बाहुबलीयों के राजनीतिक प्रश्रय की बात की जाय तो यह आजादी के बाद से पूरे देश में लगातार जारी है। पहले नेता लोग इन अपराधियों को सिर्फ इसलिए प्रश्रय देते थे कि चुनाव के समय ये समाज को डरा धमका कर उनके पक्ष में वोट कराएं और जहां तक हो सके बूथ कैप्चर कर उन्हें जिताने का काम करे और फिर ये नेता अगले पांच साल तक मजे की जिंदगी जीयें। लेकिन आज के समय में इसमें थोड़ा बहुत परिवर्तन हो गया है। आज कुछ बाहुबली तो स्वयं ही नेता बन गए हैं और कुछ विभिन्न पार्टियों में पहली और दूसरी पंक्ति के नेताओं के खास हैं। ये जब किसी घटना को अंजाम देते हैं तो इनके आकाओं को इनकी हर गतिविधि का पता होता है। जब मामला बेकाबू हो जाता है तो वे अपने आपको पाक बेदाग दिखाने का ऊपर से कोशिश तो करते हैं पर अंदर ही अंदर अपने गुर्गों को बचाने की तरकीब सोचते रहते हैं। खास कर यूपी और बिहार इस मामले में टॉप पर है।
और अगर बिहार की बात करें तो यहां की राजनीतिक पार्टी और राजनीतिज्ञों का संबंध न केवल अपराधिक तत्त्वों के साथ हमेशा से रहा है बल्कि कई बार तो वही इसे संचालित भी करते देखे गए हैं। 1990 के दशक में बिहार में ”बिहार पिपुल्स पार्टी“ के नाम से एक पार्टी का गठन हुआ था जिसको शुरू किया था बाहुबली आनंद मोहन और बाहुबली प्रभुनाथ सिंह ने। इस पार्टी की टिकट पर 1995 का विधान सभा चुनाव जितने भी उम्मीदवारों ने लड़ा था उनमें 90 फिसदी से अधिक क्रिमिनल बैकग्राउंड के थे। वहीं लालू प्रसाद के साथ भी बाहुबली पप्पु यादव और बाहुबली शाहबुद्दीन जैसे कई क्रिमनल खड़े थे। रामबिलास पासवान के साथ जहां बाहुबली सूरजभान सिंह और बाहुबली बृजनाथी सिंह जैसे बाहुबली तो खुद को पाक और बेदाग दिखाने वाले सुसाशन बाबू यानि प्रदेश के सीएम नीतीश कुमार के नजदीकियों में अनंत सिंह जैसे दर्जनों चर्चित अपराधी व बाहुबली भी रहे हैं। वे फिलहाल जेल में बंद हैं और नीतीश के बदले रुख से नराज हो कर 2015 के विधान सभा चुनाव से पहले जेडीयू से नाता तोड़ लिया है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति को अपराध मुक्त कैसे कहा जा सकता है।
लालू प्रसाद यादव को जब जनता दल की लहर में 1990 में देवीलाल की कृपा से सीएम का पद मिला तो उसने अपनी कुर्सी को स्थाई करने के उद्देश्य प्रदेश में जातीय उन्माद को हवा दिया और इसे बल देने के लिए ”भूरा बाल को खत्म करो“ का नारा दिया। पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर हुए विवाद में लालू ने ‘राष्ट्रीय जनता दल’ के नाम से नई पार्टी बनाई तथा उसने और उसकी पत्नी राबरी देवी ने कुल 15 सालों तक बिहार पर राज किया। उन दिनों बिहार में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। आए दिन हत्या, अपहरण, रंगदारी की मांग, जातीय झड़प और कभी कभी तो सामुहिक नरसंहार जैसी घटनाएं होती रहती थी जिसका उदाहरण ‘नारायणपुर बाथे’ जैसी कुछ घटनाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित है। और एक बात जो लालू का पर्याय था वह है घोटाला जिसमें सबसे प्रमुख है चारा घोटाला जो लगभग 900 करोड़ रूपये से अधिक का था। उनके पुराने छाप का साया निवर्तमान सरकार पर आज भारी पड़ता दिख रहा है। अपराधियों को लगता है कि लालू उनका तारणहार है और वे जो कुछ भी चाहें कर सकते हैं। इधर लालू प्रसाद की कोशिश है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था सुचारू रहे। इस बार वे जातीय उन्माद को भी बढ़ावा देते नहीं दिख रहे हैं।
हालांकि बिहार के पुलिस प्रमुख का कहना है कि देश के अंदर किस राज्य में अपराध नहीं हो रहा है। वे दिल्ली का हवाला देते हुए कहते हैं कि दिल्ली पुलिस तो सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है फिर भी वहां क्राइम नहीं रुक रहा है। मैं मानता हूं कि पिछले कुछ महीनों में राज्य में अपराधिक घटनाओं में मामूली बढ़ोत्तरी हुई है पर इसका मतलब यह नहीं कि अपराधियों को खुली छूट दे दी गई है। पुलिस के पास यदि किसी प्रकार की शिकायत आती है तो हम उस अपराधी को सलाखों के पीछे डालने में कोई कसर नहीं छोड़ंते। हमारे सीएम स्वयं अपराध को रोकने की मंशा से बराबर दिशा निर्देश दे रहे हैं। वह दिन दूर नहीं कि इन अपराधियों को जो अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं और कहीं जा कर छुप गए हैं पकड़ कर लाया जाएगा और सलाखों के पीछे डाला जाएगा। इसके लिए आवश्यक प्रक्रियाओं पर लगातार काम चल रहा है। दूसरी बात यह कि अब बिहार पुलिस भी त्वरित कार्रवाई में विश्वास करती है। लेकिन हमारी मजबूरी यह है कि थानों का कार्य क्षेत्र बड़ा होता है और पुलिस तक सूचना आने में कई बार देर हो जाती है जिसकी वजह से अपराधी अपने काम को अंजाम देकर छिप जाते हैं।
हालंकि सीएम नीतीश कुमार ने पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा और बोले कि अगले पांच साल तक बीजेपी बढ़ते अपराध के नाम पर छाती पीटती रहें जबकि प्रदेश में अपराध पूरी तरह नियंत्रण के करीब हो चुका है। यहां कोई जंगल राज या बाहुबली राज नहीं है। बीजेपी को तो प्रदेश की जनता ने सिरे से नकार दिया है। उन्हें तो छाती पीटने के लिए मुद्दा चाहिए।
इसमें कोई शक नहीं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रदेश में लगातार बढ़ती अपराधों को लेकर चिंतित हैं और वे इसे रोकने का न केवल पुलिस महकमे को निर्देश दे रहे हैं बल्कि कई मामलों में हस्तक्षेप भी कर रहे हैं और लगातार पुलिस विभाग की मोनेटरिंग भी कर रहे हैं। इसके लिए वे लगातार नवीनतम सूचना प्रोद्योगिकी तंत्र का भी उपयोग कर रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके प्रदेश में अपराध का ग्राफ नीचे गिरता नहीं दिख रहा है। हालांकि उनका दावा है कि प्रदेश में अपराध अब नियंत्रण के करीब है और सूचना मिलते ही पुलिस उचित कार्रवाई भी कर रही है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। अब देखना यह है कि नितीश के दावे कितने दिनों में सच साबित होते हैं और प्रदेश अपराध मुक्त हो पाता है यह तो आने वाला कल ही बताएगा। फिलहाल प्रदेश की जनता इन बढ़ते अपराधों से कराह रही है। यह तो बिहार की कहानी मात्र है इसके जड में अपराधियों का राजनीतिक प्रभाव का बढना है। क्या हम अपने बच्चों को स्वच्छ वातावरण देना चाहते हैं तो जिसे हम अपने बच्चों का गारजियन नही बनाना पसंद करते उसे संसद के दहलीज से दूर रखना होगा। नहीं तो वाकई इस दीमक का कोई अंत नहीं होगा।।।।।
