चुनावी वादों के सैलाब में डूबा बिहार: ‘बाढ़ मुक्त’ करने का संकल्प लेने वाले अमित शाह से जनता का सवाल— ‘कहाँ हो साहब?’

“बिहार को बाढ़ की विभीषिका से पूरी तरह मुक्ति दिलाएंगे।” केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का यह चुनावी हुंकार आज भी बिहार के सीमांचल और कोसी क्षेत्र के आसमान में गूंज रहा है। चुनाव से ठीक पहले जनता को दिखाए गए इस ‘बाढ़ मुक्त बिहार’ के सपने के बीच, आज सूबे की हकीकत भयावह है। हर साल की तरह इस बार भी उत्तर और पूर्वी बिहार की नदियां उफान पर हैं, लाखों लोग बेघर हो चुके हैं और राहत शिविरों में जिंदगी काटने को मजबूर हैं। तबाही के इस मंजर के बीच बिहार की चीख-पुकार दिल्ली के सियासी गलियारों तक नहीं पहुंच पा रही है, जिससे त्रस्त होकर अब जनता और विपक्ष एक ही सवाल पूछ रहे हैं— “चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे करने वाले साहब, आखिर इस संकट की घड़ी में कहाँ हैं?”
चुनावी मंच से ‘बाढ़ मुक्ति’ का मास्टर प्लान
बिहार में राजनीतिक सरगर्मी जब भी परवान चढ़ती है, तो सीमांचल (पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज) और कोसी क्षेत्र के चुनावी मंचों से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार एक ही वादा दोहराया था कि केंद्र में एनडीए (NDA) की मजबूत सरकार बनते ही बिहार को बाढ़ से हमेशा के लिए निजात दिला दी जाएगी।
गृह मंत्री ने अपने भाषणों में नेपाल के साथ मिलकर हाई डैम बनाने, नदियों को आपस में जोड़ने (River Interlinking Project) और कोसी-मेची लिंक परियोजना को गति देने के दावे किए थे। उन्होंने जनता को भरोसा दिलाया था कि आधुनिक तकनीक और मजबूत तटबंधों के जरिए बिहार के इस शाश्वत दर्द को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाएगा। इन वादों के दम पर वोट तो हासिल कर लिए गए, लेकिन धरातल पर परियोजनाएं आज भी कछुआ गति से चल रही हैं या फाइलों में दबी पड़ी हैं।
बाढ़ से चीख रहा है बिहार: जमीनी हकीकत
वर्तमान में बिहार के 15 से अधिक जिले भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान और महानंदा जैसी नदियां खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही हैं। दर्जनों जगहों पर तटबंध टूट चुके हैं, जिससे पानी नए रिहाइशी इलाकों में प्रवेश कर गया है।
- लाखों की आबादी प्रभावित: अररिया, पूर्णिया, सुपौल, सहरसा, खगड़िया और भागलपुर के सैकड़ों गांवों का जिला मुख्यालयों से संपर्क पूरी तरह कट चुका है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर पानी बह रहा है।
- दाने-दाने को मोहताज जनता: बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत सामग्रियां ऊँट के मुँह में जीरा साबित हो रही हैं। मवेशियों के लिए चारा नहीं है, पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है और महामारियों का खतरा मंडरा रहा है।
- किसानों की कमर टूटी: खरीफ की फसलें (धान और जूट) पूरी तरह जलमग्न हो चुकी हैं। सीमांचल के किसानों की साल भर की कमाई पानी में बह गई है।
बाढ़ के इस तांडव के बीच राहत और बचाव कार्य पूरी तरह प्रशासनिक लाचारी की भेंट चढ़ चुके हैं। एनडीआरएफ (NDRF) और एसडीआरएफ (SDRF) की टीमें तैनात जरूर हैं, लेकिन प्रभावित आबादी की तुलना में संसाधन बेहद कम हैं।
“कहाँ हो साहब?” विपक्ष और जनता का तीखा हमला
बिहार में मचे इस हाहाकार के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ‘चुप्पी’ और भौतिक अनुपस्थिति पर राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। मुख्य विपक्षी दलों (आरजेडी और कांग्रेस) ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि केंद्र सरकार बिहार को सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ समझती है।
विपक्षी नेताओं का कहना है, “चुनाव के समय अमित शाह हर हफ्ते बिहार आते थे, रैलियां करते थे और बिहार को स्वर्ग बनाने का दावा करते थे। आज जब बिहार चिक्कार (चीख) रहा है, जनता डूब रही है, तब साहब दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे हैं। बिहार की बाढ़ को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने की मांग को हर बार ठुकरा दिया जाता है।”
सोशल मीडिया से लेकर बाढ़ राहत शिविरों तक में जनता का गुस्सा साफ देखा जा सकता है। लोगों का कहना है कि जब वोट लेना होता है, तब केंद्रीय नेता बिहार की धरती पर आकर बड़े-बड़े पैकेज और योजनाओं की घोषणा करते हैं, लेकिन जब जनता बाढ़ के पानी में भूखे-प्यासे डूब रही होती है, तो उन्हें राज्य सरकार के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
स्थायी समाधान की राह में रोड़े
विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार की बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों में होने वाली भारी बारिश है। जब तक नेपाल और भारत सरकार के बीच उच्च स्तरीय कूटनीतिक बातचीत के जरिए जलाशयों और बांधों का निर्माण नहीं होता, तब तक उत्तर बिहार को बाढ़ से नहीं बचाया जा सकता। अमित शाह ने इस दिशा में कूटनीतिक प्रयास तेज करने का वादा किया था, लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी द्विपक्षीय वार्ताओं में कोई ठोस प्रगति नहीं दिख रही है। इसके अतिरिक्त, कोसी-मेची नदी जोड़ो योजना को केंद्र से जिस वित्तीय मदद की उम्मीद थी, उसमें भी लगातार देरी हो रही है।
निष्कर्ष: वादों की बाढ़ बनाम पानी की बाढ़
बिहार की जनता आज दोहरी बाढ़ से जूझ रही है—एक तरफ प्रकृति के पानी की बाढ़ है, तो दूसरी तरफ राजनेताओं के खोखले वादों की बाढ़। गृह मंत्री अमित शाह का ‘बाढ़ मुक्त बिहार’ का संकल्प चुनावी वैतरणी पार करने का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है।
जब तक केंद्र और राज्य सरकारें राजनीति से ऊपर उठकर बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए युद्धस्तर पर काम नहीं करेंगी, तब तक बिहार की जनता हर साल इसी तरह चीखती रहेगी और दिल्ली के शासकों से सवाल पूछती रहेगी— “वोट से पहले बड़े-बड़े दावे करने वाले साहब, आखिर आप कहाँ हैं?”
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