देश के सबसे प्रतिष्ठित छात्र संघ चुनावों में से एक, दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजे 19 सितंबर 2026 को घोषित कर दिए गए हैं. इस बार का चुनाव न केवल राजनीतिक रस्साकशी के लिए, बल्कि अदालत की सख्त टिप्पणियों, ईवीएम पर खड़े हुए संदेहों और एक निर्दलीय उम्मीदवार द्वारा रचे गए इतिहास के लिए हमेशा याद रखा जाएगा.

18 सितंबर को हुए मतदान में 40.46% वोटिंग दर्ज की गई, जो पिछले तीन सालों में सबसे अधिक है. कुल 52 कॉलेजों और फैकल्टी में फैले चुनावी मैदान में इस बार छात्रों ने अपने भविष्य और कैंपस की बुनियादी सुविधाओं के नाम पर वोट डाला. शनिवार को हुई मतों की गिनती के बाद मुख्य मुकाबला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के बीच था। हालांकि, नतीजों ने सबको चौंका दिया।
अध्यक्ष (President): ABVP के यश डबास ने 24,576 वोट हासिल कर NSUI के विजय शंकर मीणा को 2,053 वोटों से हरा दिया।
उपाध्यक्ष (Vice-President): इस पद पर सबसे बड़ा उलटफेर हुआ। 17 साल का रिकॉर्ड तोड़ते हुए निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट पाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। शौकीन को NSUI से टिकट नहीं मिला था, जिसके बाद उन्होंने बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा था।
सचिव (Secretary): ABVP की रिया छाबड़ी ने 21,650 वोट पाकर जीत हासिल की।
संयुक्त सचिव (Joint Secretary): ABVP के लक्ष्य राज सिंह 16,615 वोट लेकर विजयी रहे।

इस प्रकार चार केंद्रीय पदों में से तीन पर ABVP ने कब्ज़ा जमाया, जबकि एक पद निर्दलीय के खाते में गया। कांग्रेस समर्थित NSUI को इस चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। डूसू चुनाव अपने शुरुआती अभियान से ही विवादों और हिंसक झड़पों से घिरा रहा. चुनाव प्रचार के दौरान नॉर्थ कैंपस रणक्षेत्र में तब्दील हो गया था. ABVP और NSUI के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे पर घरों में घुसकर जानलेवा हमले करने और मारपीट करने के आरोप लगाए। कैंपस में महंगी लक्ज़री गाड़ियों के काफिले, बाहरी तत्वों का दखल और हुड़दंग इस कदर बढ़ गया था कि शिक्षकों और आम छात्रों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए. इसके अलावा, चुनाव के दिन भी दोनों संगठनों के बीच पर्चे बांटने और डमी उम्मीदवारों के पैनल नंबरों को लेकर तीखी बहस और झड़पें देखने को मिलीं। इस साल के चुनाव में संदेह और आरोपों का दौर भी चरम पर रहा। मतदान के दौरान ही NSUI ने EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) में गड़बड़ी का गंभीर आरोप लगाया। उनका दावा था कि ईवीएम मशीनों पर ABVP उम्मीदवार के नाम के आगे नीली स्याही लगाकर उसे हाईलाइट किया गया था, ताकि छात्रों को भ्रमित किया जा सके। संदेह की सुई तब और गहरी हो गई जब दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों और कॉलेज प्रिंसिपलों द्वारा सोशल मीडिया पर एक खास पैनल के समर्थन में पोस्ट साझा करने की खबरें आईं।

कांग्रेस समर्थक शिक्षक संगठनों (INTEC) और छात्र संगठनों ने निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए मांग की कि चुनाव की पवित्रता भंग करने वाले अधिकारियों को तुरंत बर्खास्त किया जाए। कैंपस में फैली अराजकता पर दिल्ली हाई कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन और दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने सख्त लहजे में पूछा, “क्या हथियारों का प्रदर्शन करने वाले छात्रों की श्रेणी में आते हैं? लोकतंत्र को आपराधिक समाज में बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती।” कोर्ट ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के खुले उल्लंघन पर नाराजगी जताई और चुनाव नतीजों पर रोक लगाने तक की चेतावनी दे दी थी। कोर्ट के कड़े रुख के बाद नतीजों के बाद किसी भी तरह के विजय जुलूस (Victory Procession) पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। पुलिस को निर्देश दिए गए कि यदि कोई छात्र नियमों का उल्लंघन करे, तो उसके खिलाफ बिना झिझक के आपराधिक कार्रवाई की जाए। डूसू चुनाव 2026 भारतीय राजनीति के भविष्य को लेकर एक बहुत स्पष्ट संदेश देता है। एक बस कंडक्टर के बेटे और निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन की उपाध्यक्ष पद पर एकतरफा रिकॉर्ड जीत यह साबित करती है कि छात्र अब केवल बड़े बैनरों और पार्टी पॉलिटिक्स के मोहताज नहीं हैं। छात्रों ने महंगे पीजी किराए, हॉस्टल की कमी, कैंपस सुरक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे जमीनी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने वाले नेता को चुना। NSUI के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का विषय है कि आखिर क्यों आंतरिक असंतोष और टिकटों का गलत बंटवारा उन्हें भारी पड़ा। वहीं, ABVP के लिए यह जीत राष्ट्रवाद और विकास के एजेंडे पर युवाओं के भरोसे को दर्शाती है, लेकिन उन्हें कैंपस की छवि सुधारने पर काम करना होगा। हाई कोर्ट की दखल ने साफ कर दिया है कि छात्र राजनीति के नाम पर धनबल और बाहुबल (Money & Muscle Power) का नग्न प्रदर्शन अब स्वीकार्य नहीं होगा। आने वाले समय में डूसू को अपनी खोई हुई वैचारिक साख वापस पाने के लिए कड़े प्रशासनिक और नैतिक सुधारों से गुजरना होगा।




