आज मेरी, कल तुम्हारी बारी

हम सरस्वती का वो वाहक है जो न तो सैनिक है न ही अफसर और न ही नेता हम पत्रकार इन सब को अपनें में समाहित कर सैनिकों अफसरों और नेताओं के जैसे न रूके न डरे अविरल देश की सेवा में लगे रहते है। हम देश के वो सिपाही हैं जिसका न तो कोई नौकरी फिक्स है और न तो कोई वेतनमान न समय सारणी न परिवार की चिंता। फिर हम इतने असुरक्षित क्यों?

जैसा की हमें किताबों में पढाया गया है। हम पत्रकार समाज में होने वाली अच्छाईयों और बुराईयों पर नजर रखते है और समय – समय पर समाज को समाज के दोनो पहलूओं से अवगत करवाते रहते है, एैसा कर हम असामाजिक तत्वों के निशानें पर आ जातें हैं जिससे हमें जान माल के खतरे का अंदेशा बना रहता है फिर भी हम जुनूनी न डरे न झूके अविरल अपने काम पर लगे रहतें है। हालांकि हमारे पास अपनी सुरक्षा हेतू न तो केाई ढाल होता है और ना ही कोई दैविक शक्ति। अपनें कलम को सिर्फ अंधे तराजू का ही एक मात्र सहारा होता है यानि हम किसी को नजर दिखा नहीं सकते और अपना नजर झूका नहीं सकते यानि हमें जिन्दगी भर दोधारी तलवार पर चलना होता है?

जिन्दगी है जूनून है चलना है सेवा करना है कर भी रहे हैं और करते रहेंगे। क्योंकि पत्रकारिता कोई नौकरी या मजबूरी नहीं है ऐसा मैं मानता और जीता भी हूॅं। हम सरस्वती का वो वाहक है जो न तो सैनिक है न ही अफसर और न ही नेता, हम पत्रकार इन सब को अपनें में समाहित कर सैनिकों, अफसरों और नेताओं के जैसे न रूके और ना ही डरे ,अविरल देश की सेवा में लगे रहते है। हम देश के वो सिपाही हैं जिसका ना तो कोई नौकरी फिक्स है और ना तो कोई वेतनमान, ना कोई समय सारणी और ना ही परिवार की चिंता। फिर हम इतने असुरक्षित क्यों?

हर पत्रकार राज्यसभा, पद्म श्री और किसी पार्टी का प्रवक्ता बनने के लिए नहीं आते। तमाम अखबारों में जिला स्तर पर पत्रकारों की हालत आप पता कर लीजिए। मैं बस आपको बताना चाहता हूं कि क्या आप पत्रकारों की अन्य समस्याओं के बारे में जानने में दिलचस्पी रखते हैं? किसके घर में आज चुल्हा जला है या नहीं क्या आपको जानकारी है ? इस महीनें तनखा मिला है या नहीं। सारा बोझ हमीं पर मत डाल दीजिऐ। जिस देश में साधन संपन्न, पढ़े लिखे लोग बिल्डरों के हाथों अपना बीस-पचास लाख गंवा कर लाचार घूम रहे हैं, वहां आपको कैसे यकीन हो गया कि पत्रकार लाचार नहीं है। फिर भी सोचिये इसी सिस्टम में कुछ लोग बल्कि कई लोग ज़बरदस्त काम कर रहे हैं। अपने लिए नहीं, आपके लिए। ये जो जुनून है वो आप नहीं समझेंगे। अगर समझ जाऐंगे तो उॅंगलियां उठाना बंद कर देंगे। जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाऐंगे। कठघरे मे खड़े कर दिये जाऐंगे, जो विरोध में बोलेंगे। जो सच सच बोलेंगे, मारे जाऐंगे। कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाऐंगे। धकेल दिये जाऐंगे जूनून की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं होंगे। जो गुण नही गाऐंगे, मारे जाऐंगे। पत्रकारिता रूपी धर्म की ध्वजा उठाने जो नहीं जाऐंगे जुलूस में, गोलियां भून डालेंगीं। सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी पत्रकार होना। जो अपराधी नही होंगे, मारे जाऐंगे। क्या पत्रकारिता के पेशेगत मूल्यों को बरकरार रखा जाऐगा।  इस लड़ाई में मुझे आप सबका साथ चाहिए। नैतिक भी और भौतिक भी। मीडिया मार्ट इंडिया आपको विश्वास दिलाता है की हम सत्य के साथ होंगे और असत्य से हमारी जंग होती रहेगी।

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