अमेरिका,ईरान,रूस और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर और इसके चलते वैश्विक स्तर पर लोगों का डॉलर पर बढ़ता भरोसा रुपये की इस गिरावट के लिए सबसे बड़े कारण हैं. वैश्विक स्तर पर इस ट्रेड वॉर के चलते लगातार डॉलर में दुनिया का भरोसा बढ़ रहा है.

वहीं दुनियाभर में उभरते बाजारों की मुद्राओं को नुकसान उठाना पड़ा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट का सिलसिला लगातार जारी है। इस गिरावट के बाद केन्द्र सरकार और केन्द्रीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अब रुपये के गिरते स्तर को लेकर अपनी परेषानी जाहिर करने लगी है। जहां बीते कुछ महीनों के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये को संभालने के लिए आरबीआई द्वारा डॉलर बेचने और सोना खरीदने की कवायद ज्यादा कारगर नहीं साबित हो रही है वहीं अब सूत्रों के मुताबिक केन्द्रीय रिजर्व बैंक अब अप्रवासी भारतीयों (एनआरआई) की मदद लेने की तैयारी कर रही है.रुपये में जारी गिरावट से केन्द्र सरकार और केन्द्रीय बैंक अब सकते हैं। आर्थिक जानकारों की मानें तो रिजर्व बैंक अब गिरावट को रोकने के लिए मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान जारी किए गए बॉन्ड नीति को एक बार फिर जारी किया जा सकता है। गौरतलब है कि बीते दिनों केन्द्रीय बैंकों द्वारा रुपये को संभालने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर बेचने की कवायद के चलते देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम हुआ है. मुद्राबाजार के जानकारों का मानना है कि केन्द्रीय बैंक की यह कवायद भी रुपये के गिरते स्तर को सहारा देने के लिए ही थी लेकिन आज के कोरोना काल में इस कदम का भी कोई खास असर रुपये की चाल पर देखने को नहीं मिला लिहाजा अब केन्द्र सरकार और केन्द्रीय रिजर्व बैंक रुपये की गिरावट को लगाम लगाने के लिए विदेश में रह रहे भारतीय नागरिकों का सहारा लेने की तैयारी कर रहे हैं। इस कदम से सरकार को उम्मीद है कि वह अपने चालू खाता घाटे को कम कर सकेगी।

गौरतलब है कि केन्द्रीय बैंक ने इससे पहले 2013 के दौरान अप्रवासी भारतियों की मदद ली थी और रुपये में डॉलर के मुकाबले दर्ज हो रही लगातार गिरावट को संभालने में सफलता पाई थी. आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार औऱ केन्द्रीय बैंक ने अप्रवासी भारतीयों से लगभग 34 बिलियन डॉलर के मूल्य का करेंसी स्वैप किया था और रुपये की गिरावट को रोकने में सफलता पाई थी। इस स्कीम के जरिए आरबीआई विदेष में बैठे भारतीय नागरिकों से सस्ते दर पर डॉलर खरीदती है। रुपये की वैश्विक बाजार में कीमत का सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है। बेहद सरल शब्दों में इस असर को कहा जाए तो बाजार में सब कुछ महंगा होने लगता है। रुपये की कीमत में गिरावट आम आदमी के लिए विदेश में छुट्टियां मनाने, विदेशी कार खरीदने, स्मार्टफोन खरीदने और विदेश में पढ़ाई करने को महंगा कर देता है। इसके चलते देष में महंगाई दस्तक देने लगती है। रोजमर्रा की जरूरत के उत्पाद महंगे होने लगते हैं. आप कह सकते हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार कमजोर होने आम आदमी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान को महंगा कर देता है। वहीं रुपये के कमजोर होने के असर से आम आदमी के लिए होम लोन भी महंगा हो जाता है। लिहाजा, साफ है कि जब डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार गिरावट का दौर जारी है तो यह वक्त नए होम लोन लेने का नहीं है।
इसके अलावा कमजोर रुपये के चलते देश का आयात महंगा हो जाता है। ऐसे वक्त में जब कच्चे तेल की कीमतें पहले से ही शीर्ष स्तर पर चल रही हैं, कमजोर रुपया सरकारी खजाने पर अधिक बोझ डालता है और सरकार का चालू खाता घाटा बढ़ जाता है। किसी देश की मुद्रा उसकी अर्थव्यवस्था की सेहत को स्पष्ट करती है आर्थिक जानकारों का मानना है कि मुद्रा को संचालित करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस देश की सरकार की होती है यह काम मौजूदा स्थिति में नहीं बल्कि एक लंबी अवधि के दौरान किया जाता है। यदि देश में आर्थिक सुस्ती का माहौल नहीं होता को रुपया डॉलर के मुकाबले इस स्थिति में नहीं फंसा होता लिहाजा, मौजूदा स्थिति से रुपये को निकालने के लिए एक्सपोर्ट में बड़ा इजाफे के साथ साथ देश में बड़ा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेष की जरूरत है।मीडिया मार्ट इंडिया का मानना है कि यदि इन तीनों फ्रंट पर सरकार ने बीते कुछ वर्षों को दौरान बेहतर काम किया होता तो रुपए मौजूदा स्थिति में नहीं पहुंचा होता। मतलब साफ है की मोदी जी को मनमोहन के निति का ही सहारा है और मनमोहन के कदमों पर ही मोदी जी को चलना है .