यूजीसी के एक फैसले ने हमारे देश के छात्रों में कई प्रश्नों को जन्म दे दिया है । हम शोकाकुल जरूर है पर अचंभित नहीं क्योंकि …उमाशंकर सिंह

हमारे देश में सभी को जीने का सामान्य अधिकार है। सभी को शिक्षा, प्रगति, शासन शासक बनने का समान अधिकार है। पर आज कुछ खुद ही अपने आपको और अपने समाज को नीचा दिखाकर औरों की अपेक्षा कम आंके जाने की मांग करते देखे जाते हैं। मेरा मानना है कि देश में विकास की कड़ी को जोड़ने के लिए आरक्षण रूपी ऐतिहासिक पहल तो की गई और इतिहास भी बना मगर विकास या प्रगति का नहीं बल्कि कुछ के भले, भ्रष्टाचार और विनाश का। आरक्षण के कारण हम बार बार कमजोर लोगों के हाथों में अपने देश की कमान थमा देते रहे है। जो उसको थामने लायक थे ही नहीं। बस उन्हें तो यह मौका आपने आरक्षण के आधार पर देते रहे हंै। आरक्षण के प्रारूप बनाने वालों ने आसमान की बुलंदियों की कल्पना किया था परंतु रिजल्ट आपके सामने हैं कुछ यानि मुट्ठी भर परिवार मात्र। हमारा देश आर्थिक रूप से गरीब आज भी नहीं है। मगर शारीरिक और मानसिक अपंग जरूर हो चुका है इसका एक कारण झुनझुना आरक्षण भी है। आज आरक्षण नाम का झुनझुना थमा कर हमारे नेताओं ने प्रत्यक्ष रूप से तो हमारे शुभचिंतक प्रतीत होते हैं पर सच्चाई इससे बिल्कुल उल्टा है; जो समय समय पर साबित भी होता रहा है।

भारत की जनसंख्या में बहुतायत आरक्षित वर्ग के बंधुओं की है। ऐसे में वो चाहते ही नहीं की हमारे ऐसे बंधु मानसिक अकर्मण्यता अथवा विकलांगता की बेड़ियों से मुक्त हों, क्योंकि वो अपने वोट बैंक को खोना नहीं चाहते वो नहीं चाहते कि हमारे ऐसे बंधु इतने सजग और विचारवान हो जायें की उनकी हरेक चालों को समझ जायें. अगर हमारे नेतागण इतने ही शुभचिंतक होते तो आरक्षण की सीमा तय करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी. इसके बदले में होना ये चाहिए था कि सभी पिछड़े वर्ग के लोगों को शिक्षा, चिकित्सा, परीक्षा अथवा शिक्षा के लिए आवागमन, आदि की व्यवस्था. कर देते. यह आरक्षण केवल हमें एक सीमित संसाधन जुटा रहा है जिससे हम केवल अपनी विक्लांगता ही छुपा सकते हैं और हम असामान्य ही बने रह सकते हैं. अब आप समझ सकते हैं कि वैशाखी से अच्छा है कि हम लड़खड़ाते हुए ही सही हमें अपने कदमों पे खड़ा होना चाहिए और असामान्य से सामान्य की श्रेणी में लाना चाहिए वजाय इसके कि हम वैशाखी या व्हील चेयर के सहारे दौड़ लगा कर मंजिल हासिल करें. एक शेर को बड़े से बाड़े में स्वच्छन्द छोड़ देने और उस क्षेत्र में किसी और के अतिक्रमण से रोक देने से शेर को खुश नहीं होना चाहिए। उसे तो पूरा जंगल पर राज करने का अधिकार है बशर्ते कि वो मुकाबला करे और खुद की क्षमता को साबित करे. आपको याद करना है कि 1882 में हंटर कमीशन से शुरू हुई इस आरक्षण प्रणाली का 1932 में अंग्रेजों ने अपनी सत्ता का प्रयोग करते हुए एक सांप्रदायिक बंटवारे के तहत दलितों और अन्य धर्मों को बांटने के लिए किया था। महात्मा गांधी ने इसकी कड़ी मुखालफत की, लेकिन अंततः वह इस मुद्दे पर अंबेडकर के साथ समझौते के लिए तैयार हो गए थे। देश की आरक्षण नीति से जुड़े तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ चर्चा हो। प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए अगर लिंग, समुदाय या क्षेत्र आधारित आरक्षण दिया जाता है, तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता, लेकिन आरक्षण के इस प्रावधान के तहत योग्यता को दरकिनार करने का ही परिणाम है कि ब्रेन ड्रेन को लगातार बढ़ावा मिल रहा है।

मेरा मानना है कि प्रतिभा के नष्ट होने से बेहतर है कि वह पलायन कर जाए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य जाति पर जोर देना नहीं, जाति को खत्म करना था। अमेरिका जैसे देशों मे भी अफरमेटिव एक्शन के तहत अश्वेत लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन उसके दूरगामी नकारात्मक असर को देखते हुए इसे समाप्त किए जाने की दिशा में साकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। अपने मौलिक रूप में जो आरक्षण नीति अपनाई गई थी, उसे पूरी तरह खारिज करने के लिए यह बहस नहीं है। समय के साथ आरक्षित वर्ग के भीतर एक अभिजात्य वर्ग ने पैठ जमा ली और सामाजिक न्याय के फायदों को निचले तबके तक पहुंचने से रोक दिया। अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए इस वर्ग ने आरक्षण की पात्रता पर होने वाली हर बहस को कमजोर किया। देश की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल पूछा जा सकता है कि आरक्षण को आगे जारी रखने के आर्थिक परिणाम क्या हो सकते हैं? सार्वजनिक तौर पर कोई भी आरक्षण के बारे में खुलकर बात नहीं करता। इसे सत्ता लोलुपता कहें या सत्ता खोने का डर, समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में भी किसी नेता ने आरक्षण के लिए एक नए सिरे से बहस कि हिम्मत नहीं दिखाई है। कुल मिलाकर यह एक राजनैतिक हथकंडा है, जिसे पार्टियां चुनाव के समय अपनाती है। चूंकि यह मुद्दा सीधे-सीधे जनाधार और वोट बैंक से जुड़ा है, इसलिए हर राजनीतिक पार्टी इस मुद्दे पर हमेशा से सावधानी बरतती रही है। वोट बैंक कि राजनीति के लिए आरक्षण का खेल खेलना देश और समाज में अस्थिरता और अव्यवस्था को बढ़ावा देगी। यह बात तय है कि अब घड़ी आ गई है, जब सरकार को रिजर्वेशन सिस्टम के बारे में गंभीरता से सोचते हुए एक साकारात्मक बहस की तरफ बढ़ना चाहिए।आप मेरे राष्ट्रीय हित में वैचारिक प्रवाह के संदर्भ को समझ चुके होंगे। हम नया और आत्मनिर्भर भारत चाहतें है; आरक्षित नहीं।
