आधी आवादी, देश और राजनीति

फन कुचलने का हुनर भी सीखिए। सांप के ख़ौफ़ से जंगल नहीं छोड़ा करते। उमाशंकर सिंह

यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवताः अर्थात जहां महिलाओं की पूजा होती है, वहीं भगवान का निवास होता है। और “जहाँ महिलाओं का सम्मान नहीं होता, उनका हर प्रयास विफल हो जाता है”

यदि आपको विकास करना है तो महिलाओं का उत्थान करना होगा । महिलाओं का विकास होने पर समाज का विकास स्वतः हो जायेगा -जवाहर लाल नेहरू

एक लड़की की शिक्षा एक लड़के की शिक्षा की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लड़के को शिक्षित करने पर वह अकेला शिक्षित होता है किन्तु एक लड़की की शिक्षा से पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है -महात्मा गांधी

अपना देश भारत महिलाओं के सम्मान के लिए भी जाना जाता था। परंतु जैसे जैसे समय बीतता गया महिलाओं की स्थिति में भी भारी बदलाव आया। उनके प्रति लोगों की सोच बदलने लगी।अनादि काल से ही उन्हें सामाजिक रूप से, बौद्धिक रूप से एवं नैतिक रूप से पुरुषों के समान माना जाता था। प्राचीन काल में महिलाओं को देवी का दर्जा भी दिया गया था। किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले उनकी राय लेना जरुरी माना जाता था। इसमें युगानुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। हिन्दू जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं समान रूप से आदर और प्रतिष्ठित थीं। शिक्षा, धर्म, व्यक्तित्व और सामाजिक विकास में उसका महान योगदान था। संस्थानिक रूप से स्त्रियों की अवनति उत्तर वैदिककाल से शुरू हुई। उन पर अनेक प्रकार के निर्योग्यताओं का आरोपण किया जाने लगा। उनके लिए निन्दनीय शब्दों का प्रयोग होने लगा। उनकी स्वतंत्रता और उन्मुक्तता पर अनेक प्रकार के अंकुश लगाये जाने लगे। और मध्यकाल आते-आतेइनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गयी।

पर्दा-प्रथा इस सीमा तक बढ़ गई कि स्त्रियों के लिए कठोर एकान्त नियम बना दिए गये। शिक्षण की सुविधा पूर्णरूपेण समाप्त हो गई।पिछले सालों में समाज के अन्दर महिलाओं की स्थिति में बहुत बड़े स्तर पर बदलाव हुआ है। अगर गुज़रे चालीस पचास सालों को ही देखे तो हमें पता चलता है की महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक़ मिले,इस पर काफी काम किया गया है। उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर हम पाते हैं कि महिलाओं की स्थिति में पतन समृतिकाल (मनुसमृति) से शुरू हुआ। धीरे धीरे भारत में इस्लाम और ईसाई समुदायों के आगमन और प्रभाव से महिलाओं से उनके हक़ छिनते चले गए। महिलाएं सामाजिक बेड़ियों में बंधकर रहने लगी जिनमें प्रमुख था सती प्रथा, बाल विवाह, बालश्रम, विधवाओं के पुनर्विवाह पर रोक आदि।पर्दा प्रथा की शुरुआत भारत में इस्लम धर्म के आने के साथ शुरू हुई। पर, आज के समय की बात की जाय तो महिलाएं हर क्षेत्र (राजनीती, सामाजिक कार्य, तकनीकी विभाग, खेल-कूद आदि) में अपना योगदान बिना किसी डर के दे रही है। महिलाएं हर क्षेत्र में नेतृत्व करती दिख रही है बल्कि इसे दूसरे शब्दों में कहा जाय तो पुरुषों के कदम से कदम मिला कर चल रही हैं। लेकिन इतने पर भी हम यह नहीं कह सकते कि महिलाओं की स्थिति में सौ फीसदी बदलाव आया है पर इतना जरुर कह सकते है की महिलाएं अब अपने अधिकारों के लिए और भी अधिक सजग हो गईं हैं। हमारे देश की आधी आवादी का प्रतिनिधित्व ये महिलाएं ही करती हैं। इसका मतलब देश की उन्नति का आधा दारोमदार महिलाओं पर और आधा पुरुषों के कंधे पर निर्भर करता है। महिलाओं की स्थिति में सुधार ने देश के आर्थिक और सामाजिक सुधार के मायने भी बदल कर रख दिए है। दूसरे विकासशील देशों की तुलना में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर है। आज महिलाएं आत्मनिर्भर, स्वनिर्मित, आत्मविश्वासी हैं, जिसने पुरूष प्रधान चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता प्रदर्शित की है। वह केवल शिक्षिका, नर्स, स्त्री-रोग की विशेषज्ञ चिकित्सक न बनकर इंजीनियर, पायलट, वैज्ञानिक, तकनीशियन, सेना, पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में भी अपना परचम फहरा रही है। राजनीति के क्षेत्रों में महिलाओं ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद, प्रधानमंत्री का पद, लोकसभा अध्यक्ष का पद, विभिन्न निकायों के अध्यक्ष के पद, मुख्यमंत्रीके पद आदि पर महिलाओं ने अपनी काबीलियत को सावित कर दिखाई है और कुछ पदों को आज भी सुशोभित कर रही हैं। इन्होंने सामाजिक क्षेत्र, खेल जगत या उच्च शिक्षा प्राप्त करके विविध क्षेत्रों में अपने बुद्धि कौशल का परिचय दिया है।आज लोगों की सोच भी काफी बदल चुकी है। आर्थिक दृष्टि से नारी अर्थचक्र के केन्द्र की ओर बढ़ रही है। विज्ञापन की दुनियां में नारियाँ बहुत आगे हैं। बहुत कम ही विज्ञापन होंगे जिनमें नारी न हो, लेकिन विज्ञापन में अश्लीलता एक चिन्तनीयविषय है। इससे समाज में विकृतियाँ भी बढ़ रही है। अर्थशास्त्र ने समाजशास्त्र को बौना बना दिया है।आज देखने में आया है कि महिलाओं ने स्वयं के अनुभव के आधार पर, अपनी मेहनत और आत्मविश्वास के आधार पर अपने लिए नई मंजिलें, नये रास्तों का निर्माण किया है। भारतीय संविधान पुरुषों और महिलाओं को उनके लिंगगत भेद के बावजूद समान शक्तियां और भूमिका सुनिश्चित करती है। हालाँकि, 73वां संविधान संशोधन अधिनियम (पंचायत राज के लिए गांवों में प्रशासन के तीसरे स्तर के रूप में वैधानिक प्रावधान) और 74वां संविधान संशोधन अधिनियम (शहरी क्षेत्रों में प्रशासनिक प्रशासनिक संस्थानों के तीसरे स्तर के लिए वैधानिक प्रावधान जैसे कि कस्बों और शहरों के रूप में) दोनों निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करती है। इसने चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को जन्म दिया, पंचायत स्तर पर नेता के रूप में भारतीय नारी का उदय एक शानदार उपलब्धि है।इसका अर्थ है कि महिलाओं के जीवन में पहली बार नेतृत्व संभालने का मौका आया और इसके साथ ही घर में ससुराल और पति की सेवा के साथ, इसके लिए संतुलन बैठानाकितना कठिन है वो केवल वही जान सकती हैं।भारत में राजनीति कई दशकों से दूषित हो गई है, शायद यह राजनीति से जुड़ी गंदगी ही है जो निश्चिततौर पर प्रतिभाशाली और योग्य महिलाओं को राजनीति से दूर रखती है। यद्यपि आज भारतीय राजनीति के सर्वोच्च स्तर पर हमारे पास कई महिला राजनेता हैं। दुनियां भर में हाल के वर्षों में राजनीति में महिलाओं का एक नया आयाम सामने आया है। अधिक से अधिक महिलाएं अब राजनीति में प्रवेश कर रही हैं। परंपरागत राजनीति ने पुरुष की चिंताओं पर ज़ोर दिया और इसलिए महिलाओं को राजनीति में अनुपस्थित रखा गया।आजादी के बाद से भारत ने राजनीति में महिलाओं की भूमिका में एक बढ़िया छलांग लगाई है। लेकिन अभी भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां सरकार और समाज को बहुत कुछ बदलने और काम करने की जरूरत है। महिला संसद सदस्य और विधान सभा के सदस्य की संख्या अभी भी बहुत कम है। लोकसभा, राज्य सभा और राज्यों के विधान मंडल में महिलाओं के लिए 33 फिसदी आरक्षण हेतु महिला पुनर्वसन विधेयक को संसद में पास नहीं होनेदिया जा रहा है और सभी मुख्य दलों द्वारा रोड़ा अटकाया जा रहा है। महिला सुरक्षा, महिला शिशुहत्या, लिंगानुपात में गिरावट, महिला निरक्षरता, माताओं की उच्च मृत्यु दर और कई और भी कई समस्याएं 21वीं सदी के भारत के लिए चिंतनीय है। यह अब भारत के लोगों और विशेषकर महिलाओं को उनके उत्थान के लिए काम करने और भारतीय राजनीति में निर्णायक भागीदारी करने के लिए निर्भर करता है।आज भारत में राजनीति, पैसा और बाहुबल के बारे में चर्चजोरों पर है। एक व्यक्ति को यहाँ अपनी अच्छी पहचान बनाने के लिए वास्तव में अच्छा कनेक्शन और बैकअप होना चाहिए। हुकूमत निश्चित रूप से एक भूमिका निभाता है। यद्यपि महिलाओं को उनके निष्पक्ष भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण दिया गया है, परंतु ज्यादातर प्रभावशाली परिवारों की महिलाएं ही जिनका संबंधपहले से राजनीतिक परिवारों से है,वे अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल हो जाती हैं। यह हर तरह से दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस तरह राजनीति में भी आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य निरर्थक हो जाता है। इस तथ्य को मानते हुए कि महिलाओं को उच्च पदों में लेना आसान नहीं है, इसलिए नहीं कि कोई योग्य महिला नहीं है अपितु इसलिए कि योग्य और सक्षम महिलाओं के मार्ग में अवरोध बहुत हैं। महिलाओं के लिए राजनीतिक सुधार, आर्थिक आत्मनिर्भरता, बेहतर स्वस्थ का देखभाल और शिक्षा केसुधार में शामिल होना चाहिए। हमें एक स्वस्थ राजनीतिक व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है जो वोट बैंक, पैसा और बाहुबल के गंदे खेल नहीं बल्कि एक बड़े संयुक्त परिवार के रूप में राष्ट्र के समग्र विकास के लिए एक सकारात्मकता लाए।निश्चय ही निष्पक्ष राजनीतिक संस्कृति सुनिश्चित करने के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि राजनीति को दशकों से पल रही कुरीतियों से मुक्त किया जाए। केवल विशेषाधिकार प्राप्त परिवारों से महिलाएं बैकअप और पितृसत्तात्मक समर्थन के साथ सत्ता में नहीं आतीं, बल्कि प्रतिभाशाली और समर्पित महिलाओं को भी भारत की राजनीतिक तस्वीर को बढ़ाने और चमकने का एक उचित मौका मिलता है।भारतीय राजनीति में पुराने समय से ही महिलाओं का दखल रहा है। समय के साथ साथ हर राजनीतिक दल में महिलाओं की भूमिका विस्तृत हुई है। वर्तमान समय में भी भारतीय राजनीति में महिलाएं अग्रणी हैं।पर देश की आधी आबादी राजनीति में अभी भी हाशिये पर है। यह तब है जबकि यहां जितनी भी महिलाओं को राजनीतिक के निचली पायदान से ऊपरी पायदान तक जितना भी जब भी मौका मिला, उन्होंने अपनी काबीलियत की छाप छोड़ी। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिए लाया गया महिला आरक्षण विधेयक कुछ पार्टियों के कड़े रवैये के चलते सालों से लंबित पड़ा है। दुःखद तो यह है कि सभी राष्ट्रीय पार्टियां भी 10-15 फीसदी से अधिक महिलाओं को लोकसभा अथवा विधान सभा का चुनाव लड़ने के लिए टिकट ही नहीं देती। यही नहीं, राजनीतिक भागीदारी की अहम प्रक्रिया मतदान में भी महिलाएं अपने परिवार के पुरुषों की राय के मुताबिक मतदान करती रही हैं, लेकिन बढ़ते शहरीकरण और शिक्षा के मामले में महिलाएं खुद निर्णय लेने लगी हैं।इन कठिनाइयों और परेशानियों के बावजूद देश की महिलाएं राजनीति में न सिर्फ आगे आईं बल्कि उन्होंने राजनीतिक पार्टियों और सरकारों को नेतृत्व भी दिया, संसद और विधानसभा में गंभीर मुद्दों पर अपनी बात रखी और उचित निर्णय लिए। देश की आम औरतें भी चुनाव पर लगातार अपना प्रभाव डाल रही हैं। पिछले दो साल में हुए विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्यों में मतदान करने के मामले में महिलाएं पुरुषों आगे रही हैं। पर भारतीय राजनीति में अभी भी पुरुषवादी सोच ही हावी है। हर पार्टी ‘आम आदमी’ की बात करता है, आम औरत के बारे में तो कोई सोचता भी नहीं। सियासती दलों के एजेंडों में महिला और इनके मुद्दे काफी पीछे आते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है महिलाओं को देश में कोई भी पार्टी अपना बड़ा वोट बैंक नहीं मानती है। इनका मानना है कि महिलाएं अपने घर के पुरुषों के मुताबिक ही मतदान करती हैं। हालांकि कई बार पार्टियाँ महिलाओं को लुभाने की कोशिश करती हैं। वैसे तो देश में महिला सशक्तिकरण, महिला को समान अधिकार तथा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों की खूब चर्चा रहती है और इस संबंध में बढ़ चढ़ कर दावे किए जाते हैं परंतु जमीनी हकीकत कुछ और है। पर यह कहने में कोई गुरेज नहीं किआधी आवादी, देश और राजनीति एक दुसरे के बिना अपूर्ण है।

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