देश की सबसे बड़ी अदालत, Supreme Court of India में इन दिनों भारत निर्वाचन आयोग (इलेक्शन कमीशन) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है।

इलेक्शन कमीशन द्वारा मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision – SIR) के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम हटाए जाने और उन्हें भेजे जा रहे अस्पष्ट नोटिसों के विरोध में वकीलों ने इसे देश के नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार पर हमला करार दिया है। 17 सितंबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस गंभीर मामले पर तत्काल सुनवाई करने के लिए सहमति देते हुए इसे ‘प्राथमिकता’ (Precedence) देने का फैसला किया है। इस पूरे विवाद के केंद्र में दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर की गई कटौतियां हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों का आरोप है कि चुनाव आयोग एक पारदर्शी और निष्पक्ष संस्था के रूप में काम करने के बजाय मनमाने और अपारदर्शी तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे गरीब, वंचित और अल्पसंख्यक समुदायों के करोड़ों वैध मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से गायब होने का खतरा मंडरा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता नेहा राठी और काजल गिरी के माध्यम से दायर याचिका में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सहित कई अधिवक्ताओं ने कोर्ट में दलील दी है कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की वेबसाइट पर ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगतियों) को स्पष्ट करने वाला कोई दस्तावेज या दिशा-निर्देश मौजूद नहीं है। इसके अभाव में चुनावी अधिकारियों को किसी भी मतदाता को सत्यापन के दायरे में लाने और उसका नाम काटने का असीमित और मनमाना अधिकार मिल गया है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में ही संशोधन प्रक्रिया के दौरान लगभग 47 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं या उन पर प्रक्रिया चल रही है।

आयोग का दावा है कि इनमें से 43.32 लाख लोग अपने पते पर अनुपस्थित या स्थानांतरित पाए गए, 2.82 लाख मृत थे और 1.41 लाख से अधिक मतदाता एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत थे। लेकिन वकीलों का कहना है कि यह प्रक्रिया जमीनी हकीकत से दूर है और वास्तविक नागरिकों को निशाना बना रही है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जिन मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा रहे हैं, उनमें नाम की स्पेलिंग, उम्र का अंतर या माता-पिता के नाम में विसंगति जैसी सामान्य बातें लिखी जा रही हैं, लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि पुरानी सूची में क्या दर्ज था। बिना किसी ठोस तथ्य या विवरण के दिए जा रहे इन नोटिसों के कारण आम जनता के लिए अपनी नागरिकता और मतदाता होने का प्रमाण दे पाना बेहद कठिन हो गया है। वकीलों का यह विरोध केवल प्रक्रियात्मक कमियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। कोर्ट रूम से लेकर नागरिक मंचों तक यह बहस तेज हो गई है कि क्या चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था कार्यपालिका या सत्तापक्ष के दबाव में काम कर रही है। विपक्ष और वकीलों के एक धड़े का आरोप है कि इस प्रकार के ‘गहन संशोधनों’ का खामियाजा सबसे ज्यादा समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों को भुगतना पड़ता है, जिनके पास अक्सर दस्तावेजों की कमी होती है। 1977 के ऐतिहासिक एमएस गिल बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कानूनी विशेषज्ञों ने याद दिलाया है कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को असीमित शक्तियां जरूर देता है, लेकिन वे शक्तियां कानून और निष्पक्षता के दायरे में होनी चाहिए, न कि तानाशाही रवैये में। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और सरकार के समर्थकों का कहना है कि मतदाता सूची को त्रुटिहीन और फर्जी नामों से मुक्त बनाना आयोग का संवैधानिक अधिकार और जिम्मेदारी है।

इससे पहले मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य फैसले में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को स्वीकार किया था, जिसे सरकार ने अपनी नीतियों और निष्पक्षता की जीत बताया था। आयोग का तर्क है कि पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए दोहरे पंजीकरण और मृत या स्थानांतरित मतदाताओं को सूची से हटाना बेहद जरूरी है। इस समय जब दिल्ली और कई अन्य राज्यों में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं, मतदाता सूची से लाखों नामों का गायब होना एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। वकीलों की मांग है कि जिन भी लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं या जिनके नाम हटाए गए हैं, उनकी पूरी सूची सार्वजनिक पटल (Public Domain) पर रखी जाए ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर सुनने का निर्णय यह दर्शाता है कि अदालत भी इस विषय की संवेदनशीलता और देश के नागरिकों के मताधिकार के महत्व को समझती है। अब पूरे देश की नजरें 21 सितंबर 2026 (सोमवार) को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। क्या देश की शीर्ष अदालत चुनाव आयोग के इस ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ पर अंकुश लगाएगी या आयोग के तर्कों को सही ठहराएगी, यह आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन इस ‘हल्ला बोल’ ने यह साफ कर दिया है कि देश के सजग वकील लोकतंत्र की रक्षा के लिए किसी भी मोर्चे पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।




