सुभाष बाबू की पुण्य तिथि पर सादर नमन-आनंद शंकर

सुभाषचंद्र बोस 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। सावरकर उन दिनों हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे । सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस ने 16 दिसम्बर 1938 को एक प्रस्ताव पास किया था , जिसमें कांग्रेस के सदस्यों को हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के सदस्य होने पर रोक लगा दी गयी थी। सुभाष चंद्र बोस ने उस समय अपने एक संपादकीय में लिखा था – बहुत समय पहले से ऐसा होता आता था कि कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे साम्प्रदायिक दलों के सदस्य हो सकते थे, लेकिन वर्तमान समय में ये दोनों दल और अधिक साम्प्रदायिक हो गए हैं। इसके फलस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित करके अपने संविधान में संशोधन कर दिया है कि कोई भी व्यक्ति, जो हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का सदस्य न हो, वही कांग्रेस का सदस्य हो सकता है । हिन्दू महासभा के प्रति सुभाष बाबू का यह दृष्टिकोण था। उन्होंने दोनों ही दलों हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग को अपने लेखों और भाषणों में साम्प्रदायिक कहा और माना है। सावरकर का ब्रिटिश आकाओं की तरफ झुकाव जग जाहिर था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जब हिन्दू महासभा में सक्रिय हुए, तब का उन्होंने अपनी डायरी में एक प्रसंग लिखा है। मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे। पर सुभाष बोस से उनका साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर बहुत टकराव था। अपनी डायरी में डॉ मुखर्जी ने लिखा था – “एक बार बोस उनसे मिले थे, और यह कहा था कि, यदि आप हिन्दू महासभा को एक राजनीतिक दल के रूप में गठित करते हैं तो मैं देखूंँगा कि कैसे गठित करते हैं ।

यदि आवश्यकता पड़ी तो बल प्रयोग से भी यदि यह सच मे गठित होती है, तो इसे तोड़ूंँगा। सुभाष चन्द्र बोस ने हिन्दू महासभा की सभी जन सभाओं में व्यवधान डालने की अपने समर्थकों की सहायता से योजना बनाई थी। उन्होंने कहा था कि उनके समर्थक हिन्दू महासभा की सभाएंँ नहीं होने देंगे और ज़रूरत पड़ी तो सभा करने वालों को पीटेंगे भी। डॉ मुखर्जी, सुभाष बाबू के इस ऐलान को सहन नहीं कर पाए और चुनौती स्वीकार करते हुए उन्होंने एक सभा का आयोजन किया। जैसे ही डॉ मुखर्जी सभा में भाषण देने के लिये खड़े हुए ,एक पत्थर उन्हें भीड़ से आकर लगा। उनके माथे से बलबल खून निकलने लगा था। बलराज मधोक की आत्मकथा में इस प्रसंग का वर्णन है, जो डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। सुभाषचंद्र बोस भारत की बहुलतावादी संस्कृति से परिचित थे और साम्प्रदायिक राजनीति के दुष्परिणाों को वे अच्छी तरह से समझते थे।




