महंगाई सिर्फ एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, यह करोड़ों परिवारों के थाली की भूख, बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता और बीमार बुजुर्गों के इलाज से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील सामाजिक मुद्दा है। जनता अपने हिस्से का त्याग और संघर्ष कर रही है। वह अपनी खुशियों का गला घोंटकर भी टैक्स चुका रही है और देश के निर्माण में योगदान दे रही है।

“आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपइया” यह मशहूर कहावत आज के दौर में भारत के मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों की कड़वी सच्चाई बन चुकी है। सुबह की चाय की पत्ती से लेकर रात के खाने की दाल तक, हर चीज की कीमतें आसमान छू रही हैं। आज देश का आम नागरिक जब भी बाजार जाता है, तो उसकी जेब ढीली हो जाती है, लेकिन थैला खाली ही रहता है। महंगाई की यह मार चौतरफा है, जिसने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न हर नागरिक के जेहन में कौंध रहा है: अब जनता क्या करे और सरकार को क्या करना चाहिए? आज महंगाई किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने जीवन के हर पहलू को अपनी चपेट में ले लिया है। खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। दाल, चावल, खाद्य तेल और मसालों के दाम बजट से बाहर हो चुके हैं। सब्जियों की कीमतें, विशेषकर प्याज, टमाटर और आलू, आए दिन नए रिकॉर्ड बना रही हैं। एलपीजी सिलेंडर की ऊंची कीमतों ने घरेलू बजट का संतुलन बिगाड़ दिया है। पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर हर छोटी-बड़ी वस्तु पर पड़ता है। जब ट्रांसपोर्टेशन (माल ढुलाई) महंगी होती है, तो सुदूर गांवों तक पहुंचने वाला हर सामान महंगा हो जाता है। निजी स्कूलों की फीस और किताबों के दाम हर साल बेतहाशा बढ़ते हैं।
वहीं, दवाइयों और अस्पताल के खर्चों ने आम आदमी के लिए सम्मानजनक जीवन जीना दूभर कर दिया है। महंगाई रातों-रात नहीं बढ़ती, इसके पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे युद्ध और तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) बाधित हुई है। कच्चे तेल और आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ने का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन के कारण कभी सूखा तो कभी अत्यधिक बारिश (बाढ़) से फसलें बर्बाद हो रही हैं। उत्पादन घटने से मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे कीमतें बढ़ती हैं। संकट के समय कुछ मुनाफाखोर वस्तुओं की जमाखोरी कर लेते हैं, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है और दाम बढ़ जाते हैं। ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर लगने वाले केंद्रीय और राज्य स्तरीय कर (Tax) भी कीमतों को ऊंचा बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

जब सरकार की नीतियां तुरंत राहत देने में विफल रहती हैं, तो जनता को अपनी जीवनशैली में बदलाव करने पर मजबूर होना पड़ता है। आज के समय में आम नागरिक को निम्नलिखित कदम उठाने पड़ रहे हैं। परिवारों को अब ‘इच्छाओं’ (Wants) और ‘आवश्यकताओं’ (Needs) के बीच एक सख्त लकीर खींचनी पड़ रही है। अनावश्यक खर्चों, जैसे बाहर खाना या घूमना, पर भारी कटौती की जा रही है। लोग अब पारंपरिक बचत के बजाय उन विकल्पों को तलाश रहे हैं जो महंगाई दर को मात दे सकें। साथ ही, आपातकालीन फंड (Emergency Fund) बनाना बेहद जरूरी हो गया है। ईंधन के बढ़ते खर्च से बचने के लिए लोग सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) या ई-वाहनों (EVs) का रुख कर रहे हैं। बिजली के बिल को नियंत्रित करने के लिए सौर ऊर्जा (Solar Energy) की स्वीकार्यता बढ़ रही है। लोकतंत्र में सरकार का पहला कर्तव्य लोक कल्याण है। महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार को तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर कड़े और प्रभावी कदम उठाने होंगे।
सरकार को पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और वैट (VAT) को कम करना चाहिए ताकि माल ढुलाई सस्ती हो और आम वस्तुओं के दाम घटें। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत जिला स्तर पर छापेमारी की जानी चाहिए ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी को रोका जा सके। राशन की दुकानों के माध्यम से न केवल गेहूं और चावल, बल्कि दालें, खाद्य तेल और नमक भी रियायती दरों पर हर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक गोदामों का निर्माण किया जाए ताकि बंपर पैदावार के समय फसलें खराब न हों और संकट के समय उनकी आपूर्ति सुचारू रहे। महंगाई से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका जनता की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को बढ़ाना है। नए रोजगार के अवसर पैदा कर और न्यूनतम मजदूरी में सुधार कर सरकार जनता के हाथों में पैसा पहुंचा सकती है। रिजर्व बैंक (RBI) को मौद्रिक नीतियों के जरिए बाजार में लिक्विडिटी (नकदी प्रवाह) को इस तरह नियंत्रित करना होगा कि विकास दर प्रभावित हुए बिना महंगाई पर लगाम लगाई जा सके। महंगाई सिर्फ एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है,
यह करोड़ों परिवारों के थाली की भूख, बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता और बीमार बुजुर्गों के इलाज से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील सामाजिक मुद्दा है। जनता अपने हिस्से का त्याग और संघर्ष कर रही है। वह अपनी खुशियों का गला घोंटकर भी टैक्स चुका रही है और देश के निर्माण में योगदान दे रही है। अब बारी सरकार की है। सरकार को राजनीतिक नफा-नुकसान से ऊपर उठकर वित्तीय अनुशासन और जन-केंद्रित नीतियों को प्राथमिकता देनी होगी। जब तक ‘जनता’ और ‘सरकार’ मिलकर इस आर्थिक संकट के खिलाफ सही तालमेल से काम नहीं करेंगे, तब तक महंगाई की यह मार देश के विकास की रफ्तार को धीमा करती रहेगी। समय की मांग है कि सरकार केवल आश्वासनों का मरहम न लगाए, बल्कि ठोस नीतिगत फैसलों से आम आदमी की जेब और गरिमा दोनों की रक्षा करे।




