अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 पर विशेष-रितेश सिन्हा

21 जून, 2026 को हम 12वाँ अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रहे हैं। सितम्बर 2014 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे दिसम्बर 2014 में विश्व के अधिकांश देशों के समर्थन के साथ स्वीकार कर लिया गया। इसका मूल उद्देश्य भारत की प्राचीन योग परम्परा के अमूल्य उपहार को सम्पूर्ण विश्व के साथ साझा करना था। तभी से प्रत्येक वर्ष यह आयोजन वैश्विक स्तर पर विस्तृत होता जा रहा है। इस वर्ष का केन्द्रीय विचार है— कल्याण, विवेक एवं विश्व-शान्ति के लिए योग।

भारतवर्ष के प्राचीन ऋषियों द्वारा अन्वेषित योग विज्ञान सम्पूर्ण मानव जाति की विरासत है। वर्तमान समय में तनावों और उत्तरदायित्वों के बोझ तले दबी मानवता के लिए योग एक संजीवनी के समान है। आज विश्व यह स्वीकार कर रहा है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम तक ही सीमित नहीं है, अपितु यह शरीर, मन और आत्मा की क्षमताओं के सम्पूर्ण विकास का एक पूर्ण विज्ञान है, जिसका सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वर-प्राप्ति है।
“योग” संस्कृत शब्द “युज्” से बना है, जिसका अर्थ है—जुड़ना। व्यक्तिगत आत्मा का परमात्मा के साथ एकत्व ही योग है। भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता (6/46) में योगी की श्रेष्ठता बताते हुए कहा है:
“तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥” (योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, वह ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है; इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो!)
आधुनिक युग में महान् गुरु-परम्परा—महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी, और श्री श्री परमहंस योगानन्दजी—के माध्यम से यह राजयोग विश्व को पुनः प्रदान किया गया है।
महावतार बाबाजी ने लुप्त हो चुके इस विज्ञान को पुनर्जीवित कर ‘क्रियायोग’ का नाम दिया। बाबाजी ने योगानन्दजी से कहा था: “ईश्वर-साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रणाली क्रियायोग का अन्ततः सब देशों में प्रसार हो जायेगा और मनुष्य को अनन्त परमपिता का व्यक्तिगत इंद्रियातीत अनुभव कराने के द्वारा यह राष्ट्रों के बीच सौमनस्य स्थापित करने में सहायक होगा।” अपनी विश्वविख्यात आध्यात्मिक कृति ‘एक योगी की आत्मकथा’ (Autobiography of a Yogi) और अपनी शिक्षाओं के माध्यम से योगानन्दजी ने संतुलित जीवन और वैज्ञानिक ध्यान पद्धतियों का मार्ग दिखाया। उन्होंने सन् 1917 में भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया और सन् 1920 में अमेरिका में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की। उन्हें ‘पाश्चात्य जगत् में योग के जनक’ के रूप में सम्मानित किया जाता है।
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया अपने आश्रमों और केन्द्रों के माध्यम से गुरुजी की क्रियायोग शिक्षाओं का प्रसार कर रही है। यह संस्था ‘योगदा सत्संग पाठमाला’, पत्रिकाओं और डिजिटल माध्यमों से भक्तों को मार्गदर्शित करती है। योगानन्दजी ने ‘योगी कथामृत’ में कहा है: “ईश्वर करे कि सब लोगों को यह ज्ञात हो जाये कि सारे मानवी दु:खों को मिटा देने के लिये आत्मज्ञान की निश्चित, वैज्ञानिक प्रविधि अस्तित्व में है।”
क्रियायोग के अनुसरण से व्यक्ति के भीतर ‘विवेक’ जागृत होता है और विस्तारित चेतना में वह अनुभव करता है कि सबमें एक ही परमात्मा विद्यमान है। यही वह मार्ग है जो स्थायी विश्व-शान्ति को प्रशस्त कर सकता है।
