डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’, हरदा,मध्य प्रदेश

अपनों की भीड़ में रह कर भी तन्हा हो गया हूँ मैं, अपनी ही नज़र में खुद पर ही रुस्वा हो गया हूँ मैं।
बुझा कर शम्अ खुद अपने ही हाथों से अँधेरे में, किसी की उम्मीद में रोशनी का धोखा हो गया हूँ मैं।
ज़माने की नज़र में मुकम्मल ज़ात हूँ लेकिन, हक़ीक़त जानिए तो अंदर से टूट गया हूँ मैं।
तअल्लुक़ तोड़ने वालों का शिक़वा तक नहीं कोई, यूँ चुपके से किसी की याद से रुख़्सत हो गया हूँ मैं।
मेरे होने न होने से किसी को फ़र्क क्या पड़ता, चराग़-ए-सुब्ह की मानिंद बुझा दिया गया हूँ मैं।
मुश्ताक़ अब तो ख़ुद से भी वाबस्ता नहीं हूं मैं, ख़ुदा जाने मैं अपने आप से क्या हो गया हूँ मैं।




