बिहार की राजनीति में एक दौर ऐसा था जब उपेंद्र कुशवाहा का नाम सत्ता के गलियारों में वजन रखता था। सरकार किसी की भी बने, राजनीतिक समीकरणों में उनकी भूमिका तय मानी जाती थी। लेकिन समय का चक्र ऐसा घूम रहा है कि अब वही जादू फीका पड़ता दिखाई दे रहा है।

खुद को चाल, चरित्र और चेहरा वाली पार्टी बताने वाली भाजपा ने बिहार के उच्च सदन के लिए “लगावेलू तू लिपिस्टिक” फेम पवन सिंह को चुना है। उच्च सदन की गरिमा पहले से ही बहाल थी, अब इसमें और चार चांद लग जाएंगे। पवन सिंह जब भाजपा में लाये गए थे तो हमलोगों ने समझा था कि क्राउड पुलर होने की वजह से पार्टी ने इन्हें अपने यहां जगह दी है। ये खुद भी चुनाव जीतेंगे और दूसरों को भी जिताएंगे। मगर यह अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि पार्टी इन्हें चुनाव लड़वाने के बदले विधान परिषद में भेजेगी। पार्टी इन्हें चुनाव लड़ने लायक नहीं समझती। इनसे बेहतर तो फिर मैथिली ठाकुर है जो बिना “लिपस्टिक” गाये चुनाव जीत रही हैं।

मैंने पहले ही कहा था, और अब वही होता दिख रहा है। जैसे ही सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने, उसी दिन यह साफ हो गया था कि NDA में उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक हैसियत लगातार कमजोर होगी। अब बीजेपी और चिराग पासवान की राजनीति ने उपेंद्र कुशवाहा को एक और बड़ा झटका दिया है। चर्चा है कि उनके बेटे दीपक प्रकाश का मंत्री पद भी जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक पद का नुकसान नहीं होगा, बल्कि उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक पकड़ पर बड़ा सवाल होगा। लोकसभा चुनाव में काराकाट से हारने के बावजूद उपेंद्र कुशवाहा को राजनीतिक सम्मान की कोई कमी नहीं रही।
पहले राज्यसभा की सदस्यता मिली, फिर विधानसभा और सरकार में भी उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई। राजनीतिक विरोधियों का आरोप तो यहां तक है कि उनके पुत्र को भी बिना किसी बड़े जनाधार या लंबे राजनीतिक अनुभव के मंत्री पद तक पहुंचा दिया गया। लेकिन राजनीति में सम्मान और अवसर की भी एक सीमा होती है। जब लगातार लाभ मिलने के बाद भी जनाधार मजबूत न दिखे, तब सहयोगी दल भी नए चेहरों की तलाश शुरू कर देते हैं। यही कारण है कि अब भाजपा और एनडीए के भीतर नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं।
भोजपुरी के पॉवर स्टार पवन सिंह को विधान परिषद भेजने की तैयारी और मंत्री दीपक प्रकाश का नाम सामने नहीं आने के बाद राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल उठने लगे हैं कि यदि सीटों और पदों का संतुलन साधना पड़ा तो क्या किसी पुराने सहयोगी को अपनी जगह छोड़नी पड़ सकती है? राजनीति में कोई भी स्थान स्थायी नहीं होता। जनाधार, चुनावी प्रदर्शन और जनता के बीच प्रभाव ही किसी नेता की वास्तविक ताकत होते हैं। काराकाट की हार के बाद भी उपेंद्र कुशवाहा को भरपूर राजनीतिक संरक्षण मिला, लेकिन यदि अब भी संगठन और जनता के स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिखते हैं तो एनडीए नेतृत्व नए विकल्पों पर विचार करेगा, इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बिहार की राजनीति में आज सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब केवल जातीय समीकरण या पुराने राजनीतिक कद से काम नहीं चलने वाला। जनता के बीच प्रभाव और चुनावी उपयोगिता ही किसी नेता की असली पूंजी है। आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए के भीतर जो फेरबदल दिखाई दे रहा है, वह इसी बदलती राजनीतिक सोच का संकेत माना जा रहा है।
अब देखना यह है कि उपेंद्र कुशवाहा एक बार फिर अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव को जीवित कर पाते हैं या फिर बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत होने जा रही है।

