क्या केवल आश्वासनों के सहारे किसानों के दिन फिरेंगे? रितेश सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कृषि क्षेत्र एआई की संभावनाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि भविष्य में एआई आधारित फसल प्रबंधन, सटीक सिंचाई, मौसम-आधारित सलाह और कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग से प्रत्येक किसान को प्रतिवर्ष लगभग 5000 रुपये तक की बचत हो सकती है। सरकार का अनुमान है कि इससे देश की कृषि अर्थव्यवस्था में लगभग 70,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मूल्य सृजित होगा। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल तकनीकी घोषणाओं से भारतीय किसानों की दशकों पुरानी समस्याओं का समाधान हो जाएगा? क्या आज का किसान वास्तव में उस डिजिटल क्रांति का हिस्सा बनने की स्थिति में है, जिसकी परिकल्पना की जा रही है? भारत विश्व की सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। देश की लगभग 45 प्रतिशत कार्यशील आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग 17-18 प्रतिशत के आसपास है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि जिस क्षेत्र पर देश की बड़ी आबादी निर्भर है, उसकी आर्थिक उत्पादकता अपेक्षाकृत कम है। यही कारण है कि खेती आज भी अधिकांश किसानों के लिए लाभ का नहीं, बल्कि संघर्ष का माध्यम बनी हुई है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता निश्चित रूप से कृषि के भविष्य को बदलने की क्षमता रखती है। ड्रोन के माध्यम से खेतों की निगरानी, उपग्रह आधारित मृदा विश्लेषण, सेंसर-आधारित सिंचाई नियंत्रण, मौसम पूर्वानुमान, रोगों की शीघ्र पहचान तथा बाजार मूल्यों का पूर्व विश्लेषण किसानों को अधिक वैज्ञानिक निर्णय लेने में सहायता कर सकता है। इससे लागत घट सकती है, उत्पादन बढ़ सकता है और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है। विकसित देशों में यह परिवर्तन दिखाई भी दे रहा है। किंतु भारत की वास्तविकता यह है कि अधिकांश किसानों के पास दो हेक्टेयर से भी कम भूमि है। ऐसे छोटे और सीमांत किसानों के लिए एआई आधारित तकनीक तक पहुंच, उसकी लागत और उसका उपयोग आज भी एक बड़ी चुनौती है। भारत और चीन की कृषि नीतियों की तुलना महत्वपूर्ण है। चीन ने पिछले दो दशकों में कृषि को केवल खाद्यान्न उत्पादन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और तकनीकी आत्मनिर्भरता का आधार बनाया। चीन ने बड़े पैमाने पर कृषि अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी, स्मार्ट फार्मिंग, रोबोटिक्स, ड्रोन, डिजिटल निगरानी तथा कृषि मशीनरी में भारी निवेश किया। आज चीन विश्व में कृषि ड्रोन का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। उसके लाखों हेक्टेयर खेतों में ड्रोन बीजारोपण, कीटनाशक छिड़काव और फसल निगरानी का कार्य कर रहे हैं। वहां कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत साझेदारी विकसित की गई है।

इसके विपरीत, भारत में कृषि अनुसंधान पर कुल कृषि उत्पादन की तुलना में निवेश अभी भी सीमित है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा पर होने वाला व्यय सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में विकसित देशों और चीन की तुलना में काफी कम है, परिणामस्वरूप नई तकनीकों का विकास और उनका खेतों तक प्रसार अपेक्षित गति से नहीं हो पाया। अनेक राज्यों में आज भी कृषि विस्तार सेवाएं कमजोर हैं और किसान आधुनिक तकनीक की जानकारी से वंचित हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार देश की लगभग 45 प्रतिशत कार्यशील आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगभग 17-18 प्रतिशत ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो देश की लगभग आधी आबादी जिस क्षेत्र पर निर्भर है, उसकी आर्थिक हिस्सेदारी पांचवें हिस्से से भी कम है। यदि पिछले एक दशक में कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार हुए हैं, तो किसानों की आय राष्ट्रीय औसत के बराबर क्यों नहीं पहुंच सकी?
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक, दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत चावल, गेहूं, गन्ना, फल और सब्जियों के उत्पादन में भी विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष कहीं अधिक चिंताजनक है। भारत आज भी अपनी खाद्य तेल आवश्यकता का लगभग 55 से 60 प्रतिशत आयात करता है। दालों के लिए भी समय-समय पर आयात का सहारा लेना पड़ता है। यदि कृषि इतनी मजबूत है तो खाद्य सुरक्षा के इतने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता आज तक क्यों नहीं मिल सकी? नीति आयोग के अनुसार भारत के लगभग 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है। क्या इन किसानों के पास महंगे ड्रोन, सेंसर, स्मार्ट उपकरण और डिजिटल सेवाओं का उपयोग करने की आर्थिक क्षमता है? क्या सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि एआई तकनीक गांव-गांव तक किस मॉडल के माध्यम से पहुंचेगी? यदि नहीं, तो पांच हजार रुपये की अनुमानित बचत का आधार क्या है?
सरकारी दावों से अलग जमीन की हकीकत यह है कि आज भी देश का बड़ा कृषि क्षेत्र मानसून पर निर्भर है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 52 प्रतिशत हिस्सा आज भी वर्षा आधारित है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जहां खेत तक समय पर पानी नहीं पहुंचता, वहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता किस प्रकार चमत्कार करेगी? क्या एआई सूखे खेतों में पानी भी पहुंचाएगी? भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद लगातार चेतावनी देता रहा है कि जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि तापमान वृद्धि और अनियमित वर्षा का क्रम जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में गेहूं, धान, मक्का और अन्य प्रमुख फसलों की उत्पादकता 10 से 30 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकती है। ऐसे में एआई निश्चित रूप से उपयोगी है, लेकिन क्या सरकार कृषि अनुसंधान, जल संरक्षण और सिंचाई विस्तार में भी उसी गति से निवेश कर रही है, जिस गति से डिजिटल कृषि की चर्चा हो रही है?
यदि एआई से प्रत्येक किसान को 5,000 रुपये की बचत होगी, तो क्या सरकार ने यह बताया कि इस तकनीक को गांव-गांव तक पहुंचाने में प्रति किसान कितना निवेश होगा? क्या इसके लिए अलग बजट बनाया गया है? क्या पंचायत स्तर पर एआई सहायता केंद्र स्थापित होंगे? क्या प्रत्येक किसान को डिजिटल प्रशिक्षण मिलेगा? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं, तो बचत का दावा केवल अनुमान बनकर रह जाता है। किसान को यह भरोसा चाहिए कि सरकार केवल नई तकनीक का सपना नहीं दिखाएगी, बल्कि उसकी मूल समस्याओं का समाधान भी करेगी। सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि अनुसंधान, ग्रामीण सड़कें, बिजली, भंडारण, निर्यात नीति और बाजार सुधार पर समान गति से काम करना होगा।
कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता निश्चित रूप से भविष्य का रास्ता है, लेकिन भविष्य की इमारत वर्तमान की मजबूत नींव पर ही खड़ी होती है। यदि खेत तक पानी नहीं पहुंचेगा, यदि किसान को उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा, यदि अनुसंधान पर पर्याप्त निवेश नहीं होगा और यदि तकनीक केवल बड़े किसानों तक सीमित रह जाएगी तो 70,000 करोड़ रुपये के मूल्यवर्धन का दावा किसानों के जीवन में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला पाएगा।

