पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।
इतते वे चक्की भली, पीस खाय संसार।।
कांकड़ पत्थर जोड़ि के, मस्ज़िद लियो चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दै, क्या बहरा हुआ खुदाय।।
कबीर दास

बाबरी मस्जिद का विध्वंस और मन्दिर या मस्जिद का बनना या ना बनना भारतीय राजनीति के अहम पड़ावों में से एक है.धर्म और राजनीति का घालमेल सदियों से होता आ रहा है पर वर्तमान स्वरूप काफी व्यथित करने वाला है। धर्म केवल नियम कानूनों में बँधना नहीं बल्कि धर्म इंसान को दूसरे इंसान के साथ इंसानियत का भाव बनाए रखने में मदद करता है। आज के परिप्रेक्ष्य में यही जरूरी है। देखिए ना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राम की उपमा, योगी आदित्यनाथ को हनुमान, मुलायम सिंह यादव को रावण, अरविंद केजरीवाल को मारीच, अखिलेश यादव को मेघनाथ और मायावती को शूर्पनखा बना आज कि राजनीति खुद से ही खुद की जग हंसाई करवा रही है। मौजूदा राजनीति के इतिहास में शम्बूक का सिर और एकलव्य के अंगूठे काटे जाने शुरू हो गए हैं। महिलाओं को नंगा करने और उनसे बलात्कार करने की परंपरा तो जोर शोर से आरम्भ हो गई है। बस राम मंदिर बनने की देर है। चाहे देश और समाज श्मशान में बदल जाए। हाल के वर्षों में देश में राष्र्टवादी वर्चस्व थोपने के पुरजोर प्रयास किये जाते रहे हैं। अब इसमें और तेजी आई है। दलितों और पिछड़ों के महानायकों को नायकत्व को खंडित करने का प्रयास तेज हो गया है। देश मे परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आ रहा है। पहले गुजरात और बाद में अधिकांश राज्यो में राम सेवकों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है वैसे ही उनकी गुंडई में भी। जबकि देश के प्रधानमंत्री मंत्री आंबेडकर के सपनों का भारत बनाने की बात बार बार अपने भाषण में करते है। आपको याद होगा ही कि चाणक्य नें बहुत पहले आर्यो की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले अपने राजनीतिज्ञ वारिसों को यह सीखाया और पढ़ाया था कि द्विज राजनीति सदा से अपना वर्चस्व कायम करने और उसे बनाये रखने के लिए छल प्रपंचों का इस्तेमाल करती रहती है। आजादी के तुरंत बाद हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने काशी जाकर दो सौ ब्राह्मणों और पुरोहितों के चरण धोये थे। उनके इस कृत्य पर जवाहर लाल नेहरू बहुत नाराज हुए और डॉ. राम मनोहर लोहिया ने तो यहाँ तक कहा था कि भारतीय दुनिया में सबसे अभागे लोग हैं। उनके प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति तथाकथित विद्वतजनों का चरण धोता है। पर तत्कालीन राष्ट्रपति को न तो अपने पद की गरिमा की चिंता थी और न ही देश की अस्मिता की परवाह। वैसे आप इसे राजनीति ना कह कर सेवा भाव कह सकते हैं. वैसे राजेन्द्र प्रसाद ही नहीं, बाद में अधिकांश राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी बनारस जाकर पंडितों के पांव छूने से लेकर, शंकराचार्यो के मठों और दरबारों में जाकर उनके पैर धोते रहे हैं। उनकी देखा देखी राज्यपालों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक और मंत्रियों से लेकर कैबिनेट सचिवों तक ने यही सब किया। साथ ही सरकारी धन को मठों,मन्दिरों तथा आश्रमों में बांटने का प्रावधान रहा है। आज की तारीख में अगर सरकारों द्वारा मठों, मन्दिरों, आश्रमों तथा विभिन्न देवी और देवस्थानों को खैरात में बांटे जाने वाले धन का ब्यौरा लें तो यह पूर्व की तुलना में बहुत अधिक होगा। ये भी राजनीति का एक रूप है। पर आज कि राजनीति द्विज राजनीति हो चुकि है। एक दल इलेक्शन के पूर्व संध्या पर खुल्लम खुल्ला ऐलान करता हैं कि राम मंदिर पर हिन्दू मुसलमानों के बीच राजीनामा हो या न हो, सुप्रीम कोर्ट के साथ संविधान भी उनके लिए कोई मायने नहीं रखता, हम हर हालत में मन्दिर वहीं अयोध्या में बनाएंगे। बाबरी मस्जिद ढाह कर राम सेवकों ने राम राज्य की दिशा में एक प्रयोग तो पिछली शताब्दी में कर लिया था। अब नई शताब्दी में राम मंदिर बनाकर नया प्रयोग और होगा? बजरंगियों के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक नही हजार प्रयोग करने पर उतारू हैं? वैसे 60 साल के बदले 60 महीना, काम राम भरोसे फिर भी बर्चस्व तो चाहिए ही ना यानि द्विज राजनीति ? तो भूलें नहीं चाणक्य की वो वाणी, द्विज राजनीति सदा से अपना वर्चस्व कायम करने और उसे बनाये रखने के लिए छल प्रपंचों का इस्तेमाल करेगी ही,जो होगा ही। जैसा की धर्म के बारे में सामान्य रूप से कहा जाता है कि यह जीवन जीने का रास्ता बताता है। सभी धर्मों में इसी बात को लेकर अलग अलग व्याख्या है। मैं विभिन्न धर्मों व पंथों के बारे में व उनके मतों के बारे में गहराई में नहीं जाना चाहता। पर मेरा मानना है कि धर्म के नाम पर गुमराह करना और लुटना बंद होना चाहिए। धर्म के नाम पर आडंबर नहीं होना चाहिए। धर्म का उपयोग राजनीति में नहीं होना चाहिए यह बात देश में सभी को पता है और वर्षों से पता है बावजूद इसके वर्तमान हालात कुछ अलग ही बात कहते हैं। धर्म और राजनीति के घालमेल के कारण विचित्र परिस्थितियाँ निर्मित होते जा रही हैं। जिसका परिणाम हम सभी देख रहे हैं। हमें अपने व्यवहार व आचरण को लेकर सोचना होगा और इस बात को ध्यान में लाना होगा कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है।हम भले ही किसी भी ओहदे पर बैठे हों और किसी भी प्रकार का काम कर रहे हों, अगर हम इंसानियत के धर्म को अपना पहला धर्म समझेंगे तब बाकी सभी कुछ आसान हो जाएगा और मेरा मानना है कि यह केवल शिक्षा से ही आ सकता है। धर्म के कई ठेकेदार अशिक्षित लोगों को बरगलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। वे लोग शिक्षित लोगों पर अपनी दादागिरी से यह आदेश नहीं देते, क्योंकि उन्हें पता है कि शिक्षित व्यक्ति रुढ़िवादी और ढोंग में भरोसा नहीं करता, केवल अच्छे कर्म व इंसानियत को ही मानता है। मेरा ऐसा व्यक्तिगत मत है कि धर्म की सही व्याख्या बच्चों को घरों में दिए जाने वाले संस्कारों में छिपी है। हम बच्चों को संस्कार देते समय सावधानी बरतते हैं और उन्हें भलाई, ईमानदारी के साथ जीवनयापन करने की बातें करते हैं पर स्वयं की बारी आने पर हम कायर, कपटी, झूठे, बेईमान बनने में किसी भी प्रकार की शर्म नहीं पालते। आज हमारे देश में कला, संस्कृति से लेकर भगवान भी राजनीति के कटघरे में खड़ा नजर आ रहे है। यह स्थिति क्यों बनी और क्या ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी? जबतक हम धर्म का सही मायने में अर्थ ही समझ नहीं पाएँगे तब निश्चित रूप से इसका गलत उपयोग ही करेंगे। पहलू ख़ान, जुनैद और अख़लाक़ की मौत जैसे मुद्दों पर विचार करना ज़रूरी है लेकिन भारतीय जनता पार्टी और उसकी राजनीति ये नहीं चाहती है. ऐसे मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखने से बीजेपी के विचार को संजीवनी मिलेगी और यही संघ परिवार चाहता भी है. अब तक जो हिंदू अपने घर के कोने में पूजाघर बनाकर अपने आराध्य को याद करके संतुष्ट रहते थे और तीर्थयात्रा जिनके लिए अस्मिता का प्रश्न था ही नहीं, उन्हें भी ये महसूस कराया जा रहा है कि बाबरी मस्जिद तोड़कर उसकी जगह राम मंदिर के निर्माण से ही इतिहास में हिंदुओं पर ’सैकड़ों वर्षों तक हुई ज़्यादतियों’ का बदला लिया जा सकता है. याद रहे 80 के दशक में सरयू नदी के तट पर बसा अयोध्या साल में सिर्फ एक बार सुर्खियों में आता था, जब मानसून के दिनों में नेपाल से भारत आने वाली नदियों में बाढ़ आती थी. या फिर पांच सालों में एक बार, जब चुनाव के दिनों में कम्युनिस्ट पार्टी फैजाबाद और अयोध्या को लाल रंग से रंग देती थी. कई सालों तक फैजाबाद मध्य उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्टों का गढ़ बना रहा.राम मंदिर का भारतीय राजनीति में आना यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक असमान्य रूप से घटी सदी के जैसी थी. किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगस्त 1990 में शुरू होने वाली घटना इस तरह से सामाजिक परिवर्तन करेगी और आजादी के बाद की स्थिति को पूरी तरह से बदलकर रख देगी. आपको मैं इस घटना को समझाने के लिए वीपी सिंह के युग में ले चलता हूं। वीपी सिंह की अगुवाई वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को एक साल से भी कम समय हुआ था लेकिन लोगों में सरकार के प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा था. उधर हरियाणा के मजबूत नेता और उप प्रधानमंत्री देवीलाल की पार्टी जनता दल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर रही थी. चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था और इस इंतजार में थे कि कब फिजा उनकी तरफ का रुख करे और वह अपने पत्ते सबके सामने खोलें.जिस समय वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे, उस समय विरोधाभासी फैसलों के चलते उनकी सरकार पर लगातार खतरा मंडरा रहा था. हालांकि एक प्रधानमंत्री के तौर पर वह एक सशक्त नेता थे. उनकी सरकार वामपंथियों के समर्थन पर चल रही थी. 1989 के आम चुनावों में बीजेपी अयोध्या लहर पर सवार थी और उसने चुनाव में सबसे ज्यादा 84 सीटों पर जीत हासिल की थी.भीतर और बाहर की चुनौती का सामना करने के लिए उस दौरान वीपी सिंह ने जनता पार्टी सरकार द्वारा गठित मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया. अगस्त में उन्होंने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों या ओबीसी के लिए 27 फिसदी आरक्षण की घोषणा की.हिंदू निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन को देखते हुए भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन को हवा दी और मतदाताओं को अपनी तरफ करने के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा की घोषणा कर दी. गुरुओं की बड़ी फौज के बीच वीएचपी ने बिहार के सहरसा के एक दलित लड़के को अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास का पहला पत्थर रखने के लिए चुना. स्वतंत्र भारत की राजनीति के बारे में एक अलहदा समझ विकसित करने में बाबरी मस्जिद के विध्वंस का खास योगदान है. इस घटना ने देश की राजनीति की परिभाषा और मुहावरा बदल दिया. आडवाणी को गिरप्तार कर लालू यादव बिहार में मुसलमानों और पिछड़े वर्ग के मसीहा बन गए. समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिहं यादव नए अवतार के रूप में उभरे और उन्होंने मौलाना मुलायम के रूप में अपनी अलग छवि बनाई.कई सालों बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि उनकी कार्रवाई आवश्यक थी, उन्होंने दोहराया, मुस्लिम समुदाय की आस्था को बनाए रखने और देश की एकता की रक्षा के लिए यह जरूरी था. भगवान राम ने कई सामाजिक दूरियां पाटीं और कई समुदायों को गले लगाया. वे किसी में कोई भेद नहीं करते थे. राम मंदिर की नींव रखने के लिए दलित का चयन स्पष्ट रूप से पूरे देश में एक संकेत भेजता है. जो सदियों से उपेक्षा झेलने के बावजूद धर्म के लिए समर्पित हैं, वे सबसे बड़े भक्त हैं, इसलिए उनमें से एक को नींव रखने के लिए क्यों न आमंत्रित किया जाए? प्रस्तावित राम मंदिर के आधारशिला रखने के लिए दलित लड़के कामेश्वर चैपाल को चुना. साफ है कि यह राजनीति से प्रेरित था. अयोध्या विवाद को सुलझाने को शंकराचार्य से लेकर तमाम बड़े संतों, राजनेताओं और तमाम बड़ी शख्सियतों ने कोशिश की लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा है। यह जटिल विवाद न सिर्फ धर्म जगत से बल्कि राजनीति से भी जुड़ा रहा है। राम मंदिर निर्माण को लेकर जहां मौजूदा मोदी सरकार पर दबाव बना हुआ है, वहीं इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई चल रही है। संत, आम जनता और पार्टी के कार्यकर्ता भी इस दिशा में मोदी की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम चुनाव से पहले मोदी इस बाबत कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं, याद रहे अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर युगों युगों से चली आयी हुई ऐसी ही यह निरन्तर परम्परा है जो इस्लाम के जन्म के कई युगों पहले से चली आ रही है। अयोध्या के अलावा कोई दूसरा स्थान भगवान श्रीराम का जन्मस्थान कहीं भी नहीं। युगों की यह निरन्तर पूजा परम्परा हिन्दुओं ने जतन से की है। प्रश्न केवल मंदिर का ही नहीं, उसी स्थान पर भव्य मंदिर बनाने का है। जहाँ श्रीरामलला विराजमान है, जहाँ युगों युगों से 4 लाख प्राणों की आहुति देकर भी हिन्दू पूजा करते आये, उसी श्रीराम जन्मभूमि पर ही भव्य मंदिर बने, यह महत्व का है। बाबरी मस्जिद के दरवाजे खोलने का आदेश देना, देश को अंधेरे में झोंकने जैसा है. देश को जिस रोग ने जकड़ा है उसे जड़ सहित उखाड़ना होगा. केवल आर्थिक प्रगति ही मायने नहीं रखती. राजनीतिक पार्टियां ध्रुवीकरण का विरोध करने की जगह रोग की जड़ों में पानी डाल रहीं हैं जिसकी वजह से केवल संप्रदायिक दंगे ही जन्म लेंगे.भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने कभी नहीं स्वीकार किया कि उनकी राजनीतिक मंशा की वजह से देश में सांप्रदायिकता बढ़ती गई और हिंदू और मुस्लिम एक दूसरे को शक की नजरों से देखने लगे. कहने के लिए इसका त्वरित लाभ उन्हें जरूर मिला लेकिन उनके इस लाभ ने हिंदू धर्म के मूल सिद्धांत को ही ताक पर रख दिया. हिंदुओं की बड़ी आबादी हिंदू धर्म का सही अर्थ जानने से वंचित रह गई.अयोध्या में राम मंदिर क्यों नहीं बनना चाहिए. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे पर छिड़ी सियासत ने उस विवादित ढांचे की ही बलि ले ली और देश सांप्रदायिक उन्माद के नए दौर में प्रवेश कर गया लेकिन इस दौर के बीज तो दो साल पहले ही बो दिए गए थे। 90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने मंडल आंदोलन की आग में सुलग रहे देश को कमंडल की सियासत की तरफ मोड़ दिया। आगे बीजेपी, पीछे वीएचपी और संघ। इस कमंडल ने बीजेपी को सत्ता के द्वार तक पहुंचा दिया। पार्टी का उद्देश्य पूरा हुआ। सत्ता का स्वाद तो चख लिया लेकिन राम मंदिर का नारा वक्त के साथ ठंडा पड़ता गया। वीएचपी के राममंदिर आंदोलन में बीजेपी खुलकर कूदी तो उसको इसका फायदा भी मिला। 1984 में जो बीजेपी लोकसभा में महज 2 सांसदों वाली पार्टी थी 1991 में वही पार्टी 120 सीट जीतकर बड़ी सियासी ताकत बन गई। 1992 के बाद राम मंदिर आंदोलन की वजह से हुआ वोटों का ध्रुवीकरण इस कदर बढ़ा कि 1996 के आमचुनाव में बीजेपी 161 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने सरकार बनाने का दावा तक पेश कर दिया, हालांकि 13 दिन बाद बहुमत साबित न कर पाने की वजह से अटल सरकार गिर गई। 1990 के दौर में समूचे देश में खासकर उत्तर भारत में राम मंदिर आंदोलन की हवा बह रही थी।हालांकि बीजेपी इस आंदोलन में अब सक्रिय रूप से भागीदार थी लेकिन उसके नेताओं ने खुद को सियासत के दायरे में रखा। वीएचपी की ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी। अशोक सिंघल, साध्वी ऋतंभरा, तब बजरंग दल में शामिल विनय कटियार जैसे नेताओं के उग्र भाषणों ने देश के मतदाताओं में भी गहरा ध्रुवीकरण कर दिया था। 1991 के उस दौर के बाद 1992 में क्या हुआ ये कोई छुपी हुई बात नहीं है। इसके बाद बीजेपी को मिली चुनावी सफलता के पीछे भी इसी आंदोलन का हाथ माना जाता है। ये भी सच है कि 1992 के बाद तीन बार बीजेपी की सरकार बनी लेकिन गठबंधन धर्म का हवाला देकर राम मंदिर मुद्दा भुला दिया गया। यही वजह है कि लंबे अरसे बाद वीएचपी को राम मंदिर की याद आई है तो किसी को ताज्जुब नहीं हो रहा है। विरोधियों का आरोप है कि बीजेपी वीएचपी के जरिए फिर 90 के दौर का माहौल जिंदा करने की फिराक में है। मेरा मानना है कि भौतिकवादी जीवनशैली के चलते हम संस्कारों से लेकर धर्म को अपने अनुसार बदलने पर तुले हैं पर यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि यह बदलाव हमारे लिए भविष्य में सकारात्मक होगा या नकारात्मक। निश्चित रूप से अब तक जो स्वरूप सामने आया है वह नकारात्मक है। इस कारण अब हमें धर्म की व्याख्या करते समय इस बात का ध्यान आवश्यक रूप से रखना होगा कि हम राजनीति को अलग रखें और धर्म को अलग तभी इंसानियत धर्म के संस्कारों का बीजारोपण आगे आने वाली पीढ़ी में कर पाएँगे। आपको बता दें कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कई बार नई तारीखें दे चुका है।एक बार फिर सुनवाई शुरू होगी। अयोध्या मामले में कुल 19 हजार दस्तावेज हैं। इन तमाम दस्तावेजों को इंग्लिश में ट्रांसलेट किया गया है। साथ ही अदालती बहस की कॉपी (प्लीडिंग) पेश की गई है। दीवानी मामले की सुनवाई में ये दस्तावेज और प्लीडिंग अहम होते हैं। जब मामले की सुनवाई शुरू होगी तो एक एक पक्षकार अपना पक्ष रखना शुरू करेंगे। कुछ साल पहले तक समाजवादी पार्टी यदा कदा अयोध्या में ढहाई गई बाबरी मस्जिद को फिर से बनाए जाने की माँग करती रही थी. ख़ुद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने 6 दिसंबर 1992 के बाद पूरे देश को भरोसा दिलाया था कि बाबरी मस्जिद का निर्माण उसी जगह पर करवाया जाएगा.पर आज बाबरी मस्जिद ध्वंस के 25 बरस बाद ये चर्चा तो हो रही है कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के क्या क्या तरीक़े होंगे, पर मस्जिद निर्माण पर कोई बात नहीं होती. इसी क्रम में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र पर मँडरा रहे खतरे की भी बात करते हैं। हमारे देश में हिंदू और मुसलमानों को लक्ष्य करके इसी तरह से सांप्रदायिक स्थितियाँ पैदा की जाती हैं। बहुसंख्यकों का धार्मिक राजनीतिक वर्चस्व चाहने वाले उन्हें राष्ट्र का पर्याय घोषित करते हैं जिसका अर्थ यह निकलता है कि बहुसंख्यक या हिंदू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं। अब हिंदुओं के सारे हित राष्ट्रीय हित हुए जबकि अल्पसंख्यक मुख्यतः मुसलमानों से जुड़े सारे हित और क्रियाकलाप सांप्रदायिक हुए। हिंदुओं की धार्मिक वर्चस्व की राजनीति का यह फासीवादी रूप है। राम मंदिर का मसला कोर्ट में है और कोर्ट का आखिरी फैसला आना अभी बाकी है। लेकिन इससे पहले एक बार फिर राम मंदिर निर्माण को लेकर हलचल लगातार बनाई जा रही है। सांप्रदायिक कट्टरता किसी भी समुदाय की हो वह अंततः अन्य समुदायों के लिए अहितकर ही होती है। कट्टरता किसी भी सूरत से सहनशीलता और सहिष्णुता की विरोधी होती है। इसीलिए धर्म के नाम पर ही असहिष्णुता का माहौल बन जाता है। दो अलग धर्म के व्यक्तियों का टकराव निश्चित रूप से धार्मिक टकराव में बदल जाता है और हिंसात्मक स्थितियाँ पैदा होती हैं। वास्तव में सांप्रदायिकता हमारे डीएनए को प्रभावित करती है। हमारे सबसे विश्वसनीय रिश्ते पर प्रहार करती है। कल तक जो शरद सेक्युलर था वही बदली हवा में हिंदुओं की हिंसा को उनका रिएक्शन मानने लगता है। महंत की बातें उसे सही सी लगने लगती हैं भले कुछ हद तक ही सही। उसी के प्रभाव में वह आगे कहता है कि “मैं हिंदू हूँ। एक हिंदू होने के नाते मैं चुप नहीं रह सकता। सोशल मीडिया ट्रोलिंग के ज़माने में मंदिर मस्जिद को फिर से बनाए जाने का ज़िक्र करना भी ख़तरे से ख़ाली नहीं है. “घृणा और ईष्र्या के आधार पर कोई नवनिर्माण नहीं किया जा सकता, केवल मनुष्य, समाज और देशों को बाँटा जा सकता है। धर्म और संस्कृति का घालमेल भी अनेक त्रासदियों को जन्म देता है। धर्म व्यक्तिगत होता है, संस्कृति सामूहिक होती है। वह धर्म और संप्रदाय से ऊपर मनुष्यता के सूत्र जोड़ने वाली शक्ति है। जब देश की सबसे पुरानी पार्टी काँग्रेस ही अपने नेता राहुल गाँधी को ’जनेऊधारी हिन्दू’ साबित करने के लिए शीर्षासन कर रही हो तो उसे पीवी नरसिंहाराव के वायदे की याद दिलाना बेमानी ही साबित होगा और रही बात भाजपा की तो वो अलग सपनों के राजनीति में खोई है, वैसे मैं मंदिर मस्जिद का नहीं एम्स,आई आई टी,जेएनयू,बीएचयू का पैरोकार हूं ये मेरा और सिर्फ मेरा अपना राय है।

