जाति और दलों के भीतर की राजनीति समझने का अवसर- डॉ.उपेंद्र कश्यप

आज बिहार के चुनावी राजनीति को कई संदेश प्राप्त होने वाले हैं। पटना के बांकीपुर विधान सभा उप चुनाव परिणाम आने के बाद संदेशों का आकलन होगा। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि सबकी सांस अटकी हुई है। इसने कई संदेश दिए हैं। भाजपा की राजनीति को समझने का एक मौका भी है और बिहार में जो कास्ट पॉलिटिक्स (जाति की राजनीति) है उसको भी। मतदान व्यवहार के संदर्भ में आकलन किया जा सकता है। यहां भाजपा के नीरज कुमार सिंहा, जन सुराज के प्रशांत किशोर के बीच सीधा मुकाबला है। राजद की रेखा गुप्ता मुकाबले में शायद नहीं आ सकेंगी। भाजपा खेमे में अपने प्रत्याशी के जीत को लेकर आश्वस्ति है।
किंतु यह भी चिंता है कि 2025 में नितिन नवीन यहां से 51936 वोट से जीते थे, यह मार्जिन क्या आधा से भी कम हो जाएगा। ऐसा है तो क्यों है। दूसरी तरफ जन सुराज के प्रशांत किशोर हैं। उनके पक्ष में सवर्ण का भी मतदान हुआ। विशेष कर भूमिहार समाज का। इसका भी अपना एक संदेश है। प्रशांत किशोर अगर चुनाव जीत भी नहीं सके तो एक बेहतर परिणाम वह देते हुए अवश्य दिख रहे हैं। तेजस्वी यादव तो पूरे चुनाव प्रदेश से ही गायब थे। बहुत अंत समय आये।

बांकीपुर के बांकपन से कई संदेश मिलते हैं यहां प्राय: मतदान का प्रतिशत कम रहा है और यह भी कहा जाता है कि सबसे पढ़ा लिखा वोटर बांकीपुर में है। फिर भी वर्ष 2025 की अपेक्षा सात प्रतिशत कम मतदान हुआ। जिससे यह एक बात तो साफ है कि पढ़ा लिखा तबका आज भी मतदान को लेकर बहुत उत्साहित नहीं होता। बांकीपुर के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि कायस्थ जिनकी संख्या काफी है, वह मतदान करने भी नहीं निकलते। इस बार भी यह देखा गया कि इस समाज का अधिकतर वोट भले ही जाति पार्टी के कारण नीरज कुमार सिंहा के पाले में गया, लेकिन मतदान को लेकर उत्साह नहीं दिखा। घर मे बैठे रहे। इसका भी प्रभाव परिणाम पर पड़ेगा। खैर जब तक आप यह आलेख पढ रहे होंगे चुनाव परिणाम के रुझान स्पष्ट पता चल गए होंगे। बांकीपुर का बांकपन जाने के लिए हम यहां के मतदाताओं के मतदान व्यवहार का विश्लेषण करेंगे। जिसमें कई संदेश छुपे हुए हैं। भाजपा ने अपने कैंडिडेट यहां बदले। एक नकारात्मक संदेश गया। सबसे प्रमुख फैक्टर तो खुद सम्राट चौधरी रहे,
जो बिहार के मुख्यमंत्री हैं। जिन परिस्थितियों में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया उससे बिहार का सवर्ण तबका नाराज है। जिसमें भरत तिवारी एनकाउंटर का भी एक पक्ष है। छोटे-छोटे कई कारणों से सवर्ण समाज में सम्राट चौधरी को लेकर, कुछ हद तक भाजपा से भी, नाराजगी काफी है। भूमिहार समुदाय ने इसे प्रकट भी किया। सवर्ण समुदाय का वोट टूटा है। यह प्रशांत किशोर के पक्ष में गया है। खुद भाजपा के बड़े नेता मानते हैं कि उसका बड़ा हिस्सा टूटा है। वैश्य समाज जो भाजपा का कोर वोटर माना जाता है, उसका भी एक तबका राजद की रेखा गुप्ता (वैश्य होने के कारण) और साथ-साथ पीके के पक्ष में भी मतदान किया है। यानी स्वर्ण और वैश्य जो भाजपा के आधार वोटर हैं, उसमें टूट भाजपा के वैसे दिग्गज नेता भी मानते हैं, जो इस चुनावी कैंपेन में पूरी तरह शामिल थे। अब सवाल यह उठता है कि सवर्ण इतने नाराज क्यों थे। भाजपा के कुछ नेताओं का स्पष्ट मानना है कि सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के कारण सवर्ण समुदाय में नाराजगी है।
उनका मानना था कि किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री मनाया जाना चाहिए था, जबकि पहली बार भाजपा की सरकार बन रही थी। लेकिन भाजपा के दिग्गज नेता का मानना है कि यह संभव ही नहीं था। कुछ सवर्ण नेताओं का नाम लेकर उन्होंने साफ-साफ कहा कि नीतीश कुमार के साथ रहने के लिए उनको गालियां दी गई। अब ऐसे में अगर किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री बनाया जाता तो तेजस्वी यादव के हाथ में सत्ता का चेक काट कर सौंपने जैसा होता। कुछ जो सवर्ण नेता मंत्री न बनने के कारण नाराज हैं, उन्होंने इस आग को हवा भी दी। तो क्या इस आग को हवा देने का जो काम किया गया उसे भाजपा के अंदर खाने भी सपोर्ट मिल रहा था। इस मुद्दे पर भाजपा में दो विचार हैं। एक पक्ष का मानना यह है कि भाजपा भी चाहती थी कि जो नाराजगी है उसका प्रकटीकरण अगर हो जाता है तो नाराज समूह का गुस्सा ठंढा पड़ेगा, जो आगे चलकर भाजपा के पक्ष में जाएगा। ऐसा मानने वालों का तर्क है कि भाजपा यह मानकर चल रही है कि जीत सुनिश्चित है।
भले ही जीत का अंतर कम हो। लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है, जो यह मानता है कि अगर नाराजगी को भाजपा के नेताओं ने अंदर खाने से समर्थन दिया और कहीं यह भारी पड़ गया तो? प्रशांत किशोर जीत गए तो? बिहार ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश तक पीके का प्रभाव बढ़ेगा और उनके राजनीतिक गतिविधियों पर से भाजपा को नुकसान हो सकता है। ऐसे भाजपा नेताओं का मानना है कि सवर्ण समुदाय के लोगों को यह समझना होगा कि बिहार की जो वर्तमान राजनीतिक स्थिति है उसमें सवर्ण का सीएम बनना मुश्किल है। दूसरी बात यह थी कि नीतीश कुमार की जाति कुर्मी समाज ने कभी भी दूसरी जातियों को भला बुरा नहीं कहा।
हालांकि उसने भी सत्ता का स्वाद कम नहीं चखा है। लेकिन सम्राट चौधरी के पक्ष में कुछ कुशवाहा नेताओं ने अनाप-शनाप बयानबाजी की। आक्रामकता दिखाई। जिससे भी दूसरे लोगों में नाराजगी पैदा हुई है। खुद बांकीपुर में स्मार्ट सिटी के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर उसकी बिक्री पर रोक लगा दी गई। इससे कुर्मी समाज बहुत हद तक प्रभावित हुआ। जिनके पास यहां जमीन अधिक हैं। ऐसे में कुर्मी समुदाय भी नाराज था और इसने भी पीके को कुछ हद तक साथ दिया। बाद में सरकार ने जमीन से ऐसे प्रतिबंध वापस ले लिया। यह सब इसलिए था कि सम्राट चौधरी को सबक सिखाया जाए। भाजपा में जो तानाशाही वाली प्रवृत्ति दिखने लगी है उसे ठंडा करने के लिए इस तरह के काम किए गए। भाजपा के अंदर खाने नेताओं का मानना है कि भाजपा नीरज कुमार सिन्हा की जगह अगर ऋतुराज सिंह को या डॉक्टर अजय आलोक को प्रत्याशी बनाती तो जीत हार का मार्जिन अधिक होता।



