आजादी के इतने साल बाद भी भारत की आम जनता, छात्र और किसान तीनों एक ही सवाल पूछ रहे हैं, कब तक? महंगाई की आग में जल रही घरेलू चूल्हा, बेरोजगारी की मार झेल रहे युवा, और खेतों में सूखते सपने देख रहे किसान। हर तरफ हाहाकार है, लेकिन सत्ता के गलियारों में ठहाके गूंज रहे हैं। प्रधानमंत्री विदेश यात्रा में मस्त हैं । “जनता परेशान, स्टूडेंट परेशान, किसान परेशान बस सरकार मस्त” यह नारा आज पूरे देश की पीड़ा को बयां कर रहा है।

देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े भले ही सरकारें चमकदार दिखाती हों, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और है। एक साधारण परिवार के लिए रसोई का बजट अब सबसे बड़ा टेंशन बन गया है। आलू-प्याज-टमाटर की कीमतें आसमान छू रही हैं। दाल-चावल-तेल रोजमर्रा की जरूरतें महंगी हो चुकी हैं। मध्यम वर्ग का कर्मचारी महीने के अंत में सैलरी खत्म होने से पहले ही कर्ज लेने को मजबूर है। EMI, किराया, स्कूल फीस, दवा-इलाज, हर चीज ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जनता की परेशानी शहरों में रहने वाला मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा फंस गया है। नौकरी है तो तनख्वाह कम, महंगाई ज्यादा। नौकरी नहीं तो पूरे परिवार पर बोझ। छोटे व्यापारी, दुकानदार, मजदूर सबकी कहानी एक सी है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें जब-तब बढ़ती हैं, तो पूरे बाजार में लहर दौड़ जाती है। ट्रांसपोर्ट महंगा, सामान महंगा, खाने-पीने की चीजें महंगी। नतीजा? लोग दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और बदतर है। गांवों में बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं अभी भी सपना बनी हुई हैं। कई जगहों पर अभी भी हैंडपंप से पानी निकालना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाएं नदारद हैं। सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं, डॉक्टर नहीं, बिस्तर नहीं। निजी अस्पतालों में इलाज कराने की सोच भी लोग छोड़ चुके हैं क्योंकि खर्च जीवन भर की कमाई मांग लेता है। बेरोजगारी ने पूरे समाज को हिला रखा है। लाखों युवा डिग्री लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं। सरकारी नौकरियों के लिए लाखों की भीड़ एक-दो हजार पदों पर। प्राइवेट सेक्टर में भी ठेका प्रथा, कम सैलरी और कोई सुरक्षा नहीं। महिलाएं घर बैठी हैं या कम वेतन वाली नौकरियों में। बुजुर्ग पेंशन के इंतजार में हैं, लेकिन पेंशन भी समय पर नहीं आती। इस बीच सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे करती हैं। हाईवे, एयरपोर्ट, स्मार्ट सिटी सब दिखता है, लेकिन आम आदमी को इनका फायदा कहां पहुंच रहा है? अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब। असमानता बढ़ रही है।
स्टूडेंट की परेशानीछात्रों की स्थिति शायद सबसे दर्दनाक है। शिक्षा अब व्यापार बन चुकी है। कोचिंग संस्थान, प्राइवेट स्कूल-कॉलेज फीस वसूलने में लगे हैं। एक औसत मध्यम वर्ग परिवार अपनी संतान को अच्छी शिक्षा दिलाने के चक्कर में सालाना लाखों रुपये खर्च कर रहा है। फिर भी नतीजे शून्य। NEET, JEE जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक, घोटाले और अनियमितताएं आम बात हो गई हैं। छात्र महीनों-महीनों तैयारी करते हैं, रात-दिन नहीं देखते, लेकिन सिस्टम की गड़बड़ी से उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। दिल्ली, कोटा, बिहार, यूपी , हर जगह छात्रों की पीड़ा एक समान है। ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर महामारी के समय जो हुआ, उसने छात्रों को और पिछड़ा दिया। गांवों के बच्चे इंटरनेट और स्मार्टफोन के अभाव में पढ़ाई से वंचित रहे। अब भी कई स्कूलों में शिक्षक नहीं, बुनियादी सुविधाएं नहीं। उच्च शिक्षा में आरक्षण, फीस बढ़ोतरी, सिलेबस में बार-बार बदलाव ,छात्र कन्फ्यूज हैं। रोजगार की कोई गारंटी नहीं। इंजीनियरिंग, एमबीए, बीएड जैसी डिग्रियां लेकर भी युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। “पढ़-लिखकर क्या करना है” यह सवाल अब आम हो गया है। छात्र राजनीति से लेकर नौकरी तक हर जगह हताशा महसूस कर रहे हैं। कुछ छात्र आंदोलन कर रहे हैं, कुछ चुपचाप सह रहे हैं। लेकिन सरकारें बस आश्वासन देती रहती हैं।
किसान की परेशानीभारत कृषि प्रधान देश है, फिर भी किसान सबसे ज्यादा परेशान है। खेतों में मेहनत तो पूरी, लेकिन लाभ शून्य। MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) का वादा हर चुनाव में किया जाता है, लेकिन लागू नहीं होता। गेहूं, धान, दालें, सब्जियां जब किसान फसल बेचता है तो भाव गिर जाते हैं। दलाल और बड़े कारपोरेट मुनाफा कमा लेते हैं। कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। बैंक, सहकारी समितियां, माइक्रोफाइनेंस हर तरफ से लोन। सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, कीड़े-मकोड़े प्राकृतिक आपदाएं भी साथ नहीं देतीं। फसल बीमा का पैसा समय पर नहीं मिलता। आत्महत्या के आंकड़े भयावह हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, पंजाब हर राज्य में किसान कर्ज में डूबे हैं। नए कृषि कानूनों के समय जो आंदोलन हुआ, उसने किसानों की आवाज को दुनिया तक पहुंचाया। लेकिन समस्या जस की तस है। खाद, बीज, कीटनाशक महंगे हो गए हैं। बिजली महंगी, डीजल महंगा। सिंचाई की व्यवस्था ठीक नहीं। बड़े-बड़े कारपोरेट अब खेती में घुस रहे हैं, छोटे किसान बेदखल होने की आशंका में हैं। महिलाएं खेतों में पुरुषों के साथ-साथ काम करती हैं, लेकिन उनकी मेहनत को मान्यता नहीं। युवा किसान शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांव खाली हो रहे हैं। सरकारें ड्रोन, सैटेलाइट, आधुनिक खेती के सपने दिखाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।
सरकार मस्त क्यों?जब जनता, छात्र और किसान परेशान हैं, तो सरकारें क्यों मस्त हैं? इसका जवाब सरल है सत्ता, पैसा और प्रचार। मंत्रियों की तनख्वाह, भत्ते, सरकारी बंगले, सुरक्षा, गाड़ियां, हेलीकॉप्टर सब कुछ टैक्सपेयर्स के पैसे से। विदेश यात्राएं, बड़े-बड़े प्रोजेक्ट, फोटो ऑप्स, चुनावी घोषणाएं। घोटालों के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन कोई सजा नहीं होती। सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स इन एजेंसियों का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए होता है। मीडिया में सरकार की तारीफ होती रहती है। “अच्छे दिन आएंगे” जैसे नारे बार-बार दोहराए जाते हैं। लेकिन अच्छे दिन सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों के आए हैं। क्रोनी कैपिटलिज्म बढ़ रहा है। कुछ बड़े उद्योगपति सरकार के करीबी हैं, बाकी छोटे व्यापारी परेशान। चुनाव आते हैं तो फ्री बिजली, फ्री पानी, लैपटॉप, साइकिल — जैसे लालच दिए जाते हैं। लेकिन शासन चलाने का तरीका वही पुराना वादे भूल जाना, जनता को भटकाना।
इस स्थिति के कई कारण हैं। पहला नीतिगत असफलता। अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के नाम पर छोटे उद्योगों को नजरअंदाज किया गया। दूसरा भ्रष्टाचार। तीसरा नौकरशाही की लालफीताशाही। चौथा शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च की कमी। पांचवां किसानों की आय दोगुनी करने जैसे लक्ष्य सिर्फ कागजों पर। राजनीतिक दलों में भी इमानदारी की कमी है। विपक्ष भी अक्सर सिर्फ विरोध के लिए विरोध करता है, समाधान नहीं देता। समाधान की राहसमाधान आसान नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। महंगाई पर काबू, जरूरी वस्तुओं पर सख्त निगरानी, कालाबाजारी रोकना। रोजगार सृजन, छोटे उद्योगों, MSME को बढ़ावा, स्किल डेवलपमेंट। शिक्षा सुधार , फीस रेगुलेशन, पेपर लीक रोकना, गुणवत्ता पर ध्यान। कृषि सुधार, MSP कानूनी गारंटी, सही बीमा, बाजार सुधार।भ्रष्टाचार मुक्त शासन, पारदर्शिता, जवाबदेही। स्वास्थ्य और पेंशन आम आदमी तक पहुंच।
छात्रों को रोजगार उन्मुख शिक्षा चाहिए। किसानों को सम्मानजनक आय चाहिए। जनता को राहत चाहिए। निष्कर्ष“जनता परेशान, स्टूडेंट परेशान, किसान परेशान बस सरकार मस्त” यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि देश की वर्तमान सच्चाई है। अगर सरकारें अभी भी आंखें मूंदे रहीं तो स्थिति और बिगड़ सकती है। युवा आंदोलन कर सकते हैं, किसान लंबे संघर्ष पर उतर सकते हैं, आम जनता अपना विश्वास खो सकती है। समय आ गया है कि सत्ता वाले नीचे उतरकर जनता की पीड़ा समझें। विकास का मतलब सिर्फ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि हर नागरिक के चेहरे पर मुस्कान है। जब तक आम आदमी, छात्र और किसान खुश नहीं होंगे, देश truly विकसित नहीं कहलाएगा। हमें उम्मीद है कि यह पीड़ा जल्द खत्म होगी। लेकिन उम्मीद के साथ संघर्ष भी जरूरी है। क्योंकि इतिहास गवाह है — जब जनता जाग जाती है, तो सत्ता को झुकना ही पड़ता है।

