लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें कोई भी सरकार स्थाई नहीं होती। सत्ता की असली चाबी किसी नेता या पार्टी के पास नहीं, बल्कि उस आम जनता के हाथ में होती है जिसे ‘जनता जनार्दन’ कहा जाता है। लोकतंत्र का सीधा और सरल सिद्धांत है”जनता ही मालिक है।”

जब कोई सरकार इस बुनियादी सिद्धांत को भूलकर आत्ममुग्धता का शिकार हो जाती है, देश के शीर्ष पदों पर बैठे नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों को दबाया जाता है, और देश के भविष्य यानी बच्चों के अधिकारों व उनके साथ हो रहे अन्याय को नजरअंदाज किया जाता है, तो वह सरकार अपने पतन की पटकथा खुद लिखने लगती है। इतिहास गवाह है कि जनता का गुस्सा जब फूटता है, तो बड़े से बड़े सिंहासन ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।

किसी भी लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री का पद सर्वोच्च और अत्यंत गरिमापूर्ण होता है। प्रधानमंत्री पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है, न कि किसी एक विशेष दल या विचारधारा का। इसलिए, प्रधानमंत्री की नीतियों, बयानों और कार्यशैली पर टिप्पणी (कमेंट) करना या उनकी आलोचना करना जनता का संवैधानिक अधिकार है। अक्सर देखा जाता है कि जब भी जनता या विपक्ष के द्वारा प्रधानमंत्री पर कोई तीखी टिप्पणी की जाती है, तो सत्ता पक्ष इसे ‘देश का अपमान’ या ‘पद की गरिमा को ठेस’ पहुंचाने की कोशिश के रूप में पेश करने लगता है। लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि स्वस्थ लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना सरकार को सही रास्ते पर रखने के लिए एक ‘सुरक्षा वाल्व’ (Safety Valve) की तरह काम करती है। यदि जनता अपने ही चुने हुए प्रधान से सवाल नहीं करेगी, उनकी कमियों पर टिप्पणी नहीं करेगी, तो सरकार निरंकुश हो जाएगी।
जब सरकारें प्रधानमंत्री पर होने वाली हर टिप्पणी या आलोचना को अपराध की श्रेणी में डालने लगती हैं या असहमति की आवाज को दबाने के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करती हैं, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि सरकार अहंकारी हो चुकी है। लोकतंत्र में मालिक (जनता) को अपने सेवक (सरकार) से सवाल पूछने और उस पर टिप्पणी करने का पूरा हक है। इस हक को छीनने की कोशिश किसी भी सरकार के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है।
एक संवेदनशील समाज और मजबूत राष्ट्र की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों और महिलाओं के प्रति कितना सुरक्षित और न्यायप्रिय है। बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं। यदि किसी राज्य या देश में बच्चों के साथ अन्याय होता है, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा से समझौता किया जाता है, या उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर सरकारें मूकदर्शक बनी रहती हैं, तो यह सीधे तौर पर देश के भविष्य पर प्रहार है। वर्तमान परिदृश्य में बच्चों से जुड़े कई ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे तौर पर सरकारी तंत्र की विफलता और उदासीनता को दर्शाते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए दिन मासूम बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण, हिंसा और अपहरण की खबरें दिल दहला देती हैं। जब ऐसे मामलों में त्वरित न्याय नहीं मिलता या राजनीतिक रसूख के कारण दोषियों को बचाने की कोशिश होती है, तो यह जनता के सब्र का बांध तोड़ देता है।
बच्चों और युवाओं के भविष्य के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ तब होता है जब उनकी परीक्षाओं के पेपर लीक हो जाते हैं या शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। सालों तक मेहनत करने वाले बच्चों के सपने जब एक झटके में टूटते हैं, तो उनके भीतर का आक्रोश सरकार के खिलाफ एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लेता है। आज भी लाखों बच्चे बुनियादी पोषण और प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं। वे स्कूल जाने की उम्र में ढाबों, कारखानों या सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर हैं। सरकारों की योजनाएं कागजों पर तो चमकती हैं, लेकिन जमीन पर बच्चों तक उनका लाभ नहीं पहुंच पाता।
इतिहास में कई ऐसी सरकारें आईं जो प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में बैठी थीं, लेकिन जनता की आवाज को अनसुना करने और समाज के सबसे कमजोर तबके (बच्चों और गरीबों) के साथ न्याय न कर पाने के कारण उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। यह रवैया सरकार के लिए कई कारणों से बेहद हानिकारक साबित होता है। जो सरकार देश के बच्चों को सुरक्षित माहौल और न्याय नहीं दे सकती, वह सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो देती है। जनता ऐसी सरकार को ‘अक्षम’ और ‘संवेदनहीन’ मानने लगती है। बच्चों के साथ होने वाला अन्याय केवल उस बच्चे तक सीमित नहीं रहता। उससे पूरा परिवार, माता-पिता और समाज का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित होता है। जब माता-पिता यह देखते हैं कि सरकार उनके बच्चों के भविष्य की रक्षा करने में नाकाम है, तो वे चुनाव के समय वोट की चोट से अपना बदला लेते हैं।
जिस देश में बच्चों के अधिकार सुरक्षित नहीं होते, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उस देश की छवि धूमिल होती है। मानव विकास सूचकांक (HDI) और बाल सुरक्षा से जुड़े वैश्विक पैमानों पर देश का पिछड़ना सरकार की वैश्विक साख को कमजोर करता है। सरकारों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता की मलाई और लाल बत्ती की गाड़ियां जनता के दिए गए टैक्स और उनके भरोसे की बदौलत हैं। लोकतंत्र में कोई भी राजा हमेशा के लिए नहीं होता। पाँच साल का कार्यकाल एक सीमित समय है, जिसके बाद हर नेता को दोबारा उसी जनता के दरबार में हाथ जोड़कर जाना पड़ता है। जब सरकारें घमंड में चूर होकर जनता को ‘प्रजा’ और खुद को ‘शासक’ समझने की भूल कर बैठती हैं, तभी से उनका पतन शुरू हो जाता है। प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति को जनता के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा। उन पर होने वाली टिप्पणियों को व्यक्तिगत अपमान के रूप में देखने के बजाय, उन्हें आत्ममंथन के अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए।
यदि देश का बच्चा-बच्चा खुद को असुरक्षित महसूस करेगा, यदि युवाओं को रोजगार के लिए और बच्चों को न्याय के लिए सड़कों पर उतरकर लाठियां खानी पड़ेंगी, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता अपने ‘मालिक’ होने के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सत्ता का तख्तापलट कर देगी। किसी भी सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह समय रहते अपनी प्राथमिकताओं को सुधारे। प्रधानमंत्री और सरकार को आलोचनाओं का स्वागत करना चाहिए और अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही, बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और न्याय को राजनीति से ऊपर उठकर देश की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना होगा।
सरकारों को यह याद रखना चाहिए कि महलों की दीवारें कितनी भी ऊंची क्यों न हों, जनता की आवाज के सामने वे टिक नहीं सकतीं। बच्चों के साथ किया गया हर अन्याय और जनता की आवाज को दबाने की हर कोशिश सरकार के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है। क्योंकि अंततः, इस देश की कमान किसी पार्टी या नेता के हाथ में नहीं, बल्कि यहाँ की सवा सौ करोड़ जनता के हाथ में है—और जनता ही असली मालिक है।



