ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

नशीली नज़र उसकी मेरी जानिब,मैं मुस्कुराया था,
एक हादसा था हुआ, लोगों इसमें तुम्हारा क्या है।
उसको है मुहब्बत,मुझसे, मैं भी उससे प्यार करता हूं।
ज़माने वालों क्यूं परेशान होते हो इसमें तुम्हारा क्या है।
मेरे दर्द की शिद्दतों का अहसास उन्हें क्योंकर होगा।
इश्क़ है,हर पल,पल पल, तस्सव्वुर उसका तुम्हारा क्या है।
कुच ए जानां में जाने से क्यों रोकते हो मुझे तुम हरदम।
दिल मेरा है, मुहब्बत मेरी, ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।
इश्क़ वालों कब मिली हैं, मंज़िलें मुश्ताक़ मुझे बताओ तो।
अब हुआ मालूम के इश्क़ के दरिया का कनारा  क्या है।

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