क़लम, रूह की गहराई और संवेदना के संवाहक

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़

मध्य प्रदेश के हरदा ज़िले की पावन माटी से ताल्लुक़ रखने वाले डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’ एक ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने चिकित्सा और योग की जन-सेवा के साथ-साथ हिंदी और उर्दू अदब को अपनी रूहानी ख़ुशबू से सराबोर किया है। पिछले तीन दशकों से निरंतर सृजनरत डॉ. ‘शाह’ केवल एक रचनाकार नहीं हैं, बल्कि वे उस महान साहित्यिक परंपरा के संवाहक हैं जो समाज को आईना दिखाने और मानवीय संवेदनाओं को ज़िंदा रखने के कार्य में निरंतर सक्रिय हैं।

बहुआयामी व्यक्तित्व, प्रशासनिक दायित्व और ‘सहज’ जीवन-दर्शन
नाम के अनुरूप ही डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह का स्वभाव अत्यंत विनम्र, सहज और आत्मीय है। विविध योग्यताओं से समृद्ध डॉ. ‘सहज़’ के भीतर जहाँ एक तरफ़ चिकित्सक के रूप में जन-सेवा का जज़्बा है, वहीं दूसरी तरफ़ एक संवेदनशील शायर और कथाकार की तड़प भी है जो हर इंसान के दर्द को अपना दर्द समझती है। उनका जीवन केवल साहित्य-सृजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक, शैक्षणिक और सामाजिक पदों पर रहते हुए समाज को अपनी बहुमूल्य सेवाएँ दी हैं, शैक्षणिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व, वे ज्ञानदीप हाई स्कूल (मगरधा) में प्राचार्य ,तथा उर्दू माध्यमिक शाला (बलड़ी) में प्रधान पाठक के रूप में शिक्षा की अलख जगा चुके हैं। ग्रामीण विकास एवं जन-सेवा,उन्होंने ग्राम बलड़ी में ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी के पद पर रहकर ग्रामीण विकास में सक्रिय योगदान दिया। स्वास्थ्य एवं समाज सेवा,एक समर्पित फ़ार्मासिस्ट तथा मगरधा क्षेत्र में कम्युनिटी हेल्थ वर्कर के रूप में उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं के ज़रिए जन-सामान्य की निरंतर सेवा की है। वालिद स्वर्गीय श्री अशफ़ाक़ अहमद शाह जी से मिली साहित्यिक प्रेरणा ने उनकी लेखनी को वह धार दी, जिसने आगे चलकर 2000 से अधिक कविताओं, ग़ज़लों , कहानियों और सामयिक आलेखों का रूप धारण किया।

अफ़साने और विस्तृत रचना-संसार (पुस्तकें एवं संग्रह)
डॉ. ‘सहज़’ का सृजन-दायरा अत्यंत व्यापक है। उनकी अब तक हज़ारों रचनाएँ देश-विदेश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त उनकी कई पुस्तकें और साझा संग्रह पाठकों के बीच बेहद सराहे गए हैं, व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह,-तुम भुलाये क्यों नहीं जाते,तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें, तेरा इंतज़ार आज भी है, और भी उनके व्यक्तिगत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, प्रमुख साझा संग्रह,वे दर्जनों प्रमुख साझा काव्य-संग्रहों का हिस्सा रहे हैं, जिनमें मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, उर्विल, अमल तास, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, कोहिनूर, हिंदी हैं हम, तथा अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा आदि संकलन शामिल हैं। (इसके अलावा उनके कई नए ग़ज़ल संग्रह वर्तमान में प्रकाशनाधीन भी हैं।) डॉ. ‘सहज़’ के अफ़सानों (कहानियों) में जीवन के कड़वे-मीठे अनुभवों, वादों की कसौटी और रिश्तों की पेचीदगियों का अनूठा चित्रण मिलता है। उनके अफ़साने ‘अंगूठियों का संदूकचा’ में समय के साथ बदलते वादों और इंसानियत के अनकहे दर्द को जिस ख़ूबसूरती से उकेरा गया है, वह सीधे पाठक की रूह को छूता है, “ये सब वादे हैं। हर अंगूठी के साथ किसी ने लौटने का वादा किया था। कुछ लौट आए, कुछ कभी न आए… कभी-कभी लौट आने से वादे पूरे नहीं होते। वक़्त बदल जाता है, लोग बदल जाते हैं।”  (अंश, ‘अंगूठियों का संदूकचा’) वहीं उनके अफ़साने ‘पड़ोस की दीवार’ में ज़िद और अहमियत की दीवारों को गिराकर रिश्तों की जीत का सुंदर पैग़ाम दिया गया है, “मोहब्बत सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, कभी-कभी मोहब्बत में हार जाना ही सबसे बड़ी जीत है।”

ग़ज़ल और नज़्में,दर्द, तन्हाई और आत्म-सम्मान का फलसफ़ा,
डॉ. ‘सहज़’ शायरी के मैदान में उतरते हैं, तो उनके अल्फ़ाज़ सीधे दिल की गहराइयों में उतर जाते हैं। उनकी शायरी में जहाँ एक तरफ़ महबूब का इंतज़ार और विरह का दर्द है, वहीं दूसरी ओर आत्म-सम्मान (इज़्ज़त-ए-नफ़्स) की बेबाक गूंज है। तन्हाई और इंतज़ार की कसक को बयां करते हुए वे लिखते हैं, तबीअत को आराम ही कहाँ है, मेरे ज़हन से उसकी खुशबू जाती ही कहाँ है… खानाबदोश सा कब तलक यहाँ-वहाँ भटकूँ, सब्र भी मेरे दिल को कभी आता ही कहाँ है! इंसानी दुनिया की बेरुख़ी पर जब ज़मीर सवाल करता है, तो उनकी कलम से ये शेर फूटते हैं, मुमकिन है कि वह कहीं देख ले मुझको, उसकी गली में उसी का पता पूछ रहा हूँ… एक बार भी पलट कर नहीं देखा उसने, फिर भी ज़िंदगी तेरे पीछे ही भाग रहा हूँ! वे तन्हाई और आत्म-प्रेम को स्पष्ट करते हुए जीवन का यह फलसफ़ा देते हैं, “ख़ुश रहना ख़ुद-गर्ज़ी नहीं, बल्कि ख़ुद से मोहब्बत है। रिश्तों की भीड़ में ख़ुद को न खो जाने दो, अपनी पहचान को भी मुस्कुराने दो।”

बेबाक ज़मीर और सामाजिक सरोकार,
डॉ. ‘सहज़’ की लेखनी की सबसे बड़ी ताक़त उनका ज़मीर है। आज के दौर में जब साहित्य अक्सर वाहवाही तक सीमित हो रहा है, वे अपनी नज़्म ‘क़लम की आवाज़’ के माध्यम से समाज और साहित्यकारों को सचेत करते हैं, क़लम का ज़मीर अब ख़ामोश क्यों है, काग़ज़ पे स्याही में कम जोश क्यों है? सच की जगह अब चापलूसी है हर सू, हक़ पर सच्चाई पर ये ख़ामोशी क्यों है? चलो फ़िर से क़लम को ज़िंदा करें, सच की शमां से रौशन करें ये सफ़र…


सामाजिक एवं समसामयिक आलेख,
उन्होंने पर्यावरण (प्लास्टिक मुक्ति, वृक्षारोपण), स्वास्थ्य, और युद्धों की विभीषिका (जैसे यूक्रेन-रूस, इज़राइल-ईरान संघर्ष) में मासूमों की पीड़ा पर बेबाक आलेख लिखे हैं। पारिवारिक मूल्य,उनके द्वारा अपने बेटे ‘अमन’ के नाम लिखे गए भावुक पत्र आज की युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन और पारिवारिक संस्कारों का अनमोल दस्तावेज़ हैं, जो टूटते रिश्तों को जोड़ने की प्रेरणा देते हैं।

भाषा, शिल्प और द्विभाषिक प्रवाह,
डॉ. ‘सहज’ हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं और लिपियों पर समान अधिकार रखते हैं। उनकी शैली में जटिलता के स्थान पर एक अनूठी ‘सहज़ता’ है। उनकी रचनाओं में बारिश की बूँदें, कागज़ की नावें, क़श्मीर की धुंधली वादियाँ और पलाश के लाल फ़ूल जैसे प्राकृतिक बिंब पाठक को एक जीवंत लोक में ले जाते हैं। डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज़’ केवल शब्दों के जादूगर नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जो अपने चिकित्सकीय, प्रशासनिक एवं सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए साहित्य के ज़रिए समाज की रूह को सींच रहे हैं। उनका पूरा साहित्य इस बात की गवाही देता है कि यदि जीवन में ‘सहजता’, ‘सच्चाई’ और ‘संवेदना’ बनी रहे, तो हर अधूरा वादा और हर संघर्ष भी एक अमर और बेमिसाल दास्तान में बदल सकता है।

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