जान लीजिए ज्ञान की भूमी बिहार की सच्चाई

आधारभूत संरचना और शिक्षकों की घोर कमी से जूझते बिहार की शिक्षा व्यवस्था के पास कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा था। जहां जगन्नाथ मिश्रा के बाद बिहार की कुर्सी पर बैठे लालू प्रसाद यादव ने भी इस शिक्षा व्यवस्था को कायम रखा। जब लालू के बाद नीतीश की सरकार बनी तो नितीश कुमार ने वित्त रहित शिक्षा नीति को नया आधार दिया और वित्त रहित शिक्षण संस्थाओं को वित्त संपोषित करने का फार्मूला तैयार करते हुए यह कहा की वित्त रहित संस्था जितना अच्छा परफॉर्मेंस करेगी उन्हें उतनी ही सरकारी सहायता दी जाएगी।

एक वक्त ऐसा भी था जब बिहार को ज्ञान की भूमी कहा जाता था लेकिन अब सच्चाई कुछ और है। सच्चाई यह कि अब बिहार में शिक्षा बदनाम हो चुकी है। सरकारी शिक्षा क्षेत्र में असमानता इसका मुख्य कारण है। आपको बताते चलें कि शिक्षा क्षेत्र में असमानता कि शुरूआत बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा ने की थी। उन्होंने वित्त रहित शिक्षा निति का अविष्कार किया लेकिन इस शिक्षा निति के साइड इफेक्ट ऐसे हुए की हर गांव मे बड़े पैमाने पर वित्त रहित शिक्षा नीति ऐसे संस्थान खोल दिए गए जिसका कोई आधार नहीं था।

तो आधारभूत संरचना और शिक्षकों की घोर कमी से जूझते बिहार की शिक्षा व्यवस्था के पास कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा था। जहां जगन्नाथ मिश्रा के बाद बिहार की कुर्सी पर बैठे लालू प्रसाद यादव ने भी इस शिक्षा व्यवस्था को कायम रखा। जब लालू के बाद नीतीश की सरकार बनी तो नितीश कुमार ने वित्त रहित शिक्षा नीति को नया आधार दिया और वित्त रहित शिक्षण संस्थाओं को वित्त संपोषित करने का फार्मूला तैयार करते हुए यह कहा की वित्त रहित संस्था जितना अच्छा परफॉर्मेंस करेगी उन्हें उतनी ही सरकारी सहायता दी जाएगी। फिर क्या था नीतीश कुमार के द्वारा इस तरह का योजना लागू करने के बाद शहर में कुकुरमुत्ते के समान खुले निजी शिक्षण संस्थाओं को भी यह सुविधा मिलना शुरु हो गया। नतीजा यह हुआ कि यह सुविधा लागू होने के बाद कुकुरमुत्ते के समान छाए निजी संस्थानों में एक होड सी लग गई। इसका प्रमाण आपको वर्ष 2007 के बाद बिहार विद्यालय समिति के विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम देखने से साफ नजर आ जाता है। अगर वर्ष 2007 के बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के परीक्षाओं पर गौर करें तो आपको निजी संस्थानों के द्वारा मनमानी करने की बात सामने आएगी।

तो राज्य में नारी शक्तिकरण को साबित करने के लिए परीक्षाओं में लड़कियों को प्राथमिकता के आधार पर प्रोजेक्ट करना तथा महिलाओं को अन्य सुविधा दिया जाने लगा। वहीं जब इन सभी व्यवस्थाओं को देखते हुए विपक्ष की सरकार ने आवाज उठाई तो सरकार सचेत हुई और पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव के वक्त यह योजना को समाप्त कर दिया गया। लेकिन इस पूरे मामले में स्वायत्त संस्थान बिहार विद्यालय परीक्षा समिति की भूमिका पर सवाल उठाया गया जब समिति पर निजी कॉलेजों को मान्यता दिए जाने का जिम्मा सौंपा गया। तो इस समिति के अध्यक्ष पद को लेकर भी जमकर राजनीति हुई। यूं कहें कि इसे बौद्धिक के बजाए राजनीतिक बना दिया गया। इसका जीता-जागता सबूत भी लोगों के सामने आया। जिसमें समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर राजमणि प्रसाद और प्रोफेसर लालकेश्वर प्रसाद दोनों ही बिहार के नालंदा जिला के रहने वाले थे और जात के कुर्मी भी। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह दोनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा के वासी थे। अगर बात करें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तो उनके स्वजातीयता और जिला वालों का यही एक मात्र उदाहरण नहीं है इसके कई उदाहरण है। आपको बताते चलें कि जब लालकेश्वर प्रसाद को बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का अध्यक्ष बनाया गया तब उनकी पत्नी उषा सिंहा नालंदा के हिलसा से जदयू की विधायक थी। फिलहाल पिछले कुछ वर्ष पहले इंटर परीक्षा साइंस एवं आर्ट्स के टॉपर के घोटाले ने बिहार बोर्ड परीक्षा समिति में चल रहे वर्षों से भ्रष्टाचार की पोल खोल कर रख दी थी । जहां यह सभी मामलों की सच उजागर करने में मीडिया की अहम भूमिका रही है तो सरकार ने भी आनन-फानन में मामले की जांच करने के लिए एक एसआईटी की टीम की गठन करते हुए घोटाले की आड़ में छात्रों का भविष्य लिखने वाले लगभग अब तक 30 लोगों को सलाखों के पीछे भेजा है। इस मामले की जांच के दौरान राजनीति भी जमकर हुई। जहां मुख्य विपक्षी दल ने इस पूरे मामले में बच्चा राय के बहाने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधा। तो जैसे ही बच्चा राय के साथ भाजपा के केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की तस्वीर सामने आई तो विपक्ष की बोलती बंद हो गई। और विपक्ष इस मामले में एक कदम पीछे हट गया। लेकिन इस पूरे प्रकरण में यह साबित कर दिया कि मामले का मास्टरमाइंड बच्चा राय का पकड़ पार्टी के हर दलों के नेता के साथ है।

बिहार टॉपर फैक्ट्री, जहां मोबाईल की दुकान में चलता है इंटर कॉलेज- आज मैं आपको एक ऐसे सच से रुबरु कराने जा रहा हूं जिस पर आप विश्वास नहीं करेंगे, लेकिन प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती । आप पटना की गलियों का 2-4 चक्कर लगाएंगे तो भिखना पहाड़ी में आपको कई मोबाईल के दुकानों पर इंटर कॉलेज का बोर्ड दिख जाएगा और दो कमरों वाले इस मार्केट में मोबाइल की दुकान होगी। मजे की बात तो यह है कि छात्रों को शिक्षा देने के नाम पर सम्बद्धता प्राप्त इस कथित कॉलेज के नाम वाले फ्लैक्स (बैनर) पर शुद्ध नाम भी नहीं लिखा हुआ मिलता है ।

मीडिया मार्ट के ब्यूरो हेड उमाशंकर जी ने ऐसे ही एक कॉलेज के संचालक अरविन्द कुमार से बातचीत करने की कोशिश की तो उन्होंने हमारे सभी बच्चों को बिना कॉलेज आये डिग्री देने की गारंटी लेते दिखे । सिर्फ कागजों पर चलने वाले ऐसे सभी कॉलेज सिर्फ छात्रों को इंटर का फार्म भराकर उन्हे परीक्षा पास करवाने का ठेका लेते हैं। बोर्ड की मिलीभगत से ऐसे सभी कॉलेजों की इंटर परीक्षा का सेंटर ऐसे कॉलेज में रखा जाता है जहां नकल की पूरी छूट रहती है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसे फर्जी कॉलेजों में इंटर की परीक्षा में बैठने या फार्म भरने वाले छात्रों की संख्या पचास से साठ तक ही निर्धारित है पर ऐसे सभी कॉलेज प्रति छात्र 8 से 10 हजार रुपये वसूल कर साठ के बदले एक हजार छात्रों तक का फार्म भरवा देते हैं। ऐसे कॉलेजों की मुख्य कमाई छात्रों के फार्म भरने से ही होती है। सूत्र बताते हैं कि एक टॉपर घोटाले में आरोपित बच्चा राय सिर्फ छात्रों के टॉपर बनाने का ही खेल नहीं खेलता था बल्कि फर्जी इंटर कॉलेजों को लालकेश्वर और उनकी पत्नी उषा सिन्हा से मिलकर मान्यता दिलवाने का काम भी करता था। इसके एवज में बच्चा राय प्रति कॉलेज से पांच लाख रुपये लेता था जिसमें चार लाख लालकेश्वर के पास, पचास हजार खुद बच्चा राय और बाकी के पचास हजार में बोर्ड के तीन कर्मचारियों के बीच बांट दिया जाता था। बच्चा के इस कॉलेज में कई पूर्व विधायकों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कहावत को चरितार्थ किया। ख्याल रहे जहानाबाद के एक पूर्व विधायक जो कभी राजद के टिकट पर चुनाव जीते थे और वर्तमान में जदयू का झंडा ढो रहे हैं ने भी अपने नाम से खोले गए एक इंटर कॉलेज की संबद्धता अपने स्वजातीय बच्चा राय की मदद से बोर्ड द्वारा प्राप्त कर ली।ये है जहानाबाद के जिलाधिकारी आवास से महज एक किमी की दूरी पर जहानाबाद -पटना मुख्य मार्ग के किनारे स्थित महात्मा गांधी इंटर कॉलेज मात्र तीन जर्जर कमरों और जर्जर भवन वाले इस कॉलेज में शायद ही कभी शिक्षक या छात्र नजर आते हैं। नजर तब आते हैं और चहल-पहल तब रहती है जब रजिस्ट्रेशन और फार्म भरने का समय होता है।

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