जिसको आप अपने बच्चे का गार्जियन नहीं बना सकते उसे अपने देश का भाग्यविधाता क्यों बनाते हैं

यह देश के राजनैतिक ऊँट की कहानी है जिसमें चर्चा है की कब देश की राजनैतिक ऊँट किस करबट बैठेगा?

बात 2011-13 की है जब कोई भ्रष्टाचार के नाम पर आन्दोलन कर नेता बनने को आतुर था । लोग उसे आन्दोलन का चेहरा मान बैठे थे जबकि उसकी छाया आज यानि 2026 का वो संगठन था जो सत्ता पाकर देश के सभी भ्रष्टाचारियों को अपने गोद में लेकर इठला रहा है । बात शुरू करते है 2012 से . एक कार्यक्रम में नीतिश कुमार के मंच पर उनके साथ ‘आपराधिक चरित्र’ का एक सरगना भी बैठा था. वो नयी राजनीतिक पारी शुरू करने की तैयारी में था. उसके साथ मुख्यमंत्री का मंच साझा करना मेरे लिए एक पहेली सरीका था. मैं एक पत्रकार के तौर पर उनसे सवाल भी किया, नाराजगी के साथ उनका छिपा हुआ उत्तर था ‘इनके खिलाफ कुछ मुकदमे ही तो हैं. एफआईआर होने से कोई अपराधी हो जाता है क्या? मुकदमे तो मेरे भी खिलाफ हैं’। जी, ये राजनीति और अपराधी के शागिर्द और शागिर्दी का मात्र एक उदाहरण है जिसे आप भी भली भांति जानते और जीते भी हैं। अब मैं अपने एक पत्रकार मित्र के संज्ञान से एक और घटना कि आपसे चर्चा करता हूं। साल 2003 की बात है. बिहार-झारखंड के एक बड़े अखबार के एक छायाकार का उसके गांव से अपहरण हो गया था. पटना के आक्रोशित पत्रकारों का बड़ा जुलूस ‘एक अणे मार्ग’ पहुंचा. लालू प्रसाद यादव (हालांकि, मुख्यमंत्री पद पर राबड़ी थीं) ने पत्रकारों का आक्रोश सुना और वहीं से थानेदार को फोन मिलवाया. उन्होंने थानेदार से सीधे स्वयं बात की और उस जगह के एक बाहुबली को भी फोन किया, वह छायाकार चार घंटे में सबके सामनें था. लालू ने न गृह सचिव को फोन मिलवाया, न पुलिस महानिदेशक को, जबकि किसी भी मुख्यमंत्री या मंत्री के लिए यही उपयुक्त रास्ता होना चाहिए था. उपर से दोनों उदाहरण अपने बिहार के दो ताकतवर नेताओं के हैं, लेकिन ऐसा नहीं कि बाकी नेता इससे अछूते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि किसी ने खुलेआम यह किया, तो दूसरे बड़ा आदर्शवादी मुखौटा लगाये हुए पर्दे के पीछे से.

अभी भी आप सवालो के उलझन में होंगे कि उमाशंकर आखिर समझाना क्या चाह रहा है। जी, मैं आपको मीडिया मार्ट इंडिया के इस लेख में नेता और अपराधी के अंतरंग संबंध के मकरजाल के परतों को उधेरूंगा जिसे आपनें अपना भाग्यविधाता बना रखा हैं। मैं मानता हूं कि मनुष्य अपने भाग्य का विधाता खुद होता है। मनुष्य चाहे तो कोई भी असंभव कार्य इस दुनिया में कर सकता है। यह उसके जीवट के बलबूते संभव है। प्रारब्ध व संचित कर्म आदि के बावजूद मनुष्य संकल्प शक्ति के सहारे अपने भाग्य को बदल पाने में समर्थ है। तभी तो मनुष्य को ईश्वर का श्रेष्ठतम पुत्र कहकर संबोधित किया गया है। मनुष्य से यह भी अपेक्षा रखी गई है कि वह अपने कर्मो के सहारे इस सृष्टि रूपी बगिया को सुरम्य, सुरुचिपूर्ण और अनुशासित बनाए रखे। स्वर्ग-नरक जो कुछ भी है सब इसी धरती पर मौजूद हैं। शांति व आनंद से परिपूर्ण मनोदशा का नाम ही स्वर्ग है। शांति ऐसा वातावरण विनिर्मित करती है कि चारों ओर कथित स्वर्ग सरीखी परिस्थितियां स्वतः बनने लगती हैं। भाग्य का निर्माण करने के लिए मन की चंचलता को नियंत्रित करना आवश्यक है। अगर आप इस चंचलता को नियंत्रित नहीं कर सके तो वांछित कार्य के प्रति एकाग्र नहीं हो सकेंगे। मन की चंचलता हमें हमारे लक्ष्य से भटकाने का काम करती है। और इस तरह का भटकाव आज हमारे जीवन में आ चुका है वो भी अपनें कर्मों के कारण।

आज, हम और आप अपने छोटे छोटे स्वार्थ के कारण उनको अपना भाग्यविधाता बना लिया है जिसको अपनें बच्चों का गार्जियन भी बनाना पसंद नहीं करेंगे। अपने बिहार का राजनीतिक तापमान दिन पर दिन बढ़ता ही रहता है। कभी लालू और उनके परिवार का बयान तो कभी नीतिस का पलटबार। इधर भाजपा और नीतिस का तीर, सभी पार्टीयां हर समयअपने बूते पर चुनाव लड़ने की तैयारी लगा रहता है। पर यहाँ तो वोट किसी और के चेहरे पर दिया जाता है और मुख्यमंत्री कोई और बन जाता है मतलब बिहार का राजीनैतिक ऊँट किसी भी करवट में बैठ जाता है ? माना अभी इलेक्शन नहीं है पर प्रदेश की राजनीति में सभी राजनीतिक पाटीर्यां अपना जनाधार मजबूत करने में जी जान से जुट गई है। ऐसे में आरोपों प्रत्यारोपों का दौर बदस्तूर जारी है। लालू कुनवा और कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टी जहां नीतिस सरकार की खामियों को गिनाने में लगी है वहीं नीतिसभाजपा सरकार को दो मोर्चे पर काम करना पड़ रहा है। एक ओर वह अपनी सरकार की बदनाम हो चुकी छवि को सुधारने की कोशिश में है तो दूसरी ओर केंद्र सरकार पर विभिन्न योजनाओं को चालू रखने या फिर नई योजनाओं को शुरू करने के लिए पर्याप्त धन मुहैया कराने का प्रयास कर रही है। परंतु यह बात सर्वविदित है कि पिछले और अभी का नीतिस और बीजेपी सरकार ने प्रदेश में जहां एक ओर गुंडा राज को बढ़ावा दिया तो दूसरी ओर असफल बिहार के कानून व्यवस्थता ।

इसमें कोई दो राय नहीं कि जनसंख्या के मामले में हम देश का सबसे बड़े राज्यों में एक है। बिहार के लोगों का वैचारिक स्तर आज देश की आजादी के 74 साल बाद भी पूर्ण रूपेण विकसित नहीं हुआ है। आज भी यहां जाति और धर्म के नाम पर मतदाताओं को आसानी से गुमराह किया जाता है और मतदान करते समय यहां के लोग अन्य पिछड़े राज्यों की तरह उम्मीदवारों के व्यक्तित्व और सामाजिक सरोकार को ध्यान देने की जगह उसकी जाति, धर्म जैसे संकुचित विंदुओं पर नजर डालते हैं। ऐसे में यदि गलत उम्मीदवारों का चयन हो जाता है तो कोई बड़ी बात नहीं। कारण खास कर यूपी और बिहार में क्षेत्र विशेष में जातीय बहुलता के साथ ही दबंग की छवि रखने वाले व्यक्ति को राजनीतिक पार्टियां अधिक महत्त्व देती है। जब राजतनीतिक पार्टियां अपने उम्मीदवारों की सूचि बनाने लगते हैं तो जातीय आंकड़े को तो निश्चित तौर पर ध्यान में रखते ही हैं साथ ही वे जातीय समीकरण को भी नजरअंदाज नहीं करते। उसमें भी जो उम्मीदवार दबंग की छवि वाले होते हैं और जिनके पास धन की कमी नहीं होती है, उन्हें प्राथमिकता दी जाती है। सामाजिक सरोकार से जुड़े उम्मीदवारो को सर्वथा दरकिनार कर दिया जाता है। यहां के लोग भी जातिवादी संकीर्ण मानसिकता से ग्रसित हैं। न केवल चुनाव के दौरान बल्कि चुनाव के बाद भी लोगों पर जातिय खुमारी चढ़ी होती है।

यही वजह है कि पार्टियां अपने उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने से पहले उसके प्रभुत्व के साथ ही जातीय पकड़ पर भी ध्यान देती है। पार्टीया किसी भी हाल में अपने जातीय जनाधार को खिसकने नहीं देना चाहती है भले ही उस पर उसके तुष्टिकरण का गंभीर से गंभीर आरोप विपक्षियों द्वारा लगातार लगाया जा रहा हो। बिहार में लालू का राज लौटते ही यादव लोगों का वर्चस्व बढ़ जाता है। ऐसे में ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी (भूमिहार) जैसी जातियों के लोग भी दबने को तैयार नहीं होते। क्योंकि ये पहले से ही दबंग रहे हैं। तनातनी की इस स्थिति में प्रदेश में अपराध का ग्राफ बढ़ जाता है। यही वजह है कि अपने शासन काल के अंतिम दिनों में नीतिस सरकार का घ्यान थोड़ा विकास कार्यों की ओर भी गया है। इस खातिर सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को दुरूस्त करने की भरपूर कोशिश कर रही है लेकिन वर्तमान कोरोना हालात को देखते हुए स्थिति कुछ खास बदलती नहीं दिख रही है। कोरोना काल में अब बिहार में न तो किसी पार्टी का राम मंदिर मुद्दा काम नहीं आने वाली है। पिछले चुनाव में बिहार में जिस तरह नीतीश के चेहरे के आगे मोदी के विजय रथ को रोक दिया गया था फिर भी आज सम्राट चौधरी के रूप में बिहार के सत्ता पर भाजपा काबिज है । आज हमनें राजनीति का अपराधीकरण और जातिकरण कर दिया है। आज राजनीति का अपराधीकरण और जातिकरण भारतीय लोकतंत्र का एक स्याह पक्ष हो गया है। यूपी और बिहार की राजनीति में हमेशा से ही बाहुबलियों का प्रवेश होता रहा है। अपने ऊंचे रसूख और दहशत के दम पर वे विधानसभा से लेकर लोकसभा तक पहुंच जाते हैं। लेकिन अपराध से इन लोगों का नाता नहीं टूट पाता, गाहे-बगाहे किसी न किसी अपराध में शामिल होने की खबरें आती रहती हैं। यानि कि देश सेवा की आड़ में ये राजनेता हमेशा ही करते रहते हैं गुंडई।

बिहार की बात करें तो इस राज्य में आपराधिक प्रवृति वाले दबंग राजनेताओं की एक पूरी खेप है, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि रही है। आँकड़ों के अनुसार, हमारे पवित्र संसद के 46 प्रतिशत सदस्य आपराधिक पृष्ठभूमि से हैं। चिंता का विषय यह है कि मौजूदा लोकसभा सदस्यों में सर्वाधिक (29 प्रतिशत) सदस्यों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि पिछली लोकसभा में यह आँकड़ा तुलनात्मक रूप से कम राजनीति का अपराधीकरण ‘अपराधियों का चुनाव प्रक्रिया में भाग लेना’ हमारी निर्वाचन व्यवस्था का एक नाजुक अंग बन गया है। आज राजनीति में अपराधियों की खूब उपयोगिता है. आज से पहले वे नेताओं के लिए मतदाताओं को डराने-धमकाने, बूथ लूटने, बैलेट छापने से लेकर विरोधियों को ठिकाने लगाने में काम आते थे। नेता उन्हें समय- समय पर संरक्षण ,लाइसेंस, परमिट, ठेके से उपकृत करते थे. आज नेताओं और ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ वाले नेताओं के बीच कोई पर्दा या अंतर नहीं है. अपराधियों के इस सत्तारोहण में हमारी और आपकी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. जैसे-जैसे लोकतंत्र में जाति-आधारित वोट की राजनीति हावी होती गयी, वैसे-वैसे इस गठजोड़ को जातीय समीकरण और मजबूत बनता गया. हर अपराधी अपनें जातियों के गौरव-पुरुष बनते गये, और उन्हें नेताओं ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए पाला-पोषा. शायद ही किसी पार्टी ने दूसरे दलों से आये आपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं को अंगीकार करने से इनकार किया हो. क्या हम अब कह सकते हैं कि यह सिलसिला थमेगा मुझे तो उम्मीद है। हालांकि देश की राजनीति हो या प्रदेश की, सब इसी पर टिकी है. राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि भारतीय राजनीति में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है। वर्तमान में ऐसी स्थिति बन गई है कि राजनीतिक दलों के मध्य इस बात की प्रतिस्पर्द्धा है कि किस दल में कितने उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं, क्योंकि इससे उनके चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाती है।

आज अपराधियों का पैसा, जातिबल और बाहुबल राजनीतिक दलों को वोट हासिल करने में मदद करता है। चूँकि भारत की चुनावी राजनीति अधिकांशतः जाति और धर्म जैसे कारकों पर निर्भर करती है, इसलिये उम्मीदवार आपराधिक आरोपों की स्थिति में भी चुनाव जीत जाते हैं। चुनावी राजनीति कमोबेश राजनीतिक दलों को प्राप्त होने वाली फंडिंग पर निर्भर करती है और चूँकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के पास अक्सर धन और संपदा काफी अधिक मात्रा में होता है, इसलिये वे दल के चुनावी अभियान में अधिक-से-अधिक पैसा खर्च करते हैं और उनके राजनीति में प्रवेश करने तथा जीतने की संभावना बढ़ जाती है। भारत के राजनीतिक दलों में काफी हद तक अंतर-दलीय लोकतंत्र का अभाव देखा जाता है और उम्मीदवारी पर निर्णय मुख्यतः दल के शीर्ष नेतृत्व द्वारा ही लिया जाता है, जिसके कारण आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेता अक्सर दल के स्थानीय कार्यकर्ताओं और संगठन द्वारा जाँच से बच जाते हैं। भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अंतर्निहित देरी ने राजनीति के अपराधीकरण को प्रोत्साहित किया है। अदालतों द्वारा आपराधिक मामले को निपटाने में औसतन 15 वर्ष लगते हैं। निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में मौजूद खामियाँ भी राजनीति के अपराधीकरण का प्रमुख कारण हैं। चुनाव आयोग ने नामांकन पत्र दाखिल करते समय उम्मीदवारों की संपत्ति का विवरण, अदालतों में लंबित मामलों, सजा आदि का खुलासा करने का प्रावधान किया है। किंतु ये कदम अपराध और राजनीति के मध्य साँठगाँठ को तोड़ने की दिशा में अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। इसके अलावा भारतीय राजनीति में नैतिकता और मूल्यों के अभाव ने अपराधीकरण की समस्या को और गंभीर बना दिया है। अक्सर राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों के लिये अपराधीकरण की जाँच करने से कतराती हैं। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 दोषी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है। लेकिन ऐसे नेता जिन पर केवल मुकदमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिये स्वतंत्र हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन पर लगा आरोप कितना गंभीर है। राजनीति का अपराधीकरण समाज में हिंसा की संस्कृति को प्रोत्साहित करता है और भावी जनप्रतिनिधियों के लिये एक गलत उदाहरण प्रस्तुत करता है। उसमें उन्होंने कहा था कि देश के बहुत से हिस्सों में माफियाओं के संगठित गिरोह अपनी समानांतर सरकार चला रहे हैं और वर्तमान में जो राज्य की व्यवस्था है, वह अप्रासंगिक होती जा रही है। वोहरा कमेटी की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि देश के कुछ प्रदेशों में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी अधिकारियों का संरक्षण हासिल है। यह रिपोर्ट जब संसद में पेश की गई, तो काफी हो-हल्ला मचा था। फिर इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया और उसे ठंडे बस्ते में डाल देने के कारण इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस गठजोड़ को तोड़ने की कोशिश होती भी, तो कैसे होती?

क्योंकि यह भी देखा गया कि संसद व विधानसभाओं में आपराधिक छवि वाले सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। तो सवाल यह है कि जब इतनी भारी संख्या में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग पहुंच जाएंगे, तो फिर संगठित अपराधी गिरोह पर अंकुश कैसे लगेगा। ये लोग जनपद स्तर पर अपने गुर्गों को संरक्षण देते हैं, पुलिस पर दबाव बनाते हैं कि हमारे लिए गलत काम कर दो, वगैरह, वगैरह। ऐसे में पुलिस, दारोगा या एसपी के लिए भी यह मुश्किल हो जाता है कि सांसद या विधायक की मर्जी के खिलाफ काम करें। बिहार में आज फिर से गुंडा राज शुरू हो चुका है। किडनैपिंग और मर्डर जैसी वारदातें होनी शुरू हो गई हैं। सिर्फ शराब पर पाबंदी लगा देने से अपराध को राज्य से हटाया नहीं जा सकता। अगर ऐसा होता, तो पूरे देश में शराब पर पाबंदी लगा दी जाती। इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में अपराधिक तत्त्व लगातार बेकाबू होते जा रहे हैं और पुलिस उसे रोकने में अपने आपको असमर्थ पा रही है। 1990 के दशक में बिहार में ”बिहार पिपुल्स पार्टी“ के नाम से एक पार्टी का गठन हुआ था जिसको शुरू किया था बाहुबली आनंद मोहन और बाहुबली प्रभुनाथ सिंह ने। इस पार्टी की टिकट पर 1995 का विधान सभा चुनाव जितने भी उम्मीदवारों ने लड़ा था उनमें 90 फिसदी से अधिक क्रिमिनल बैकग्राउंड के थे। वहीं लालू प्रसाद के साथ भी बाहुबली पप्पु यादव और बाहुबली शाहबुद्दीन जैसे कई क्रिमिनल खड़े थे। रामबिलास पासवान के साथ जहां बाहुबली सूरजभान सिंह और बाहुबली बृजनाथी सिंह जैसे बाहुबली तो खुद को पाक और बेदाग दिखाने वाले सुसाशन बाबू यानि प्रदेश के सीएम नीतीश कुमार के नजदीकियों में अनंत सिंह जैसे दर्जनों चर्चित अपराधी व बाहुबली भी रहे हैं। वे फिलहाल जेल में बंद हैं और नीतीश के बदले रुख से नाराज हो कर 2015 के विधान सभा चुनाव से पहले जेडीयू से नाता तोड़ लिया है। ऐसे में प्रदेश की राजनीति को अपराध मुक्त कैसे कहा जा सकता है। लालू प्रसाद यादव को जब जनता दल की लहर में 1990 में देवीलाल की कृपा से सीएम का पद मिला तो उसने अपनी कुर्सी को स्थायी करने के उद्देश्य प्रदेश में जातीय उन्माद को हवा दिया और इसे बल देने के लिए ”भूरा बाल को खत्म करो“ का नारा दिया।

पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर हुए विवाद में लालू ने ‘राष्ट्रीय जनता दल’ के नाम से नई पार्टी बनाई तथा उसने और उसकी पत्नी राबरी देवी ने कुल 15 सालों तक बिहार पर राज किया। उन दिनों बिहार में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जी से मेरा सिर्फ एक सवाल है कि आपके ही राज में बिहार में एक बड़ा बदलाव आया था। जहां लोग रात 10 बजे के बाद गया और जहानाबाद जैसे कई शहरों में घर से बाहर निकलने से डरते थे, वहीं आप के ही राज में रात के चाहे एक ही क्यों न बज रहे हों, ट्रेन पकड़ने स्टेशन निकल पड़ते थे। लड़कियां आप ही के राज में खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं। लेकिन आज बिहार की हालत फिर से क्यों पुरानी जैसी होती जा रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के जनप्रतिनिधि बनने से आपराधिक गठजोड़ सशक्त होता जा रहा है। राजनीतिक वर्ग में गलत तत्वों की सफाई की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक यह कानून-व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठता जाएगा, उसे बहाल करने के लिए चुनावी व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है। मतलब मेरा साफ है कि जिसको अपने बच्चे का गार्जियन नहीं बनाते उसे अपना भाग्यविधाता ना बनायें।

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