डॉ.उपेंद्र कश्यप

गीता सार में कहा गया है- “जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वह भी अच्छा ही होगा” कॉकरोच जनता पार्टी और इस छात्र आंदोलन को बहुत-बहुत साधुवाद। भारतीय लोकतंत्र में यह घटना हमेशा याद रखी जाएगी। जेपी का आंदोलन हो या अन्ना का आंदोलन हो, दोनों से निकले नेताओं ने बेहतर आदर्श स्थापित नहीं किया है। इसलिए यह देश आंदोलन को लेकर लगभग शिथिल था या निराश था। नई पीढ़ी ने एक बार फिर लोकतंत्र को लेकर उम्मीदें आसमान पर पहुंचा दिए हैं। यानी उद्देश्य अगर बढ़िया है, रास्ते बेहतर हैं, तो सत्ता का अहंकार चाहे जिस ऊंचाई पर हो वह टूटेगा, ढहेगा। यही प्राकृतिक व्यवस्था प्रमाणित हो गयी है। इसलिए जो हुआ वह बेहतर हुआ। यह बात अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को समझ आ गयी होगी। कुछ लोग एक्सपोज भी हुए हैं। खासकर राजनीतिक दल। इस आंदोलन में शामिल छात्र-छात्राओं का एक छोटा हिस्सा ही सही, उसने अपने चारित्रिक दोषों को खुलकर व्यक्त किया। जिससे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को भी आघात लगा है। लेकिन कुल मिलाकर बात यही है कि आंदोलन के बाद लोकतंत्र की मजबूती का संकेत स्पष्ट मिला है।

लेकिन, कब पीछे लौटते हैं। जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ संपूर्ण क्रांति हो या अन्ना आंदोलन, क्या इन दो बड़े आंदोलनों से कुछ बदला। जेपी के चेलों ने राजनीति में ना यो कोई सुचिता का काम किया, ना ही कोई आदर्श स्थापित किया, न सिस्टम के घुन को खत्म कर सके। कथित समाजवाद का झंडा बुलंद किया, बल्कि प्रायः सभी चेले अपवाद छोड़कर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दिखे। परिवारवाद को बढ़ावा दिया। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर आगे तो बढ़े लेकिन यह अंततः परिवारवाद और जातिवाद तक सिमट कर रह गया। जातिवाद की धार को और तीखा किया। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया, जनता ने उनका क्या बिगाड़ लिया। दो ढाई साल में पुनः उन्हीं को भारत की सत्ता सौंप दी। मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलाई।
खुलकर मुस्लिम परस्ती की और मुल्ला मुलायम की उपाधि हासिल कर ली। क्या बिगड़ गया। वह भी मुख्यमंत्री रहे और उनके बेटे अखिलेश यादव भी मुख्यमंत्री बने। परिवारवाद की ऐसी थ्योरी कि परिवार के ही हिस्सों को दूर भगा दिया गया, जिनको उत्तराधिकारी माना जा रहा था। बिहार में देख लीजिए। लालू प्रसाद यादव की राजनीति को, क्या उन्होंने बिहार की व्यवस्था बदली? कैसा आदर्श मानक स्थापित किया, यह कहने की जरूरत नहीं है। देश में भी व्यवस्था तो कम से कम नहीं ही बदली। अन्ना आंदोलन के बाद जो जो काम नहीं करने की गारंटी अरविंद केजरीवाल ने दी, वही वही काम नीचता की हद तक जाकर किया। देश ने पहली बर देखा कि जेल से भी मुख्यमंत्री बनकर सत्ता चलाया जा सकता है।
इन दो आंदोलनों ने जो नेता दिए हैं, उन्होंने ना तो आदर्श स्थापित किया, ना कुछ बदल सके। अभी सीजेपी का जो आंदोलन हुआ, उससे क्या कुछ बदल जाएगा? सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके व पिता भगवान दीपके की इच्छा है कि अभिजीत भविष्य में राजनीति में जाने की जगह निस्वार्थ भाव से समाज सेवा ही जारी रखें। हालांकि राजनीति में जाना है या नहीं, यह फैसला दीपके का अपना रहेगा। यह मां-पिता ने कहा है। यानी आंदोलन खत्म करते ही राजनीति में जाने की चर्चा भी शुरू हो गई। इस देश ने देखा है कि आंदोलन करना और राजनीति करने में आसमान जमीन का अंतर है। अभिजीत दीपके और उनकी टीम के सदस्य भविष्य में राजनीति के क्षेत्र में आते हैं तो वे कैसा आदर्श, मानक स्थापित कर सकेंगे? लोगों को नजर इस पर भी रखनी चाहिए।

