तख्त बदल गया, ताज बदल गया: बंगाल विजय और बदलती भाजपा, शंका के घेरे में चुनाव आयोग , प्रजातन्त्र पर उठते प्रश्न

“तख्त बदल दो, ताज बदल दो” जयप्रकाश नारायण (JP)

बंगाल विजय निश्चित तौर पर भाजपा की बड़ी जीत है। अब तक पश्चिम और उत्तर भारत में ही अपनी मजबूत स्थिति बनाकर रखने वाली भाजपा ने हाल के दिनों में पूर्वी भारत के दो राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। बिहार में पहली बार उनका सीएम बना है, अब बंगाल में उनका पहला सीएम बनेगा। पश्चिम बंगाल के बहुत ही चौंकाने वाले नतीजे आए हैं।

ऐसे नतीजे आए हैं जिसकी दूर-दूर तक संभावनाएं नज़र नहीं आ रही थीं। ये ज़रूर कहा जा रहा था कि बीजेपी और टीएमसी के बीच टक्कर का मुक़ाबला हो सकता है या बीजेपी कुछ सीटों से आगे भी निकल सकती है, मगर ये किसी ने नहीं सोचा था कि बीजेपी को लगभग 200 सीटें मिल जाएंगी और टीएमसी 100 के अंदर सिमट जाएगी। कहा जा सकता है कि ये एक चमत्कार जैसा है, मगर सवाल उठता है कि इस चमत्कार के पीछे क्या है? चुनावी समीकरणों के देखते हुए ये मानना मुश्किल है कि सत्ता विरोधी लहर ने टीएमसी का तंबू उखाड़ दिया। या फिर हिंदुत्व ने बीजेपी का झंडा बुलंद कर दिया, क्योंकि ऐसे भी हालात नहीं दिखलाई दे रहे थे कि हिंदू-मुसलमान का ज़बर्दस्त ध्रुवीकरण होने वाला है। असम जरूर भाजपा जीतती रही है। उसके पीछे घुसपैठ बड़ा मुद्दा साबित हुआ है। मगर बंगाल की जीत को महज घुसपैठ के मुद्दे की जीत नहीं कहा जा सकता है। इस जीत के लिए पहली बार बीजेपी ने अपने वैष्णव हिंदुत्व का बाना छोड़ा है और उसने बंगाल की शाक्त परंपरा का वह सम्मान करते हुए नजर आने की कोशिश की है। इसके बिना उसकी जीत शायद ही मुमकिन होती।

इसे इस तरह समझें कि भाजपा का हिंदुत्व अब तक वैष्णव विचारों का ही पोषक रहा था। वह मांसाहार को गलत मानता था। मांस के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में क्या क्या नहीं हुआ। बिहार तक में उसके नेताओं ने मांस की खुली बिक्री पर रोक लगाई। जबकि भारत में हिंदुत्व के कई रंग हैं। वैष्णव के साथ साथ शाक्त और शैव परम्पराएं भी हैं। बीजेपी अब तक अगर पूरब और दक्षिण में कमजोर रही तो उसकी एक वजह यह भी थी कि उसके अंदर वैष्णव मान्यताओं को लेकर अधिक आग्रह था। मगर बंगाल में उसके नेता मछली खाते नजर आये। पीएम मोदी ने कहा कि वे लहसुन प्याज सब खाते हैं। एक तरह से बीजेपी ने यह धारणा तोड़ी कि उनका मांस मछली से कोई परहेज है। यह बीजेपी के अंदर बड़ा बदलाव है। यह उसी तरह है जैसे बीजेपी अब अपनी सवर्ण पहचान से मुक्ति पाने की कोशिश कर रही है। उसे आरक्षण और बहुजन सवालों से कोई परहेज नहीं रहा। यूजीसी और जाति जनगणना पर उसके स्टैंड इसका उदाहरण हैं। भले उसके कट्टर समर्थक जिसमें सवर्ण हिंदू अधिक हैं, भले रोते-गाते, शिकायत करते रहें। मगर पूरे देश में काबिज होने की लालसा में बीजेपी अब खुद को बदल रही है। कल को पूर्वोत्तर भारत में वह गोमांस के समर्थन में नजर आए तो किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए। क्योंकि राजनीति में विचारों का उपयोग महज सत्ता पाना है। एक हद के बाद विचारों को हाशिए पर जाना ही होता है। पहले पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी के बयान पर गौर फरमाइए। ममता का कहना है कि ‘भाजपा ने 100 से ज्यादा सीटें लूटी हैं। चुनाव आयोग अब भाजपा का कमीशन बन चुका है। मैंने इस संबंध में चुनाव अधिकारी और मनोज अग्रवाल से भी शिकायत की थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। क्या आपको लगता है कि यह कोई जीत है? यह एक अनैतिक जीत है, नैतिक जीत नहीं है। चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और केंद्रीय बलों के साथ मिलकर जो कुछ भी किया है, वह पूरी तरह से अवैध है। यह सिर्फ लूट, लूट और लूट है।

फिर सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि उलटफेर के पीछे चुनाव आयोग का चक्रव्यूह था? क्या एसआईआर के तहत बड़ी तादाद में मतदाताओं के नाम काटना बीजेपी के लिए वरदान साबित हुआ? क्या मनमाने तरीक़े से चुनाव का आयोजन करके उसने टीएमसी को पीछे धकेल दिया या फिर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में इसका राज़ छिपा हुआ है? अगर एक छोटा सा आँकड़ा ही लें तो समझ में आ जाता है कि कैसे एसआईआर गेमचेंजर रहा। बीजेपी और टीएमसी के वोटों में चार फ़ीसदी का अंतर है। अगर संख्या में बात करें तो 12-13 लाख वोटों का। अब देखिए कि वोट कितने काटे गए। 27 लाख तो लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर मगर कुल 91 लाख। 2021 में TMC का ~10% वोट लीड (60+ लाख मत) था। SIR ने ~91 लाख voters हटाकर close contests को ultra-marginal बना दिया। अब counting में BJP ~190 leads पर है – यानी SIR ने TMC की सत्ता उलटने की राह बना दी।
क्या इसके बाद कुछ कहने को रह जाता है।

भारत जैसे देश में किसी भी बड़ी पार्टी को आखिर में इन विरोधाभासों के साथ सर्व समावेशी होना ही पड़ेगा। क्योंकि भारत विविधताओं का देश है। इस तरह बीजेपी अब पुराने, इंदिरा के दौर वाले कांग्रेस जैसा बन रही है। क्योंकि पूरे भारत में सत्ता आपको तभी मिलेगी जब आप कांग्रेस की तरह हर विचारों का अम्ब्रेला बन जाएं। बीजेपी उसी दिशा में है। साथ ही उसके साथ चुनाव जीतने की मशीन भी है, जिसका नेतृत्व अमित शाह करते हैं। बंगाल चुनाव भी बीजेपी के उस कौशल का नमूना है जिसके जरिए एक राज्य का चुनाव जीतने के लिए वह अपनी हर वैध – अवैध शक्ति को दाव पर लगा देती है। इसमें सही गलत का जिक्र अलग से होगा।क्योंकि आखिरी मकसद सत्ता है और सत्ता के जरिए उन बड़ी आर्थिक शक्तियों को लाभ पहुंचाना है जो चुनाव में आपकी मदद करते हैं। हजारों करोड़ का आपका खर्चा संभालते हैं। भारत में गणतंत्र की यही विडंबना है। हर बड़े दल को आखिर में कांग्रेस बन जाना है। और फिर हर नए कांग्रेस को अपने अंतर्विरोध का शिकार हो जाना है। मैं मानता हूँ कि सत्ता में रहने वाली पार्टी कुछ हद तक चुनाव प्रक्रिया में अपनी चला लेती है मगर उससे ऐसे परिणाम नहीं आ सकते जैसे लगातार अलग अलग सूबों में आते रहे हैं। हकीकत तो यह है कि आपके पास भाजपा की चुनावी रणनीति का तोड़ ही नहीं है। या कह लें कि आपलोग भाजपा की तरह बारीक ढंग से चुनाव के लिहाज से रणनीति ही नहीं बना पाते। ऐसा नहीं है कि भाजपा को 100 प्रतिशत वोट मिल जा रहे हैं। बंगाल में भी उसे 45 प्रतिशत के करीब ही वोट मिले और तृणमूल को लगभग 41 प्रतिशत। यानी 4-5 प्रतिशत वोट के इधर उधर से ये तस्वीर आई। मगर यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि कथित विपक्षी एकता का झंडा उठाने वाली कांग्रेस, वामपंथी दल और ममता बनर्जी की पार्टी सभी मैदान में अलग अलग कूड़े हुए थे। अगर आपको मोदीजी तानाशाह और बेईमान लगते हैं, तो आपको अपनी लालच त्यागकर इकठ्ठा लड़ना चाहिए था। मगर वो क्यों करेंगे आपलोग !

हद तो यह है कि झारखण्ड की सत्ताधारी और कांग्रेस की सहयोगी पार्टी झामुमो असम में भी मैदान में उतरी हुई थी। दसेक सीटों पर इसने 15 हज़ार से ज़्यादा वोट भी काटे कांग्रेस के। और तो और तेजस्वी यादव की पार्टी बिहार से दूर केरल में उतर गयी। अरे भाई, पब्लिक को मुर्ख बनाना छोड़ो। सीखो भाजपा से। वह अपने सहयोगी दलों को कैसे बांधे रखती है, कैसे बारीक से बारीक रणनीति पर मेहनत से काम करती है और कैसे अपनी हर कमियों को दुरुस्त करती है। तुम भी करो, जीतोगे। मोदी कोई अजेय नहीं हैं, यह आज भी मेरा मानना है। चुनाव रणनीति का खेल है और जो समीकरणों को समझ कर बेहतर रणनीति बनाता है, पूरी मुस्तैदी से धरातल पर उसे उतारने की मेहनत करता है वो जीतता है। तुम्हें जीतना है तो खाली सोशल मीडिया पर सक्रियता से काम नहीं चलेगा, हर एंगल से काम करना होगा। समझ में आयी बात?

बीजेपी के भी अपने अंतर्विरोध हैं। उसकी वैचारिक पार्टनर आरएसएस धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है। खबर है कि अब तक सादगी की प्रतिमूर्ति समझे और अभाव में रह कर अपने लक्ष्य के लिए जुटे रहने वाले उनके स्वयंसेवक अब पहली बार सत्ता और धन के प्रभाव में घिरने लगे हैं। इधर दो लोगों के हाथ में पूरी सत्ता है, जो अब बूढ़े हो रहे हैं। नया नेतृत्व पैदा होना बंद हो चुका है। आलाकमान और यस मैन की संस्कृति ने जड़ जमा लिया है। कारपोरेट की बढ़ती पकड़ की वजह से जनता के पक्ष में फ़ैसले होने बंद हो गए हैं। इतिहास और अस्मिता के सहारे चुनाव जीतने की अपनी वैलिडिटी है। देर सवेरे आर्थिक मुद्दे हावी होते ही हैं। देर सवेरे आपके विरोधी समझ जाते हैं कि जाति, धर्म, इतिहास और अस्मिता के मुद्दे के नहीं फंसना है। और कई बार विरोधी आपके भीतर ही छुपकर मौके का इंतजार कर रहा होता है। फिलहाल तो बंगाल की जीत के लिए रूप बदलती भाजपा को जीत की मुबारकबाद।

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