सदियों तक सत्ता पर सवर्णों का अधिकार रहा। चाहे वह राजशाही हो या इस्लामों का दौर या फिर अंग्रेजों का समय रहा हो, सवर्ण का सत्ता से करीब का रिश्ता रहा। आंतरिक प्रशासन की नीति से लेकर विदेश संबंधी मामला और यहां तक कि कूटनीतिक जोड़तोड़, सवर्णों ने अपना लोहा हमेशा मनवाया।

इतना ही नहीं भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश की आजादी और उसके कुछ समय बाद यानि 80 के दशक तक, केंद्रीय और प्रांतीय सत्ता पर अधिकांश समय तक सवर्ण ही काबिज रहे। लेकिन इसके बाद के दशम में इसमें तेजी से बदलाव होना शुरू हुआ और आज आलम यह है कि सत्ता पर आसीन रहने वाले इन सवर्णों को अपना अस्तित्व खोजना पड़ रहा है। खुद को देश की सबसे बड़ी उदारवादी पार्टी कहने वाली भाजपा भी इन दिनों जातीय समीकरण में कुछ इस तरह उलझी है कि अपने बुजुर्ग नेताओं का सम्मान करना भूल गई। 2014 के चुनाव में बाजपेयी जी को यह कह कर टिकट नहीं दिया गया था कि अब वे बहुत अस्वस्थ हैं। लेकिन, इस बात तो बीजेपी के लौह पुरुष यानि लाल कृष्ण आडवाणी और पार्टी के दादा मुनिम यानि मुरली मनोहर जोशी को भी किनारा कर दिया गया। दूसरों को शिष्टाचार कर नसीहत देने वाली बीजेपी खुद शिष्टाचार भूल गई। नई पीढ़ि के पार्टी नेता अपने ही बुजुर्गों का सम्मान करना भूल चुकी है। बात यदि आडवाणी की होती तो अंदाजा लगया जा सकता था कि मामला सत्ता पर काबिज होने की जंग को लेकर है लेकिन, जोशी जी के साथ किया गया खेल क्या संकेत कर रहा है। ये तो ऐसे नेता हैं जो कभी सत्ता के भूखे नहीं रहे। तो क्या इसका यह अर्थ निकाल लिया जाय कि पार्टी में सवर्णों का अब कोई सम्मान नहीं है।
इसी क्रम में बात यदि बिहार की की जाय तो आज हम जिस स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं उसके लिए बीज बोने का काम हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। इन्हीं के बुलावे पर महात्मा गांधी जिला सीवान (तत्कालीन) आए थे। 1917 का उनका यह ‘नील सत्याग्रह’ देश के लिए महान परिवर्तनकारी सावित हुआ और 1947 के आते आते भारत आजादी के काफी करीब पहुंच चुका था और 15 अगस्त को पूरी तरह से आजाद हो गया। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी तो एक सवर्ण ही थे जिन्हें देश की जनता के हो रहे उत्पीड़न का अत्यंत दुख था और वे उसका निवरण करना चाहते थे। पर वर्तमान में कहानी उलट चुकी है। ये सवर्ण जो सदा सदा से समाज के न केवल पुरोधा रहे बल्कि उसके हित के लिए हमेशा काम किया, आज इसे सभी राजनीतिक दलों द्वारा क्यों उपेक्षित कर दिया गया है। 2019/2024 के आम चुनाव में इसे पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया गया है। क्या सवर्ण और मुसलमान सभी पार्टियों के लिए महज वोट बैंक बन कर रह गई हैं? सभी पार्टियों के राजनेता आखिर इनके नाम पर सिर्फ राजनीति ही क्यों करते हैं? इन्हें इनका उचित सम्मान क्यों नहीं दिया जा रहा है। खास कर बिहार के राजनीतिक फलक पर यदि नजर डाली जाय तो यह और भी खेदजनक स्थिति को दर्शाती हैं। वर्तमान में बिहार में 17 प्रतिशत सवर्ण और 16.9 प्रतिशत मुसलमान हैं। लेकिन यदि
प्रतिनिधित्व की बात की जाय तो इन्हें चुनाव में अपना भाग्य आजमाने के लिए उस हिसाब से किसी भी पार्टी अथवा गठबंधन की ओर से टिकट नहीं दिया गया है। लालू भले ही भूरा बाल खत्म करो का नारा देता रहा लेकिन उसके सबसे करीबी सलाहकार में दो भूमिहार रामाश्रय बाबू और रामानुज बाबू ही थे जिनकी बातों को लालू ने कभी नहीं उठाया और बिहार की सत्ता पर 15 वर्षों तक दोनों पति-पत्नी काबिज रहे। वहीं नीतीश ने भी जिस समय बिहार की सत्ता का कमान संभाला, उसके सिपहसलारों में भूमिहारों का ही बोलवाला था। इसमें सबसे प्रमुख नाम थे अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार और ललन सिंह। इसके अलावे भी कुछ अन्य भूमिहार नेता इनके साथ रहे पर वर्तमान में नीतीश के व्यवहार से रूष्ट होकर अनंत सिंह ने पहले तो विधान सभा के चुनाव में इनका साथ छोड़ निर्दलीय चुनाव लड़ा और अपने दम पर जीत कर दिखा दिया । पूरे बिहार के परिदृश्य पर यदि नजर डालें तो हम पाते हैं कि किसी भी पार्टी के द्वारा भूमिहार ही नहीं, राजपूतों, ब्राह्मणों, कायस्थों और मुसलमानों को भी प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है ।
उत्तर-पूर्वी बिहार की बात की जाय तो यहां भी स्थिति कुछ खास नहीं है। मुस्लिम बाहुल्य माने जाने वाले जिलों अररिया, किशनगंज, पूर्णियां, कटिहार में पार्टियों ने मुस्लिमों को तो उम्मीदवारी देने की कोशिश की है पर जिस हिसाब से वहां का जातीय समीकरण है उसमें भी ये उम्मीदवार फिट बैठते नहीं दिखाई देते। मैथिल ब्राह्मणों का गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्र मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सहरसा, सुपौल आदि में भी मैथिलों की सभी पाटिर्यों द्वारा जम कर उपेक्षा की गई है। कीर्ति झा आजाद के अलावे किसी भी कद्दावर मैथिल ब्राह्मण को इन क्षेत्रों में टिकट नहीं दिया जाता है । उसी तरह राजपूतों के साथ भी सभी पार्टियों ने नाइंसाफी की और इन्हें भी हासिये पर डाल दिया। यदि बिहार की जातीय समीकरण के आधार पर विहंगम दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि बिहार में 51 फीसदी ओबीसी हैं जिनके जातीय समीकरणों पर अच्छी तरह ध्यान दिया गया है पर सवर्णों के मामले में जो कुल जनसंख्या का 17 फीसदी है, जिसमें 5.7 फीसदी मैथिल ब्राह्मण, 4.7 फीसदी भूमिहार, 5.2 फीसदी राजपूत, 1.5 फीसदी कायस्थ हैं, इन्हें प्रतिनिधित्व के मामले में पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया गया है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यही 17 फीसदी सवर्ण हैं जिनके अधिकांश लोग पढ़े लिखे और कानून की बारीकियों को समझने वाले हैं। ये संसद में मेज थपथपाने का काम नहीं कर सकते बल्कि तर्क करने की क्षमता रखते हैं। ये समाज को एक गति देने की क्षमता रखते हैं लेकिन दुख की बात तो यही है कि पिछले कई चुनावों से इनके प्रतिनिधित्व के प्रतिशत को कम करते करते अब शुन्य के करीब लाकर छोड़ दिया गया है। कभी देश-दुनियां की रणनीति तय करने वाली इन जातियों के संतानों को इस तरह से उपेक्षित कर देना क्या भारतीय राजनीति के हित में है?
इसके साथ ही प्रश्न यह भी उठता है कि भाई-भतीजाबाद की राजनीति में उलझी बिहार की वर्तमान स्थिति क्या लालू और रामबिलास के परिवारों तक ही सीमित है जो दलितों, वंचितों और पिछड़ों का खुद को प्रतिनिधि कहते नहीं थकते। अरबों की संपत्ति पर बैठे इनके परिवार वाले खुद का भला तो चाहते हैं पर अन्य का कितना भला अब तक कर पाए, यह बात कोई पूछने वाला नहीं है। दलितों के नाम पर सत्ता तो भले ही इन्होंने पा लिया लेकिन दलितों का खून चूंसने से कभी गुरेज नहीं किया लेकिन यदि सवर्णों के दौर में सत्ता से जनहित की बात की जाय तो निश्चय ही सभी का विकास थोड़ा कम ही सही, अवश्य हुआ है। जगन्नाथ मिश्रा के शासनकाल तक दलितों और वंचितों का विशेष खयाल रखा जाता था और उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया जाता था। लेकिन जब से सत्ता की चाबी सवर्णों के हाथ से खिसक कर इन तथाकथित दलितों के हाथ में गई है, दलित और भी दलित ही हुए हैं। पर यहां बात वही उठ खड़ी होती है कि जब सवर्णों को खुद अपना अस्तित्व बचाने की नौवत आ गई है और सभी पार्टियों द्वारा उपेक्षित कर दिया गया है तो अब उन्हें अपने अस्तित्व को बचाए रखने एवं समाज को गति देने के लिए कुछ अवश्य ही सोचना पड़ेगा।
