यहाँ जो मेट्रो बनाता है, वो हारता है और जो मंदिर बनाता है वो जीतता है। यह मेडम चीफ मिनिस्टर फिल्म की बोल है जिसे में थोडा आज के अनुसार करेक्सन करता हूँ,…

यहाँ जो मेट्रो बनाता है, वो हारता है और जो मंदिर बनाता है और झूठ पर झूठ बोलता है और सिर्फ सपने दिखाता है वो निजाम बनता है। यह आज, देश हो या प्रदेश की निजामियत की सच्चाई दिख रही है. मैं वर्तमान निजामों की नीयत पर शक किए बिना यही चाहता हूँ , कि वो किसी भी तरह के कानून लाने से पहले पूरे देश की रायशुमारी ले लें। झूठा महिला आरक्षण बिल,दोस्त देश को ठुकराकर पित्री लेंड बनाया , जनता ईंधन बचाए और आप हजारों गाड़ियों के काफिलों से रोड शो करें , जनता सोना ना खरीदे मतलब खुशियां ना मनाए पर आप विदेश का दौरा झूठे प्रगति के नाम पर करें ? आज तक आपने कितने विदेश दौरे किए और उससे देश क्या क्या पाया और यूं ही विदेश दौरे में कितना खर्च किया ? सवाल ही सवाल है । अज्ञानतावश हम सरकार की तारीफ भी नहीं कर पा रहे हैं। हमने सुना है

जहाँ सच हैं, वहाँ पर जनता खडी हैं, इसी खातिर आँखों में गडी हैं.
ये तेरे मन का खोट है जो तुझे सोने नहीं देता, मत दे दोष किसी को, वक्त किसी का नहीं होता.
कीमत तो खूब बढ़ गई दिल्ली में धान की,पर विदा ना हो सकी बेटी किसान की.
हमारी रहनुमाओ में भला इतना गुमां कैसे, हमारे जागने से, नींद में उनकी खलल कैसे.
रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।
इसीलिए कहता हूँ ना हार ना जीत, सब अपनें हैं. दुर्योधन का जब बुरा दिन था, तो तालाब में छुपकर बैठा था। और अब जब अपने निजाम के बुरे दिन दिख रहे हैं तो हस्तिनापुर के चारों ओर बंकर , कंटीले तार और नहीं दिखने बाला बैरक बना रहा है। कहते हैं ना आदत नहीं बदलती। नास्तिक के मुंह से भी हे भगवान ! निकल ही जाता है। किसी के निधन पर श्रद्धांजलि गजब का व्यवहार है। कम से कम इस बैरक के जुग में तो हम ज्यादातर दिवंगतों को जानते भी नहीं। श्रद्धा तो बहुत दूर की बात है, लेकिन हमारे पास दुःख प्रकट करने के विकल्प नहीं हैं सैकड़ों किसान लापता है , अदृश्य लोगों पर FIR दर्ज हो रहा है । किसी मित्र से चर्चा की, तो उसने कहा RIP लिख दो या ॐ शांति। मैंने कहा ये भी ठीक है। मैंने उससे RIP का अर्थ पूछ लिया। सहज जिज्ञासा, कि यह मैं क्या और क्यों लिख रहा हूँ? मित्र ने झिड़क दिया। यार तुम तो बाल की खाल उधेड़ने लगते हो? जिसका इंसान मरा है या गायब हुआ है उसे पता चल जाएगा कि तुम बहुत दुखी हो । कई बार हम खुद की अति चेतना से भी परेशान हो जाते हैं। अरे, ये तो औपचारिकता है इसमें अर्थ-अनर्थ खोजने की जरूरत क्या है? श्रद्धांजलि ही दे दी, किसान संरक्षण कानून जिसे लोग कोरपोरेट संरक्षण कानून की तो कौन तुम्हारी श्रद्धा चेक करने आ रहा था ? सब दे रहे हैं, तुम भी दे दो। पर नहीं, अपने निजाम साहब को अपनी फजीहत करवाए बिना चैन कहां? हर वक्त वही शोबाजी, कैसे न जता दें, कि हम वही शब्द बोलना चाहते हैं, जिसके अर्थ और भाव से बखूबी परिचित और सहमत हों? अमेरिकी हस्तक्षेप पर बोलती बंद है। ये साहित्यकार कलाकार के लिए शेर हैं। हमारा निजाम अमेरिकी सरकार के आगे ढेर हैं। पूरी दुनिया भारतीय किसानों के साथ खड़ी थी । सरकार देश का विश्वास खो चुकी है। अब दुनिया में हमारे किसानों का डंका बज रहा है। लोकतंत्र में नागरिक सर्वोच्च होता है। नागरिक देश का मालिक है और सारे पदाधिकारी नौकर। तो कोई भी नौकर मालिक से बड़ा नहीं हो सकता। पिछले 12 वर्षों से सेना की सर्वोच्चता का चालीसा और ECI का गजब वाला खेल चालू है।

इसी बीच किसान और जनता का अकल्पित तिरस्कार भी बदस्तूर जारी दिख रहा है। अच्छा एक बात बताओ? कृषक हत्या कानून, नोट बदली,ताली थाली नाच, SIR, ECI का प्रहार कितने पेज का था ? 10 पेज? 20 पेज? जब कोई कानून का असाधारण राजपत्र अखबारों में चार पन्नों में छपा हो, तो एक बार पूरा कानून प्रकाशित कर दो। फिर कोई ये तो नहीं पूछेगा, कि आखिर ये कानून है क्या? हम निजाम जी की मजबूरी समझ सकते हैं। जिसका माल खाया है, उसका हुकुम तो बजाना ही पड़ेगा। वरना ऐसी कौन सी आफत आ गई थी, कि प्रचंड कोरोना काल में जब पूरा देश हवालात बन गया था, तब एक ब्यापारी को लाखों टन का गोदाम बनाने की इजाजत दी गई? सदा याद रहे हम भारत के लोग , लोगों से भारत है . एक तरफ मुआवजे की घोषणा हुई है और दूसरी तरफ व्हाट्सएप वीर तरह-तरह की अफवाह भी फैला रहे थे , मसलन, कौन किसान जींस पहनता है. ये किसान नहीं, असामाजिक तत्व है , नक्सली है. ये कांग्रेस का भड़काया आंदोलन है. पेट का दर्द समझिये किसान आंदोलन को देखते हुए दिल्ली की सीमाओं पर पुलिस भारी बैरिकेडिंग करते हुए सड़क पर मोटी-नुकीली कीलें लगा दी थी । दरअसल, ये कार्रवाई किसानों के विरोध-प्रदर्शन को देखते हुई की गई है, साथ ही आंदोलनकारी और किसान धरना स्थल तक ना पहुंच सके। तो वहीं, अब मायावती ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को नसीहत दी है। इससे पहले इस मलसे पर प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की थी सही में ?

हम सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश अब सोना तो छोड़ो नींद भी सुकून का खो चुके है । वर्क फ्रॉम होम , पेट्रोल डीजल की बचत , खाने में तेल का कम से कम उपयोग, केमिकल फर्टिलाइजर का उपयोग घटाकर देश हित में योगदान जनता करे और निजाम का कुनवा इस माहौल को मस्त माहौल मानकर Z सुरक्षा में अपने विपक्षी को नेस्तनाबूत करने के लिए सदा चकरब्यूह का खेल खेलते रहे । कौन समझाये कि यह विकास रूपी सत्ता की निशानी नहीं वरन विनाशरूपी सत्ता की निशानी दिख रही है । जनता से निराशा दूर हो नहीं तो जनता का दूर होना आपको पुनः मुसको भवः करवा सकती है । समय रहते सही निर्णय जरूरी है वरना –ना हार ना जीत, सब अपनें हैं – राजनीति हो पर दायरे और मर्यादे में -सच ही कहा गया है जहाँ सच हैं, वहाँ पर जनता खडी हैं, इसी खातिर आँखों में गडी हैं. ये तेरे मन का खोट है जो तुझे सोने नहीं देता, मत दे दोष किसी को, वक्त किसी का नहीं होता.हमारी रहनुमाओ में भला इतना गुमां कैसे, हमारे जागने से, नींद में उनकी खलल कैसे.रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।


