भारतीय संस्कृति और व्यवस्था पर कितनी भी नकारात्मकता लोग फैलाने का प्रयास करें हमें देखना नहीं है। यह भारत है यहां की संस्कृति अभी भी पवित्र है। मेरे देश के युवाओं को पतित हुए लोगों से प्रेरित नहीं होना है?बल्कि समाज में सज्जनों को खोजना है, उनके गुण की चर्चा करके उनके साथ कदम से कदम मिलाकर के चलने का प्रयास करना है।

आज भारत दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र है।ऐसी स्थिति में जब हम युवाओं के साथ बैठते हैं, तो ध्यान आता है की युवाओं का आपस में ही सामंजस्य की कमी और स्त्री और पुरुष युवा एक दूसरे के प्रति एक अविश्वास रखते हैं! परिवार रूपी संस्था को बनाने में।
इसके लिए दोषी कौन है? तो ध्यान आता है हर वह व्यक्ति दोषी है जो युवाओं को चरित्र प्रमाण पत्र बाटते हुए घूम रहा है। यह आपके अधिकार का विषय नहीं है, कि आप किसी को चरित्र प्रमाण पत्र बांटे! जब तक की वह मर्यादा का हनन न कर रहा हो।
आज भी इस देश का युवा अधिकांश एक मर्यादा में जीने का प्रयास करता है और ऐसी स्थिति में यह हमारा नैतिक दायित्व बनता है कि युवाओं के गुण की चर्चा हो।
आज यह बात इसलिए कह रहा हूं की एक युवा से चर्चा करते समय ध्यान आया कि उसका विवाह रूपी संस्था (अर्थात विवाह संस्कार )से विश्वास खत्म हो चला है। ऐसी स्थिति में मैंने उसको एक उदाहरण दिया कि तुम्हें पता है इस काशी में एक लड़की को बड़े बुरी तरह से उसी के जाति वालों ने यहाँ बदनाम किया की उसने शादी कर ली मैंने बताया उसे कि तुम्हें पता है वह पीएचडी की हुई है,उसकी मां प्रोफेसर है और उसके दादा स्वतंत्रता सेनानी,यही नहीं एक अच्छे जमींदार परिवार से और एक मजबूत आर्थिक स्थिति के लोग हैं!तो जिस लड़की को उसके समाज के लोगों ने बदनाम किया वह इतनी मजबूत परिवार की होकर भी अगर विवाह,परिवार और अपनों के प्रति समर्पित है,तो आज भी अच्छे युवाओं की कमी नहीं है।

जरूरत है उनकी चर्चा की, उनके बारे में संवाद की! ऐसे युवाओं को आज के समय में जहां चारों तरफ अविश्वास है, वहां पर उनकी तरफ देख करके की समर्पण किसको कहते हैं सीखने की,यह हमें प्रमाण के रूप में हमारे कालखंड में देखने को मिल रहा है।
इसलिए भारतीय संस्कृति और व्यवस्था पर कितनी भी नकारात्मकता लोग फैलाने का प्रयास करें हमें देखना नहीं है। यह भारत है यहां की संस्कृति अभी भी पवित्र है। मेरे देश के युवाओं को पतित हुए लोगों से प्रेरित नहीं होना है?बल्कि समाज में सज्जनों को खोजना है, उनके गुण की चर्चा करके उनके साथ कदम से कदम मिलाकर के चलने का प्रयास करना है। अभी मैं भी तीन दिन पहले अपने लेख के माध्यम से एक ऐसे व्यक्ति की चर्चा की जिसने उपरोक्त देवी को गलत कहाँ था, लेकिन हम लोग सन्यासी हैं,साधु हैं। हम गलत को भी सुधरने का मौका देते हैं लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि गलती भूल जाते हैं?यह भी शाश्वत सत्य है कि गलत को प्रकृति सजा निश्चित ही देती है। इसलिए गलत पथ के अनुगामी नहीं बनना है। बल्कि सत्यपथ का अनुगामी बनकर के भारत के उत्कर्ष के लिए वर्तमान के युवा एक नई कहानी लिखें इसी आशा अपेक्षा के साथ……….

