बिहार की राजनीति में ‘बाहुबल से मतपत्र’ तक का सफर तय करने वाले नेताओं की आज की स्थिति पर एक विशेष समाचार रिपोर्ट

बिहार की सियासत में ‘बाहुबल’ (क्रिमिनल टर्न राजनेता) का इतिहास दशकों पुराना है। 1980 और 90 के दशक में जिस बंदूकों के दम पर बूथ कैप्चरिंग होती थी, आगे चलकर उन्हीं बंदूकों के मालिकों ने खुद खादी पहन ली। लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बनकर इन अपराधियों ने माननीय विधायक और सांसद का टैग हासिल किया। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR India) की विभिन्न रिपोर्टों और हालिया चुनावों के आंकड़ों के अनुसार, बिहार विधानसभा और संसद में दागियों की संख्या हमेशा चिंता का विषय रही है। आइए जानते हैं बिहार के उन प्रमुख चेहरों के बारे में जिन्होंने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा और आज वे किस मोड़ पर खड़े हैं। मोकामा के पूर्व विधायक अनंत सिंह, जिन्हें समर्थकों के बीच ‘छोटे सरकार’ कहा जाता है, बिहार के सबसे चर्चित बाहुबलियों में से एक हैं. एके-47 राइफल और हैंड ग्रेनेड बरामदगी मामले में सजायाफ्ता होने के कारण उनकी विधायकी जा चुकी है। कानूनी दांव-पेंचों और गंभीर मुकदमों के बावजूद उनका राजनीतिक दबदबा कम नहीं हुआ है. हालिया चुनावों में जेल में बंद होने के बावजूद वे या उनके परिवार के सदस्य राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं, हालांकि अदालती चक्रव्यूह में घिरे होने के कारण उनकी विधायी भूमिकाओं पर हमेशा तलवार लटकी रहती है.

छोटन शुक्ला हत्याकांड और गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में आनंद मोहन को उम्रकैद की सजा हुई थी। वे देश के पहले ऐसे राजनेता थे जिन्हें लोअर कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदला। बिहार सरकार द्वारा कारा नियमों में किए गए संशोधनों के बाद पिछले वर्षों में उनकी जेल से रिहाई हो चुकी है। वर्तमान में वे सीधे तौर पर चुनाव लड़ने के लिए भले ही अयोग्य हों, लेकिन उनका पूरा परिवार सक्रिय राजनीति का हिस्सा है। वे परदे के पीछे से जातिगत समीकरणों को साधने और रैलियों के जरिए किंगमेकर की भूमिका में नजर आते हैं। सीवान के बाहुबली पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन का नाम बिहार ही नहीं, बल्कि देश के बड़े क्रिमिनल-पॉलिटिशियन गठजोड़ में गिना जाता था। तेजाब हत्याकांड समेत दर्जनों संगीन मामलों में तिहाड़ जेल में सजा काटते हुए कोरोना महामारी के दौरान उनका निधन हो गया था। शहाबुद्दीन के साम्राज्य के अंत के बाद उनकी पत्नी हिना शहाब और बेटे ओसामा शहाब सीवान की राजनीति में वजूद बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुख्यधारा के राजनीतिक दलों द्वारा सीधी दूरी बनाने या टिकट न दिए जाने की स्थिति में अब यह परिवार निर्दलीय या क्षेत्रीय गठबंधनों के सहारे अपनी जमीन तलाश रहा है।

बिहार विधान सभा में आपराधिक पृष्ठभूमि (एक नजर)
| श्रेणी / पैमाना | अनुमानित प्रतिशत / प्रभाव | वर्तमान ट्रेंड |
|---|---|---|
| दागी विधायकों की हिस्सेदारी | लगभग 55% से 60% से अधिक | सभी प्रमुख दलों (RJD, BJP, JDU) में दागी पृष्ठभूमि वाले चेहरे मौजूद हैं। |
| गंभीर अपराध (मर्डर, किडनैपिंग) | करीब 35% से 40% मामले | कानूनी सख्ती के कारण अब सीधे बाहुबलियों की जगह उनकी पत्नियों या रिश्तेदारों को टिकट देने का चलन बढ़ा है। |
जैसे-जैसे राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है, अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने के रास्ते तंग हो रहे हैं। हाल ही में बिहार के गृह विभाग में हुए प्रशासनिक बदलावों के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर कड़ा रुख अपनाया जा रहा है. बिहार पुलिस द्वारा बेगूसराय और अन्य इलाकों में किए गए त्वरित एनकाउंटर और अपराधियों पर सीधी कार्रवाई को मीडिया और सोशल मीडिया पर “योगी-स्टाइल एक्शन” के रूप में देखा जा रहा है. गृह विभाग का जिम्मा संभाल रहे नेतृत्व ने साफ चेतावनी दी है कि सूबे में किसी भी प्रकार के अपराध या अपराधियों को राजनीतिक सहूलियत नहीं दी जाएगी. आज बिहार की राजनीति का यह ‘क्रिमिनल से नेता’ बनने का सफर एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, चुनाव आयोग के कड़े नियमों और जागरूक होते मतदाताओं के कारण अब बाहुबली सीधे तौर पर सदन में पहुंचने के बजाय अपनी पत्नियों, बेटों या रिश्तेदारों को चुनावी मैदान में उतारने पर मजबूर हैं। हालांकि, जमीन पर उनका प्रभाव आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन जेल की सलाखों और अदालती फैसलों ने इनके राजनीतिक कॅरियर पर ब्रेक जरूर लगा दिया है.




