आज का बिहार एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ आम आदमी खुद को असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्थाएं वेंटिलेटर पर हैं, शिक्षा व्यवस्था बदहाल है और रोजगार के साधन नगण्य हैं।

“बिहार में बहार है…” एक समय यह चुनावी नारा राज्य की फिजाओं में गूंजता था और जनता को एक बेहतर भविष्य की उम्मीद देता था। लेकिन साल 2026 की मौजूदा जमीनी हकीकत को देखें, तो यह नारा पूरी तरह बेमानी और एक क्रूर मजाक जैसा प्रतीत होता है। आज बिहार की स्थिति को देखकर भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक की वह अमर पंक्ति याद आती है—”अंधेर नगरी, अनबूझ राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।” सूबे में न तो कानून का इकबाल बचा है, न विकास की कोई स्पष्ट दिशा दिख रही है और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह बेलगाम हो चुकी है। किसी भी सभ्य समाज की पहली शर्त मजबूत कानून व्यवस्था होती है, लेकिन बिहार में आज अपराधी बेखौफ हैं और आम जनता डरी हुई है। आए दिन होने वाली हत्याएं, लूट और बलात्कार की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि पुलिस का खौफ केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
जमुई की हालिया घटना (सितंबर 2026): कानून व्यवस्था की बदहाली का सबसे ताजा और रूह कंपा देने वाला उदाहरण जमुई से सामने आया है. कोचिंग क्लास से लौट रही कक्षा 10 की एक छात्रा के साथ कुछ बदमाशों ने सरेराह छेड़खानी की, उसके कपड़े खींचे और इस पूरी हैवानियत का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया.
प्रशासन की असंवेदनशीलता: इस घटना से भी ज्यादा शर्मनाक सत्तापक्ष का रवैया रहा। जनता दल यूनाइटेड (JDU) के प्रदेश अध्यक्ष और कुछ मंत्रियों ने इस भयावह वारदात को “एक छोटी और छिटपुट घटना” बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। जब राज्य के रक्षक ही अपराधियों के कृत्य को ‘छोटा’ बताने लगें, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना लाजिमी है। मुख्य विपक्षी नेता Tejashwi Yadav और अन्य नेताओं ने इसे राज्य के माथे पर कलंक बताया है।

बिहार में बुनियादी ढांचे और विकास का दावा करने वाली सरकार की पोल हर साल बाढ़ और गिरते पुल खोल देते हैं। अरबों रुपये की लागत से बनने वाले पुल उद्घाटन से पहले ही ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।
भ्रष्टाचार और नीतिगत विफलता: सड़कों और पुलों का निर्माण जनता की गाढ़ी कमाई से होता है, लेकिन इंजीनियरों, ठेकेदारों और राजनेताओं के गठजोड़ के कारण विकास योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। उद्योग-धंधों के नाम पर बिहार आज भी शून्य पर खड़ा है। रोजगार के अभाव में युवा आज भी दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं।
बाढ़ का कुप्रबंधन: हाल ही में राज्य के कई जिले भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। सरकार द्वारा करोड़ों रुपये की राहत राशि की घोषणा की जाती है, लेकिन धरातल पर पीड़ितों तक प्लास्टिक की एक तिरपाल और दो वक्त का अनाज भी बमुश्किल पहुंच पाता है। विकास के नाम पर केवल वादों की बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी की जा रही हैं।

बिहार में सुशासन का दावा करने वाली सरकार अब पूरी तरह ‘अफसरशाही’ (Bureaucracy) के चंगुल में फंस चुकी है। जनता की सुनने वाला कोई नहीं है और प्रशासनिक अधिकारी अपनी मर्जी से फैसले ले रहे हैं।
पटना हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी (सितंबर 2026): प्रशासनिक मनमानी का एक ज्वलंत उदाहरण हाल ही में पटना हाईकोर्ट के एक फैसले में देखने को मिला। माननीय उच्च न्यायालय ने नालंदा के दो निवासियों पर बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम (CCA) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों को खारिज कर दिया। अदालत ने जिलाधिकारी (DM) के आदेशों को “कट-एंड-पेस्ट” और रूढ़िवादी ढर्रे पर आधारित माना, जिसमें बिना किसी ठोस कानूनी आधार के नागरिकों के अधिकारों का हनन किया गया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को 1-1 लाख रुपये का मुआवजा देने और दोषी अधिकारियों की जेब से इसे वसूलने का आदेश दिया है। यह घटना दर्शाती है कि जिला स्तर के बड़े अधिकारी किस तरह कानून की धज्जियां उड़ाकर तानाशाही चला रहे हैं। बिहार की इस दुर्दशा के पीछे राज्य की लगातार डगमगाती राजनीतिक स्थिति भी है। राजनीतिक दल केवल सत्ता हथियाने और कुर्सियों के खेल में व्यस्त हैं।
नेतृत्व परिवर्तन का दौर: मार्च 2026 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने के बाद, अप्रैल 2026 में बीजेपी के Samrat Choudhary ने नए मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली। लेकिन इस सत्ता परिवर्तन के बाद भी शासन व्यवस्था सुधरने के बजाय और बिगड़ती चली गई। गठबंधन के अंदरूनी मतभेदों और पांच-छह सालों में बार-बार बदले गए मंत्रिमंडलों के कारण नीतियों में कोई निरंतरता नहीं बची है।
आज का बिहार एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ आम आदमी खुद को असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्थाएं वेंटिलेटर पर हैं, शिक्षा व्यवस्था बदहाल है और रोजगार के साधन नगण्य हैं। जमुई में सरेराह बेटियों की इज्जत पर हाथ डालना और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कानून का मजाक उड़ाना इस बात का साफ संकेत है कि बिहार में सचमुच ‘अंधेर नगरी’ जैसी स्थिति बन चुकी है। यदि सरकार ने अपनी राजनीतिक नौटंकी और अफसरशाही पर लगाम नहीं लगाई, तो इतिहास बिहार को कभी माफ नहीं करेगा। जनता अब खोखले नारों से ऊब चुकी है; उसे धरातल पर कानून का राज, वास्तविक विकास और एक संवेदनशील प्रशासन चाहिए।



