अयोध्या में राम मंदिर चंदा चोरी का विवाद और यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस, 2026 (UGC Equity Regulations, 2026) पर छिड़ी रार के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पारंपरिक वोट बैंक और आम जनता में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।

देश के कई हिस्सों में विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा इन मुद्दों को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं, जिससे सत्ताधारी दल और वैचारिक संगठन के प्रति जनमानस के एक वर्ग का मोहभंग होने के संकेत मिल रहे हैं। भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और सुशासन के दम पर एकछत्र राज करने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सामने इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। हाल ही में अयोध्या के भव्य राम मंदिर में सामने आया कथित चंदा चोरी (दान राशि गबन) का मामला और देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘आधे-अधूरे’ इक्विटी नियमों ने जनता के एक बड़े हिस्से, विशेषकर उनके पारंपरिक सवर्ण और मध्यवर्गीय वोट बैंक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों मुद्दों ने संगठन की नैतिक विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

अयोध्या में सदियों के इंतजार के बाद जब रामलला का भव्य मंदिर बना, तो उसे देश के करोड़ों हिंदुओं की आस्था और समर्पण का प्रतीक माना गया। अमीर से लेकर गरीब तक, हर किसी ने अपनी गाढ़ी कमाई से मंदिर निर्माण के लिए चंदा दिया था। लेकिन हाल ही में जब राम मंदिर के दान पात्रों से लाखों रुपये की नकदी चोरी और गबन का मामला सामने आया, तो इसने देश को झकझोर कर रख दिया। विशेष जांच दल (SIT) की जांच के बाद इस मामले में ट्रस्ट के कुछ कर्मचारियों सहित आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। हालांकि विपक्षी दलों, जैसे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का आरोप है कि बड़ी मछलियों को बचाने के लिए केवल छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराई गई है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कई नेताओं का कहना है कि गांवों में आम जनता इस बात से बेहद आक्रोशित है कि भगवान के नाम पर आए पैसे में भी सेंधमारी की गई। राम मंदिर आंदोलन से जुड़े पुराने नेताओं ने भी इस पर गहरी चिंता जताई है। जनता के बीच यह संदेश गया है कि जो संगठन खुद को ‘धर्म और संस्कृति का रक्षक’ बताता था, उसकी नाक के नीचे इतना बड़ा वित्तीय घोटाला कैसे हो गया?

दूसरी तरफ, शिक्षा के क्षेत्र में जनवरी 2026 में लाए गए ‘UGC इक्विटी रेगुलेशंस’ ने समाज को दो धड़ों में बांट दिया है। इस कानून का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकना था। लेकिन इसमें सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों के लिए किसी भी संरक्षण का अभाव और झूठी शिकायतों के खिलाफ सख्त प्रावधान न होने के कारण सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों में भारी रोष फैल गया। [1, 16, 17]इस कानून के विरोध में भाजपा के कई सवर्ण पदाधिकारियों ने इस्तीफे दे दिए, जिससे पार्टी के भीतर ही आंतरिक कलह उजागर हो गई। सवर्णों को लगा कि उनके बच्चों का भविष्य खतरे में डाला जा रहा है। बढ़ते विरोध और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कानून पर रोक लगाए जाने के बाद, जब केंद्र सरकार ने इस पर पुनर्विचार करने की बात कही, तो अब ओबीसी और बहुजन समाज के संगठन भाजपा और आरएसएस पर दलित-पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगा रहे हैं। इस प्रकार, भाजपा ‘एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई’ वाली स्थिति में फंस गई है—वह न तो अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थकों को नाराज कर सकती है और न ही उस बड़े ओबीसी वर्ग को छोड़ सकती है जिसे उसने पिछले एक दशक में अपने पाले में किया था।
ग्राउंड रिपोर्ट और हालिया उपचुनावों के रुझान (जैसे बंकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार) यह संकेत देते हैं कि जनता अब केवल भावनात्मक मुद्दों के सहारे सरकार के फैसलों को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। आरएसएस की पहचान हमेशा से एक अनुशासित और आर्थिक रूप से शुचिता बनाए रखने वाले संगठन की रही है। राम मंदिर जैसे पवित्र स्थल पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने उसकी इस छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है। यूजीसी नियमों को लेकर सरकार की हड़बड़ाहट और फिर अदालती दखल के बाद पैर पीछे खींचने की मुद्रा ने उसकी नीतिगत परिपक्वता पर सवाल खड़े किए हैं। रोजगार की कमी से जूझ रहे युवाओं को जब विश्वविद्यालयों में इस तरह के कानून दिखाई देते हैं जो उन्हें आपस में लड़ाते हैं, तो उनका झुकाव मौजूदा व्यवस्था से हटने लगता है।
राजनीति में जनता का भरोसा कमाना जितना कठिन होता है, उसे गंवाना उतना ही आसान। राम मंदिर में चंदा चोरी और यूजीसी कानून के चक्रव्यूह ने आरएसएस और भाजपा के संयुक्त नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। यदि समय रहते इन दोनों संवेदनशील मुद्दों पर पारदर्शी कार्रवाई और समाज के सभी वर्गों को संतुष्ट करने वाली नीतियां नहीं बनाई गईं, तो आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। जनता का यह बदलता मिजाज इस बात का गवाह है कि लोकतंत्र में ‘आस्था’ और ‘अधिकार’, दोनों की रक्षा समान रूप से जरूरी है।




