भरत तिवारी का एनकाउंटर गलत या सही, संविधान का पालन हुआ या नहीं ?

हर युग में जो सच बोलेगा, विक्षिप्त कहलाएगा. हर युग में जो कड़वा सच बोलेगा, राक्षस कहलाएगा. फिर इसी आधार पर सुरधाम पहुंचा दिया जाएगा. आरा के भरत तिवारी के साथ ऐसा हुआ. सवाल जायज है, भरत तिवारी का एनकाउंटर गलत है या सही, संविधान का पालन हुआ या नहीं ?

ब्राह्मण होना, मेरे लिए समर्थन और विरोध का कारण नहीं है। जानता हूं भरत तिवारी का एनकाउंटर गलत हुआ है। उसे पुलिस ने घेरकर मारा है। वह अपने गांव में लोकप्रिय था। एक गंभीर मुद्दे पर लोगों की लड़ाई लड़ रहा था। उसकी नीयत अच्छी ही रही होगी। दूसरी तरफ, भरत का तरीका आपराधिक था। वह मरने से पहले खुद को अपराधी सिद्ध कर गया। सरेआम न केवल पिस्तौल लहराना किसी भी सूरत में बर्दाश्त योग्य नहीं है। पुलिस ने गलती की, उसे मार दिया। पुलिस ने उस वक्त वाक ओवर देकर उसे शस्त्रहीन होने के बाद शूट किया। यहां पुलिस अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा चलना ही चाहिए।

निहत्थे पर वार कायराना हरकत है, ऐसा नहीं करना चाहिए. लेकिन, जिनके लिए सनातन सिर्फ सत्ता पाने का जरिया हो, वो भला क्यों सनातन के सन्देश को मानेंगे? जैसे भरत तिवारी अपने इलाके के पीड़ित लोगों की बातें सामने रखता था. हालांकि, उसने अंत में जो रास्ता चुना, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनुमति नहीं है. लेकिन, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सरेंडर कर चुके व्यक्ति को गोली मारने की भी अनुमति नहीं है. मी लार्ड को अगर ये घटना पता है, तो वे स्वत: संज्ञान लेंगे, ऐसी उम्मीद हमें करनी चाहिए.

आज दिल्ली के रायसीना से सत्ता चलाने का नया टाइप है , इन्काउनर , बुलडोजर , जाति के नाम पर हत्या, सरकार से सवाल पूछने वालों की हत्या… ब्राह्मण समाज अपने हत्यारों के आगे नतमस्तक है। कारण सिर्फ और सिर्फ मुसलमान से नफरत। ब्राह्मण समाज रोता बहुत अच्छा है। औरंगजेब ने 786 क्विंटल जनेऊ जमा करके जश्न मनाया था। यही कहानी अलाउद्दीन खिलजी पर भी चिपका दी जाती है। यह जनेऊ उन ब्राह्मणों की थी, जिनके सिर मुसलमानों ने काट डाले थे। मुस्लिम शासकों के हाथों सबसे ज्यादा छोटी जातियों के लोग मारे गए थे, जबकि सबसे कम ब्राह्मण। राजपूत वही मारे गए, जो युद्ध करते थे। फतह के बाद नरसंहार मध्यकाल में आम बात थी, जो हिंदू-मुस्लिम या हिंदू-हिंदू युद्ध में खूब हुआ है (जैसे विजयनगर साम्राज्य का खात्मा)।

भरत तिवारी ने यही एक गलती की, उसने खुद के आवेग पर नियंत्रण नहीं किया. उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समझने की जहमत नहीं उठाई. उसने ये नहीं समझा कि अब उसके साथ आगे क्या होगा? खैर, वो विक्षिप्त था, राक्षस था, तो लोतान्त्रिक परक्रिया से ही उसे डील करना था. आखिरकार वो हमारे ही लोकतंत्र का एक रिसोर्स (संसाधन) था. हमने उसे बर्बाद कर दिया. शायद इसलिए कि 140 करोड़ में एक की जान का अर्थ वाकई खस्सी-बकरी जैसा ही है. कोलैटरल डैमेज बन गया भरत…राक्षस……जो भी आगे कभी आवाज उठाएगा….. राक्षस बता कर सुरधाम को पहुंचा दिया जाएगा….

अब ब्राह्मण की हत्या पर अन्य जातियां चटखारे ले रही हैं। कोई किसी यादव को याद कर रहा है, तो कोई किसी दलित को। हम यह काम बहुत अच्छा कर लेते हैं। हम अत्याचारों को जातियों में बांटकर उसे सामान्य बना देते हैं। फिर से साफ कर दूं, भरत तिवारी ब्राह्मण होने के कारण नहीं, गुंडा होने के नाते मारा गया। उसे मारने का तरीका जरूर गैरकानूनी था, लेकिन उसकी पिस्तौल से निकली हवाबाज गोलियों ने फलटकर उसकी कहानी पूरी कर दी।

इसलिए, हे युवा दोस्तों….भरत तिवारी से प्रेरणा न लेना…बाकी, भरत की आत्मा को ईश्वर शान्ति दे, सत्ता को सदबुद्धि दें. 

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