कल ही तो ट्रेन से यात्रा करते समय ये ध्यान आया,कि किसी ज्ञानी पुरूष ने कहा था कि पटरी पर सिक्का रख दो तो चुम्बक बन जाता है, तभी तो फरिश्तें आकर उन बच्चों के जिस्म पर खुश्बू लगाते है जो बच्चे रेल के एक डिब्बों में जो झाडू लगाते है ।

अब आप ही देखो ना हम प्रवासियों के लिए खुशी का सबसे बड़ा पैगाम होता है, जब गाँव की रेल की रिजर्वेशन लिस्ट में अपना नाम होता है। जिन्दगी की ट्रेन जब तक पटरी पर चलती है,तब तक जिन्दगी की हकीकत का पता नहीं चलता है। यही हकीकत है की रेल की पटरियों पर दौड़ती जिन्दगी की और रेल की पटरियों पर दम तोडती जिन्दगी की। ट्रेन का सफर बड़ा ही रोमांचक होता है . यदि आपने भी सफर किया होगा तो आपको पता होगा. ट्रेन पर कितने अजनबी लोग मिलते है. उनसे अजीबों गरीब बातें होती हैं. भारतीय ट्रेन की विशेषता है कि वो कभी भी समय पर नहीं पहुँचती है. अगर कुछ एक ट्रेन को छोड़ दिया जाए. भारत में सबसे अधिक रोजगार रेलवे विभाग ही देता है. भारतीय रेलवेज, एशिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क के रूप में जाना जाता है। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है जो एक ही मैनेजमेंट के अंतर्गत चलाया जा रहा है। रेलवेज हर दिन करीब 12,617 ट्रेनों पर 23 लाख यात्री सफर करते हैं। भारतीय रेल ट्रैक की कुल लंबाई 64 हजार किलोमीटर से ज्यादा है। वहीं अगर यार्ड, साइडिंग्स वगैरह सब जोड़ दिए जाएं तो यही लंबाई 1 लाख 30 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा हो जाती है। आइए आज मै आपको अपने शब्दों के माध्यम से वैश्विक आश्रय स्थल , अखिल भारतीय भिक्षावृति केंद्र, जीवन मुक्ति केंद्र, स्वरोजगार विदाउट जीएसटी, निःशुल्क विज्ञापन केंद्र, चलंत मनोरंजन केंद्र, प्रसाधन उत्कीर्ण कला सृजन केंद्र, चलंत जैविक उद्यान, अपना भारतीय रेलवे का घर बैठे निःशुल्क दर्शन करवाता हूँ । इस व्यंग्य एक्सप्रेस यात्रा में आपके पूर्ण मनोरंजन की व्यवस्था है ये मै दावा कर सकता हूँ । भारतीय रेल अपने आप में ऐसी इकलौती संस्थान है जो कला, मनोरंजन व आय का अद्भुत एवं अद्वितीय केंद्र है । अब आप ही देखिये ना अपना भारतीय
रेलवे एक वैश्विक आश्रय स्थल है
छोटा मोटा रेलवे स्टेशन से लेकर बड़ा बड़ा जंक्शन उस समय आश्रय गृह के तौर पर नजर आता है जब कभी प्लेटफार्म पर नंग धड़ंग अवस्था में, हाथों में ईट लिए बड़ी बड़ी दाढ़ी वाला कोई विक्षिप्त व्यक्ति इधर से उधर परेड करता या ट्रेन की मौखिक उद्घोष करता, या फिर नेता की तरह भाषण देता दिख जाता है। घुमंतू भोटिया से लेकर घर से भागा बंदा रेलवे प्लेटफॉर्म पर शरण ले सकता है। प्लेटफार्म ना सिर्फ विक्षिप्त या निकम्मे निठल्ले का आश्रय स्थल है अपितु उठाईगिरी, पाकेटमार जैसे मेहनतकश लोगों के लिए 24×7 वर्किंग प्लेस होता है।
अखिल भारतीय भिक्षावृति केंद्र
आप प्लेटफार्म पर खड़े हुए नहीं कि छोटे छोटे बच्चों की मंडली आपके पैर छूना शुरू कर देता देती है। ना जी ना इसमें संस्कार की कोई बात नहीं हैं दरअसल ये आशीर्वाद के लिए नही बल्कि पैसा पाने के लिए पैर छूते है। वैसे भी भूख तो पैसों से ही मिट सकती है आशीर्वाद से नहीं। ये भिखारी वेश वाले बच्चे या बड़े तब तक आप के पांव एवं गले पड़े रहेंगे जब तक आप इन्हें कुछ मौद्रिक राशि का अनुदान नहीं दे देते या यूँ कहें की आपसे नहीं ले लेते । रनिंग ट्रेन के अंदर तो हर सप्ताह अपने माता-पिता का श्राद्ध करने वाले गरीब व्यक्ति, एक युग से मंदिर निर्माण करने वाले चंदा के इच्छुक बाबाजी से लेकर कैंसर का डाक्टरी प्रमाणपत्र लिए तथाकथित रोगी या रोगी के परिजन भी आर्थिक सहयोग की उम्मीद में सहर्ष ही नजर आ जाते हैं ।
जीवन मुक्ति केंद्र
रेलवे जीवन मुक्ति का भी सबसे बड़ा साधन है। व्यक्ति जब अपने जीवन से निराश हो जाएए सास बहू की तू तू मैं मैं हो जाए, समाज जब प्रेमी प्रेमिका के बीच दीवार बन जाए तो हजारों किलोमीटर के दायरे में फैली रेलवे ट्रैक इनकी समस्याओं का समाधान केंद्र बन जाता है। ये आपने भी देखा ही होगा . यहाँ पर आए दिन कई दुखी इंसान चलती ट्रेन के आगे लेट कर सांसारिक मोहमाया से मुक्त होते है।
स्वरोजगार विदाउट जीएसटी
रेलवे बिना जीएसटी पे किए स्वरोजगार का भी बहुत बड़ा साधन है। चिनिया बदाम, झालमुढी, खीरा, ककड़ी, चाय आदि का खोमचा केतली आदि लटकाए बिना भेंडिंग लाइसेंस के आप स्लीपर व एसी कोच में बेधड़क बेरोकटोक घुसकर चाय, पानी, गुटखा आदि कुछ भी बेच सकते है। हालांकि अपनी दैनिक आय का कुछ अंश आपको राजकीय लाठी व वर्दीधारी पुरूष को कंट्रीब्यूट करना होता है।
निःशुल्क विज्ञापन केंद्र.
जिस प्रकार सिनेमा हाल में बैठने पर फिल्म के प्रारंभ में अक्षय कुमार, राहुल द्रविड़ या मुकेश सिगरेट से होने वाली हानि के बारे में बताता है वैसे ही ट्रेन में अंदर बैठने पर बोगी की दीवारों पर सिगरेट पीने पर होने वाले जुर्माना का उल्लेख होता है। चारो तरफ नजर दौड़ाने पर स्टिकर वाले विज्ञापन नजर आते है। ये विज्ञापन छात्र, बेरोजगार, रोगी आदि हर उम्र के लोगों के लिए लाभकारी होती है। छात्रों के लिए रिजल्ट की 100प्रतिशत गारंटी वाली कोचिंग का विज्ञापन हो या बेरोजगारों के लिए घर बैठे पंद्रह से पचास हजार रुपये कमाने वाला विज्ञापन, आंखों का इलाज हो या मुफ्त मोतियाबिंद आपरेशन, चर्म रोग, डायबीटीज, कब्ज से लेकर खानदानी शफाखाना के गुप्त रोग का शर्तिया इलाज वाला विभिन्न रंगों का विज्ञापन स्टिकर के रूप में ट्रेन की दीवारों से चिपका रहता है। जिन पर ना चाहते हुए भी तीन घंटे के सफर में तीन सौ बार आपकी नजर जानी ही जानी है। वैसे भी टीवी का विज्ञापन रहे तो रिमोट से बदला भी जा सकता है पर सीट बदलने का रिस्क भला कौन ले सकता है। इन सबमें एक अद्भुत विज्ञापन गोल्ड मेडलिस्ट तांत्रिक बाबा की उपलब्ध रहती है। जिसमें तस्वीर तो शिरडी के साईं की रहती है पर कथन स्वयं यमराज के होते है जो फोन पर ही आधे घंटे में सौतन को तड़पते देखने का दंभ भरता है एजमीन जायदाद प्रेम पैसा के विवादों व दुश्मनों को मिटाने का अदम्य कार्य को महज आधा पौने घंटा में करने का दावा करता है। जो काम हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट छः माह में भी नहीं कर सकती वो ये आधा पौने घंटा में निष्पादन का माद्दा रखते हैं । ये खुलेआम काला जादू के जानलेवा प्रयोग का प्रचार प्रसार कर रहे होते है।
चलंत मनोरंजन केंद्र.
ट्रेन खुलने भर की देर है, फिर क्या गला एवं नाक के संयुक्त प्रयोग से परदेशी परदेशी गाती और दो पत्थरों से इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक उत्पन्न करती हुई रेशमा के खानदान की कुछ लड़कियाँ या युवतियां जबरन सिंगिंग परफार्मेंस देकर आपसे आर्थिक उम्मीद लगा बैठेगी। इन्हें तो आप टाल भी सकते हो लेकिन ताली पीटकर दे रे चिकने का उद्घोष करने वाली टीम को आपको आर्थिक अनुदान देना ही पड़ जएगा।
प्रसाधन उत्कीर्ण कला सृजन केंद्र.
रेल शौचालय कलाकृति का अद्भुत केंद्र है जिसके अंदर की दीवारों पर खजुराहो की कलाकृतियों को पेन या पेंसिल से उभारने की विभिन्न कलाकारों द्वारा कोशिश की गई रहती है। दीवार को डायरेक्टरी समझ कर ये लोग विभिन्न मोबाइल नम्बर एवं उनकी मालकिन के बारे मे भी लिख देता हैं। ऐसा प्रतीत होता है आकृतियों को बनाने वाला कलाकार बायोलाजी का ज्ञाता है और वात्सल्य के खानदान का बुझने वाला अंतिम चिराग है जो अपने विचार को कागज, पत्र-पत्रिका, फेसबुक-ट्वीटर की बजाय शौचालय में उत्कीर्ण कर देता है। इनकी सोच को शौच की दीवारों पर भली भांति देखा जा सकता है।
चलंत जैविक उद्यान
यूँ तो आप टिकट लेकर जू में विभिन्न प्राकृतिक जीवों का आनंद लेते ही हैं किन्तु यात्रा टिकट पर चलंत चिड़ियाघर का आनंद सिर्फ भारतीय रेलवे में ही उपलब्ध है। जनरल डिब्बों में लगेज सीट पर जूता सहित टारजन की तरह बैठने वाले भालू हमेशा दिखाई देता है। नीचे बैठा यात्री जूता खोलकर बैठने के लिए लाख गिड़गिड़ा ले किन्तु बंदा नीचे बैठे यात्रियों पर जूता के धूल से आकाशीय अभिवादन करने को व्यग्र रहता है। और जूता सहित उपर बैठ कर जूता या चप्पल में लगे धूल को इंस्टॉलमेंट में नीचे गिराता रहता है। रात्रि के एक बजे स्लीपर क्लास में मोबाइल पर हाय बेस और फूल वॉल्यूम में भोजपुरी विडियो सांग का आनंद लेने और सहयात्री की नींद हराम करने वाला चिम्पांजी भी रात्रि यात्रा के दरम्यान आपको अक्सर मिल ही जाता है। रनिंग ट्रेन में खिड़की से हस्त प्रक्षालन कर या मुंह से कुल्ला कर पीछे की विंडो सीट पर बैठे यात्रियों को मौखिक गुलाबजल सदृश फुहारा से आनंदित करने वाले दो चार सोशल एलिफेंट भी वींडो सीट पर खाते-पीते नजर आ जाते है। खैनी रगड़कर सहयात्री के श्वसन तंत्र को प्रभावित करने वाले दुटंगा वायरस भी यदा कदा दिख ही जाता है। सबसे बड़ी बात यात्रा के दौरान अंदर की खाली सीट छोड़कर ट्रेन की गेट पर लटकने वाले बंदरों की संख्या मास में नजर आती है। और कुछ नही तो कम से कम मौलिक आवाज की बजाय जगदीप या कुलभूषण खरबंदा की आवाज में फटेहाल वोकल साउंड वाला गरम चाय, पानी, झालमूढी बेचता भेंडर सुनाई और दिखाई तो दे ही जाता है। यात्रा के दौरान जबतक आप इन सारी परिस्थितियों से मुखातिब नही होते तब तक आपकी रेल यात्रा अधूरी समझी जाती है।….जाते जाते….जिन्दगी अपनी इश्क ना हुआ रेल हो गई,देरी से भी आती है,इंतजार भी कराती है और अगले ही स्टेशन पर बेवफा भी हो जाती है.
