मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने?

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश क्यों चंचल पवन सा बहता जाए। क्यों छिन-छिन आकुल होए?जो होना है, वो होकर रहेगा। फिर क्यों व्यर्थ डरे?मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने..। माली चाहे सींचे सौ-सौ गागर,ऋतु आए बिन न फूल खिले। वक़्त से पहले इच्छाओं के,सच्चे मोती कभी न मिलेल छाँव ढूँढता धूप … Continue reading मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने?