डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

क्यों चंचल पवन सा बहता जाए। क्यों छिन-छिन आकुल होए?
जो होना है, वो होकर रहेगा। फिर क्यों व्यर्थ डरे?
मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने..। माली चाहे सींचे सौ-सौ गागर,
ऋतु आए बिन न फूल खिले। वक़्त से पहले इच्छाओं के,
सच्चे मोती कभी न मिलेल छाँव ढूँढता धूप में तू भटके,
निज भीतर क्यों न विश्राम करे? मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने।
जो बीता, वो घरौंदा रेत का, जो आएगा, वो धुंधला साया।
आज का यह पल ही है सत्य, बाक़ी सब केवल मोह- और माया।
शांत नदी सा तू, क्यों न बहता। धैर्य ही जीवन के हर कष्ट हरे।
मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने। सुख-दुख तो रंग हैं आने जाने,
एक ही जीवन की चादर के। धीरज रख तो दिख जाएँगे,
रस्ते इस गहरे सागर के। तू ही समंदर, तू ही किनारा,
फिर क्यों औरों की आस करे? मन रे, तू काहे न मेरी बात सुने…




