बिहार की राजनीति हमेशा से देश के लिए एक प्रयोगशाला रही है, लेकिन हाल ही में जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे केवल और केवल लोकतंत्र के पतन और सत्ता लोलुपता की कहानी बयां करती हैं।

राजनीतिक गलियारों से आ रही ताज़ा ख़बर—जहाँ जनता दल (यूनाइटेड) की हालिया समीक्षा बैठक में वरिष्ठ नेता और विधान पार्षद नीरज कुमार ने अपनी ही पार्टी के दिग्गज मंत्री अशोक चौधरी के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई है—यह साबित करने के लिए काफी है कि इस दल के भीतर सिद्धांतों की बलि बहुत पहले ही चढ़ाई जा चुकी है। यह केवल एक व्यक्तिगत अदावत का मामला नहीं है, बल्कि उस खोखलेपन का प्रमाण है जो आज के भारत की क्षत्रप राजनीति की पहचान बन चुका है।
बैठक का तमाशा और अंदरूनी अंतर्द्वंद्व
समीक्षा बैठक का आयोजन तो पराजय के कारणों को ढूंढने और संगठन को मजबूत करने के लिए किया गया था, लेकिन वहाँ जो देखने को मिला वह किसी नौटंकी से कम नहीं था। नीरज कुमार का यह लिखित आरोप कि मंत्री अशोक चौधरी ने चोरी-छिपे चुनावी प्रतिद्वंद्वी ‘जन सुराज’ के प्रत्याशी का समर्थन किया और उन्हें संसाधन मुहैया कराए, यह दिखाता है कि गठबंधन और दलीय वफादारी सिर्फ कागजों पर बची है। जब एक सिटिंग मंत्री अपनी ही पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार की जड़ें खोदने में लगा हो, तो समझा जा सकता है कि राजनीति की नैतिकता किस रसातल में जा चुकी है। यह आज के भारत का एक ज्वलंत उदाहरण है जहाँ राजनेताओं के लिए विचारधारा कोई मायने नहीं रखती। सुबह किसी और खेमे में हाजिरी लगाने वाले नेता शाम को दूसरी नाव पर सवार दिखते हैं। बिहार में चल रहा यह खेल केवल एक सीट के लिए नहीं है; यह एक पार्टी के भीतर अपना वर्चस्व बनाए रखने और आने वाले समय में सत्ता की मलाई पर कब्ज़ा करने की होड़ है।

ललन सिंह बनाम संजय झा: दो खेमों में बंटी कुर्सी की लालसा
इस विवाद ने जेडीयू के भीतर की उस दरार को पूरी तरह उजागर कर दिया है जो लंबे समय से सतह के नीचे खदबद कर रही थी। अब यह स्पष्ट रूप से दो गुटों की जंग बन चुकी है।
ललन सिंह खेमा: केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के नेतृत्व में एक बेहद मजबूत और आक्रामक धड़ा लामबंद है, जिसमें अनंत सिंह, अशोक चौधरी, कौशलेन्द्र कुमार और कई विधायक शामिल हैं। इस गुट की पकड़ पटना, मुंगेर और लखीसराय के क्षेत्रीय सियासी समीकरणों पर इतनी मजबूत है कि वे कभी भी बाजी पलट देने का माद्दा रखते हैं। यह धड़ा पूरी तरह से ज़मीनी ताकत और बाहुबल के सहारे अपनी शर्तें मनवाने पर आमादा है।
संजय झा खेमा: दूसरी तरफ राज्यसभा सांसद संजय झा का खेमा है, जिसे उमेश कुशवाहा और नीरज कुमार जैसे नेताओं का समर्थन हासिल है। विडंबना देखिए कि जिस नेता (संजय झा) की ज़मीन पर कोई खास राजनीतिक पकड़ नहीं है, उसकी ताकत का मुख्य स्रोत केवल दिल्ली के बड़े भाजपा नेताओं से उनकी करीबी दोस्ती है।
यह विभाजन इस बात का क्रूर यथार्थ है कि आज राजनीति में जनसेवा और संगठन की अहमियत खत्म हो चुकी है। एक तरफ ज़मीनी रसूखदारों का गुट है तो दूसरी तरफ सिर्फ दिल्ली के आकाओं की परिक्रमा करके अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने वालों का जमघट।

नीतीश कुमार की लाचारी और ‘ब्रांड’ का अवसान
इस पूरे ड्रामे के बीच सबसे बड़ी त्रासदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्थिति है। कभी ‘सुशासन बाबू’ कहे जाने वाले और जेडीयू को एक अनुशासित दल की तरह चलाने वाले नीतीश कुमार आज असहाय मूकदर्शक बने हुए हैं। जब उनके सबसे विश्वस्त माने जाने वाले मंत्री और सांसद आपस में सरेआम कपड़े फाड़ रहे हों, तब नेतृत्व की यह खामोशी उनके घटते प्रभाव की गवाही देती है।
नीतीश कुमार ने अपनी पूरी राजनीति गठबंधन बदलने और जोड़-तोड़ में लगा दी, जिसके परिणामस्वरूप आज उनकी अपनी ही बनाई हुई पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखरने की कगार पर खड़ी है। पार्टी के भीतर की यह टूट किसी बाहरी ताकत की वजह से नहीं है, बल्कि यह उस लालच का नतीजा है जिसे खुद शीर्ष नेतृत्व ने सींचा है।

जनता की पीठ में छुरा
बिहार की इस बदरंग राजनीति की सबसे तीखी आलोचना इस बात को लेकर होनी चाहिए कि जब यह सारा तमाशा चल रहा है, तब बिहार की आम जनता बाढ़, गरीबी, बेरोजगारी और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से जूझ रही है। नेताओं को इस बात की रत्ती भर भी फिक्र नहीं है कि युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा या विकास की योजनाएं कैसे पूरी होंगी। उनके लिए सबसे जरूरी काम यह है कि 5 नवंबर की बैठक में किसने किसके खिलाफ पर्ची काटी और दिल्ली में बैठे आकाओं को कैसे खुश रखा जाए। यह आज के भारत के लोकतंत्र का क्रूर यथार्थ है, जहाँ जनता सिर्फ वोट देने की मशीन बनकर रह गई है और नेता चुनाव खत्म होते ही अपने आपसी बंटवारे और गुटबाजी में व्यस्त हो जाते हैं। जेडीयू का यह अंतर्द्वंद्व सिर्फ एक पार्टी की अंदरूनी कलह नहीं है, बल्कि यह उस समूचे तंत्र का पतन है जिसने बिहार को वर्षों से पीछे धकेल रखा है। जब तक जनता इन कुर्सी-लोलुप नेताओं से जवाब नहीं मांगेगी, तब तक राजनीति का यह नग्न नाटक इसी तरह चलता रहेगा और विकास की बातें केवल फाइलों में दफन रहेंगी।