अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष बने श्री निवास बीवी: क्या सिर्फ सांगठनिक नियुक्तियों से बच पाएगी कांग्रेस?

आज का भारत एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति का गवाह बन रहा है जहाँ चुनावी बिसात पर संगठन की मजबूती केवल प्रेस नोट जारी करने और सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों के आदान-प्रदान तक सीमित हो चली है।

हाल ही में अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री श्रीनिवास बीवी द्वारा मध्य प्रदेश कांग्रेस सेवादल के प्रदेश पदाधिकारियों एवं 18 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर जारी की गई सूची और उस पर चल रहा बधाइयों का दौर इसी राजनीतिक औपचारिकता का एक और उदाहरण है। यह कदम भले ही संगठनात्मक रूप से सक्रियता दिखाने का प्रयास हो, लेकिन वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के धरातल पर यह कांग्रेस की अंदरूनी दिशाहीनता और चुनावी विफलता की गहरी परतों को भी उजागर करता है।

कागजी सक्रियता बनाम जमीनी हकीकत

जब हम आज के भारत में मुख्य विपक्षी दल की कार्यप्रणाली की तीखी आलोचना करते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल पदों का बंटवारा कर देने से कोई संगठन जमीन पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विशाल और चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाली चुनावी मशीनरी का मुकाबला कर सकता है?

दिखावे की संगठनात्मक संरचना: कांग्रेस और उसके आनुषंगिक संगठनों (जैसे सेवादल) का इतिहास रहा है कि वे अक्सर चुनावों के ठीक पहले या हार के लंबे अंतराल के बाद अचानक सक्रिय होते हैं और थोक के भाव में नियुक्तियां करते हैं। मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहाँ पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा, वहाँ सांगठनिक ढांचे को दुरुस्त करने में इतना लंबा समय लगाना यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी धीमी और पंगु है।

सक्रियता का अभाव: सेवादल को कभी कांग्रेस की रीढ़ और गांधीवादी विचारधारा को गांव-गांव तक पहुंचाने वाला अनुशासित दस्ता माना जाता था। लेकिन आज के दौर में यह संगठन केवल पार्टी के बड़े नेताओं के दौरों पर अगवानी करने, तिरंगा यात्राओं में औपचारिकता निभाने या सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय नेताओं के बयानों को री-ट्वीट करने तक सीमित रह गया है।

नेतृत्व का संकट और गुटबाजी का यथार्थ

मध्य प्रदेश कांग्रेस का इतिहास आंतरिक गुटबाजी और गुटीय संतुलन बनाने के प्रयासों से भरा पड़ा है। जब भी 18 जिला अध्यक्षों या प्रदेश पदाधिकारियों की इतनी बड़ी सूची आती है, तो राजनीतिक विश्लेषक इसे सांगठनिक मजबूती से ज्यादा विभिन्न क्षत्रपों (जैसे कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी) के बीच मलाई बांटने और सबको संतुष्ट रखने के प्रयास के रूप में देखते हैं।

योग्यता बनाम वफादारी: आज के भारत की राजनीति में यदि विपक्ष को टिकना है, तो उसे केवल वफादारों की फौज नहीं, बल्कि कुशल रणनीतिकारों और जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं की जरूरत है। लेकिन कांग्रेस के भीतर अक्सर नियुक्तियां इस आधार पर तय होती हैं कि कौन सा नेता दिल्ली या भोपाल में बैठे किस आका का करीबी है। जब तक नियुक्तियों का आधार जमीन पर किया गया काम न होकर चाटुकारिता रहेगा, तब तक ये नवनियुक्त पदाधिकारी केवल कागजी शेर बने रहेंगे।

सत्तारूढ़ दल से तुलना: भाजपा का पन्ना प्रमुख मॉडल और बूथ स्तर का प्रबंधन आज के भारत की चुनावी हकीकत है। उसके मुकाबले कांग्रेस का सेवादल केवल बड़े-बड़े पदों (जैसे प्रदेश उपाध्यक्ष, महासचिव) के भारी-भरकम तमगे बांटकर आत्ममुग्धता का शिकार हो जाता है। जनता के बीच इन पदाधिकारियों की पहचान क्या है, यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

वैचारिक शून्यता और जनता से कटता विमर्श

सेवादल का मुख्य कार्य विचारधारा का प्रसार करना था, लेकिन आज का युवा वर्ग राष्ट्रवाद, रोजगार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और जनकल्याणकारी योजनाओं के नए नैरेटिव से प्रभावित है।

मुद्दों को उठाने में नाकामी: मध्य प्रदेश में बेरोजगारी, परीक्षाओं में घोटाले, किसानों की समस्याएं और कानून व्यवस्था जैसे ज्वलंत मुद्दे मौजूद हैं। इसके बावजूद विपक्ष का कोई भी संगठन जनता के बीच एक बड़ा और निर्णायक आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रहा है। पदाधिकारी नियुक्त हो जाते हैं, बधाई संदेश छप जाते हैं, लेकिन अगले ही दिन से वे नेता जनता के बीच संघर्ष करते हुए दिखाई नहीं देते।

सोशल मीडिया की छद्म दुनिया: आज की राजनीति का एक कड़वा सच यह है कि नेता जमीन पर पांच लोगों को इकट्ठा नहीं कर पाते, लेकिन एक्स (ट्विटर) और फेसबुक पर उनके हजारों समर्थक उन्हें बधाई दे रहे होते हैं। श्रीनिवास बीवी जैसे ऊर्जावान नेताओं द्वारा नियुक्तियां करना सराहनीय हो सकता है, लेकिन यदि इन 18 जिला अध्यक्षों के पास अपने जिलों में पार्टी को पुनर्जीवित करने का कोई ठोस रोडमैप नहीं है, तो यह पूरी कसरत समय और संसाधनों की बर्बादी मात्र है।

बधाई के आगे की चुनौती

नवनियुक्त पदाधिकारियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देना शिष्टाचार का हिस्सा है, लेकिन इस शिष्टाचार की आड़ में उस कड़वी हकीकत को नहीं छुपाया जा सकता कि कांग्रेस आज भी अपने पुराने ढर्रे से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक सशक्त विपक्ष का होना अनिवार्य है। यदि मध्य प्रदेश कांग्रेस सेवादल के ये नए पदाधिकारी केवल मफलर पहनकर तस्वीरें खिंचवाने के बजाय वास्तव में गांवों और कस्बों में जाकर जनता के सुख-दुख के सहभागी नहीं बनते, तो आने वाले समय में इतिहास उन्हें सिर्फ एक असफल संगठन के हिस्से के रूप में दर्ज करेगा। सत्ता केवल पदों की घोषणा से नहीं, बल्कि जनता का विश्वास जीतने से मिलती है—और यह विश्वास केवल जमीन पर पसीना बहाकर ही हासिल किया जा सकता है।

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